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रूस के विरूद्ध भारतीय प्रचारतंत्र

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भारत के विदेश नीति में भारी परिवर्तन हो चुका है। केंद्र की मोदी सरकार ने पाकिस्तान के साथ अच्छे सम्बंधों की बहाली का दांव चलते-चलते, आतंकवाद के मुद्दे को बढ़ा कर पहले उसे दुश्मन देश का दर्जा दिया, अघोषित युद्ध की स्थितियां पैदा की, पाकिस्तान के साथ चीन को खड़ा किया, और अब वह रूस को खड़ा कर रही है। जबकि रूस सोवियत संघ के समय से, भारत का मित्र देश रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उसे कूटनीतिक समर्थन ही नहीं दिया, भारत के सुरक्षा की गंभीर जिम्मेदारियां भी निभाई है।

भारत ‘ब्रिक्स देश‘ है।

‘शंघाई सहयोग संगठन‘ का सदस्य है।

एशिया एवं विश्व राजनीति में रूस के साथ चीन और भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

लेकिन, आर्थिक महाशक्ति बनने के खयाली जुनून के साथ, अब केंद्र की मोदी सरकार भारत को यूरो-अमेरिकी खेमे में सिर्फ खड़ा कर रही है, उसे अमेरिकी आतंकवाद विरोधी अभियान से जोड़ कर अपने मित्र देशों की पहचान भी बदल रही है।

सरकार समर्थक मीडिया कुछ ऐसी हवा बना रही है कि जो भी मोदी सरकार की नीतियों पर अंगुली उठायेगा वह राष्ट्रीय राजनीति में देशद्रोही है, और अंतर्राष्ट्रीय राजनति में भारत विरोधी है।

यह किसी भी देश के लिये राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय रूप से दुर्घटनाग्रस्त होने की गंभीर चेतावनी है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यूरोपीय एवं अमेरिकी मीडिया के चहेते सिर्फ इसलिये हैं कि उन्होंने भारत को मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था के चौराहे पर खड़ा कर दिया है। उन्होंने एक संकटग्रस्त पतनशील व्यवस्था के लिये भारत के प्राकृतिक एवं श्रमसम्पदा और बाजार को लूट के लिये उपलब्द्ध करा दिया है। उन्होंने देश को उन वित्तीय ताकतों के हवाले कर दिया है, जिनके लिये वैश्वीकरण तीसरी दुनिया के देशों की अर्थव्यवस्था को हंथियाने का जरिया है, और जिनकी सरकारें आतंकवाद की तरह ही उग्रराष्ट्रवाद को बढ़ा रही है।

नरेन्द्र मोदी के निशाने पर भारत विरोधी ऐसा पाकिस्तान है, जिसे अमेरिका ने ‘आतंकवाद का उत्पादक देश’ और ‘आतंकी संगठनों का पनाहगाह’ बनाया है, लेकिन वो अमेरिकी सरकार, पेंटागन, और सीआईए को बरी करते हुए चाहते हैं कि विश्व, ब्रिक्स देश और हार्ट ऑफ एशिया के सदस्य देश भी मानें। रूस और चीन भी पाकिस्तान को ‘आतंकी देश’ घोषित करें।

उन्होंने ‘हार्ट ऑफ एशिया’ के सम्मेलन में अफगानिस्तान के साथ मिल कर यह दबाव बनाने की नाकाम कोशिश की, जबकि सम्मेलन का एजेण्डा अफगानिस्तान था, मोदी का प्रस्ताव एजेण्डा में शामिल ही नहीं था।

मोदी के दबाव को सरकार समर्थक (भारतीय) मीडिया ‘अपने तरीके की बकवास’ बना चुकी है। उन्होंने रूस को चीन की तरह ही भारत विरोधी प्रमाणित करने का बीड़ा उठाया है। जो अमेरिकी हित में है। जिसका सीधा सा मतलब है कि रूस और चीन यदि अमेरिका के आतंकवाद विरोधी अभियान का समर्थन नहीं करते हैं तो वो आतंकवाद के पक्षधर देश हैं। मोदी विश्व समुदाय और भारत की आम जनता के सामने पाकिस्तान के साथ चीन और रूस का ‘हौवा’ खड़ा करना चाहते हैं। उनका मकसद भारत को उग्रराष्ट्रवादी देश बनाना है, जो अमेरिकी खेमे का भी मकसद है, ताकि बाजारवादी ताकतों को खुली छूट मिली रहे।

नरेंद्र मोदी हार्ट ऑफ एशिया के अमृतसर सम्मेलन में ‘सीमा पार के आतंकवाद‘ को मुद्दे में बदल कर, न सिर्फ पाकिस्तान को अलग-थलग करना चाहते थे, बल्कि उसके विरूद्ध कार्यवाही को ‘फ्रेम वर्क‘ के नाम पर स्वीकृति भी चाहते थे। जिसे सदस्य देशों की स्वीकृति नहीं मिली। अफगानिस्तान ने भले ही भारत का समर्थन किया और पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा किया।

रूस के प्रतिनिधि जमीर काबूलोव ने नरेंद्र मोदी के इस रवैये को ‘मुद्दे का अपहरण‘ करार दिया और उसे सम्मेलन के घोषणा पत्र में शामिल न करने की बात की। उनका तर्क था, कि ‘‘पाक प्रतिनिधि सरताज अजीज का वक्तव्य सकारात्मक है‘‘ और ‘‘हार्ट ऑफ एशिया‘‘ के मौजूदा सम्मेलन का मुद्दा अफगानिस्तान है।‘‘

जिसे सरकार समर्थक मीडिया रूस के विरूद्ध प्रचारित कर रही है। जबकि घोषण पत्र में आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाने और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग एवं कार्यवाही का विस्तृत मसौदा बनाने का जिक्र है। घोषणा पत्र में अफगानिस्तान में बढ़ी हुई हिंसा एवं आतंक के लिये किसी एक देश को जिम्मेदार ठहराने की नीतियों से बचा गया है। आतंकवाद के खिलाफ क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एवं संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक नीति -2016 का समर्थन किया गया है।

‘हार्ट ऑफ एशिया‘ के अमृतसर सम्मेलन में जैसी हरकत नरेंद्र मोदी ने की, वैसी ही हरकत उन्होंने ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में भी की थी। वास्तव में वो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध को साम्राज्यवादी युद्ध में बदलने की अमेरिकी नीतियों के लिये भारत को तैयार कर रहे हैंं, जिसकी राह में, क्षेत्रीय मोहरा नरेंद्र मोदी हैं। जिनके पक्ष में साम्राज्यवादी (अमेरिकी) ताकतें अपने समर्थक मीडिया के माध्यम से माहौल बनाती रही है, वो भारत में पाकिस्तान के साथ चीन और रूस को अब, भारत विरोधी प्रचारित कर रही है। उन्होंने जनविरोधी नोटबंदी से पैदा हुई दिक्कतों की पाकिस्तान के बाद रूस की शिकायतों को भी भारत विरोध की तरह प्रचारित किया जबकि इसी दौरान अमेरिकी कांग्रेस की प्रतिनिधि सभा के ़द्वारा पाकिस्तान को 90 करोड़ डॉलर के दिये जाने वाले आर्थिक सहयोग के लिये चुप्पी है।

मोदी भारत को उस ओर धकेल रहे हैं, जहां से सकुशल उसकी वापसी संभव नहीं।

-आलोकवर्द्धन, अनुकृति

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