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आरोपों से घिरी ठप्प व्यवस्था

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संसद भवन में बुलायी गयी विशेष प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा- ‘‘मेरे पास पीएम के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं। इसे मैं लोकसभा में रखना चाहता हूं, लेकिन मुझे रोका जा रहा है। प्रधानमंत्री घबराये हुए हैं। उन्हें डर है, कि मैं बोलूंगा तो गुब्बारा फट जायेगा।’’

जैसी प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी, हो रही है।

भाजपा अपने को साफ-सुथरा नहीं करेगी। ‘मैं भ्रष्ट, तो तू भी भ्रष्ट।’ ‘मैं छोटा, तो तू बड़ा भ्रष्ट।’ भ्रष्टाचार के तमाम आरोपी बस ऐसे ही नहाते-धोते रहेंगे।

पहले पानी गंदा था, अब पानी कीचड़ है। बेचारे पानी की औकात पानी-पानी हो गयी है। इस देश में सरकार हो या विपक्ष, पानीदार कोई नहीं।

‘कांग्रेस भ्रष्ट है।’ भाजपा गंगाजल उठा कर कसम खा सकती है।

भाजपा के भ्रष्ट होने की कसमें कांग्रेस खाये न खाये, यह उसकी मरजी, लेकिन भाजपा का पर्याय बने नरेन्द्र मोदी के भ्रष्ट होने का पुख्ता सबूत, कहते हैं राहुल गांधी की जेब में है।

यदि वामपंथियों को छोड़ दें, तो तमाम राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों की हालत बड़े भाई-छोटे भाई की है।

सत्ता पट्टीदारों की लड़ाई बन गयी है।

कांग्रेस भाजपा की, भाजपा कांग्रेस की, सपा बसपा की, बसपा सपा की और तमाम राजनीतिक दल एक-दूसरे की यदि बखिया उधेड़ें, तो आप क्या कहेंगे?

यदि हम कहें कि पूरी व्यवस्था ही भ्रष्ट है, आम जनता के हितों के विरूद्ध है, तो आपकी अपनी राय क्या होगी?

क्या आप इस व्यवस्था का, उसकी राजनीतिक एवं आर्थिक संरचना का विकल्प ढ़ूंढ़ने की कोशिश करेंगे? या जो चल रहा है, उसमें ही चौंक-चौंक कर, लात-जूता खाते, बंद-किल्लत और बकवास सुनते हुए जीते रहेंगे?

अर्थव्यवस्था हिली हुई है। जिसमें आम आदमी के हितों के लिये कोई जगह नहीं है।

राजनीतिक व्यवस्था तार-तार है। राहुल गांधी संसद (लोकसभा) में बोलना चाहते हैं, सरकार और भाजपा उन्हें बोलने नहीं देना चाहती। संसद के शीतकालीन सत्र का आखिरी दिन है। सरकार विपक्ष पर आरोप लगा रही है, और संसद को न चलने देने का कमाल भी दिखा रही है। जिस राजनीतिक व्यवस्था को बनाया गया, उस व्यवस्था को चलाने की जिम्मेदारी जिन पर है, वो ही उसे चला नहीं रहे हैं।

आप एक ठप्प व्यवस्था से क्या उम्मीद कर सकते हैं?

शायद कुछ नहीं। लेकिन यह साजिश है, जो संवैधानिक अधिकार हमारे पास है, उसे छीनने का। बचे हुए लोकतंत्र को एक ठप्प व्यवस्था बना कर व्यवस्था के नाम पर एकाधिकारवादी व्यवस्था को थोपने का, ताकि वित्तीय पूंजी की तानाशाही को खुली छूट मिल सके। नोटबंदी और कैशलेस व्यवस्था की दिशा यही है। नरेन्द्र मोदी जी नहा-धो तो चुके हैं, मगर इस व्यवस्था में जो दिखता है, वह होता नहीं। बात बस इतनी है।

-आलोकवर्द्धन

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