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फिदेल के बिना, क्यूबा क्रांति की वर्षगांठ

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एक दबी हुई ख्वाहिश थी

फिदेल कास्त्रो से मिलने,

हाथ मिलाने और मिल बैठ कर

यह पूछने की

कि 21वीं सदी क समाजवाद को

हम मार्क्सवाद की किन संभावनाओं से जोडे?

मार्क्स और लेनिन के सामने

हम कैसे खड़े हों?

ऐसा हुआ या नहीं? सवाल यह नहीं है। सवाल यह भी नहीं है, कि हम उनसे अब कैसे मिलेंगे? सवाल यह है कि फिदेल कास्त्रो से हाथ हम कैसे मिलायें?

आपसे बस इतना ही आग्रह है-

आईये, हम फिदेल कास्त्रो से हाथ मिलायें। अपने देश और अपनी दुनिया के लिये यह जरूरी है, जिनके लिये समाजवादी सोच से बड़ी कोई चीज न थी। जिन्होंने विचारों के जीवन को तरजीह दी। जो जीवन भर मार्ती से मार्क्स की और बढ़ते रहे। और गये साल 25 नवम्बर 2016 को वे विदा हो गये।

क्यूबा पहली बार फिदेल कास्त्रो के बिना ‘समाजवादी क्रांति‘ की वर्षगांठ मनायेगा।

फिदेल

क्यूबा की समजवादी धरती

वहां की आब-ओ-हवा

लोगों के दिल में घुले-मिले होंगे।

होंगे वो लातिनी अमेरिकी देशों की

रक्त धमनियों में

तीसरी दुनिया के देशों में

क्यूबाई डॉक्टरों की तरह होंगे।

हमारे कठिन आज

और आने वाले कल की

समाजवादी सम्भावनाओं में होंगे।

मिलेंगे वे वहां संघर्षों के बीच

जहां भी हाथ मिलाने की जगह हमें मिलेगी।

1953 में, बातिस्ता सरकार के खिलाफ असफल विद्रोह के बाद अदालत में उन्होंने कहा था- ‘‘इतिहास मुझे सही साबित करेगा।‘‘ उन्होंने ‘क्यूबा क्रांति‘ के इतिहास को लिखा। सही साबित भी हुये।

इतिहास को रोकने, और उसे मारने की कोशिशें होती रही है। पूंजीवादी साम्राज्यवादी ताकतें आज यही कर रही हैं, किंतु इतिहास को रोकना और उसे मारना अब तक नहीं हो सका। सोवियत संघ और अक्टूबर क्रांति भी इतिहास है- थमा और अपनी संभावनओं को तलाशता हुआ इतिहास।

पूर्वी यूरोप का टूटा हुआ समाजवादी गढ़।

चीनी क्रांति का बाजारवादी वैश्वीकरण।

वियतनाम का बदला हुआ इतिहास।

तीसरी दुनिया में इराक, लीबिया का गैर पूंजीवादी विकास और दूर्घटना भी इतिहास है, कि साम्राज्यवादी आतंकवाद, युद्ध के जरिये तख्तापलट का कारनामा है। वह बदलता और खत्म होने के लिये बढ़ता हुआ इतिहास है।

आज हम एक ऐसी दुनिया में है, जो वैश्विक वित्तीय ताकतों का बाजार है। इसलिये यह सोचना कि धार्मिक उन्माद, साम्प्रदायिक संघर्ष और जातीय बंटवारा, जैसा कि इस्लामी देशों में है, यदि लातिनी अमेरिकी देशों में नहीं है, तो वह साम्राज्यवादी हस्तक्षेपों के बहानों से मुक्त है, कि ‘‘21वीं सदी का समाजवाद‘‘ या ‘‘विकास के जरिये समाजवाद‘‘ यदि मार्क्सवादी साम्यवाद से प्रेरित नहीं है, तो वह साम्राज्यवादी हस्तक्षेप से सुरक्षित है, मूलतः गलत है। हमारे सामने अलेंदे की चुनी हुई समाजवादी सरकार ही नहीं शॉवेज भी है। ब्राजील और वेनेजुएला भी है। सैन्य तख्तापलट ही नहीं वैधानिक तख्तापलट भी है।

यह सवाल है, कि जनविरोधी सरकारों की दुनिया में जनसमर्थक सरकारों का भविष्य क्या है?

क्यूबा की क्रांति और क्यूबा के समाजवाद को फिदेल और फिदेल से कहीं ज्यादा खुली नजरों से देखने की जरूरत है।

समाजवादी क्रांति और जनसमर्थक समाजवादी सरकार के लिये मार्क्स, लेनिन और माओ से ही नहीं फिदेल से मिलने की भी अनिवार्यता है। जिन्होंने अपने तरीके से विचारों को जीया और सोवियत संघ के विघटन के बाद भी, क्यूबा की क्रांति और समाजव्यवस्था को महाद्वीपीय स्वरूप और अंतर्राष्ट्रीय आधार दिया।

फिदेल के बिना क्यूबा क्रांति की यह पहली वर्षगांठ है, जिसकी तैयारी उन्होंने सावधानी से की थी। उन्होंने कहा- ‘‘मेरा पहला कर्तव्य यह था कि हम अपने लोगों को राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक रूप से इस बात के लिये तैयार करें कि सालों के हमारे संघर्ष को वे हमारी गैर मौजूदगी में भी संभाल सकें, काम कर सकें।‘‘ और उन्होंने जीवन के आखिरी सांस तक अपनी जिम्मेदारियों को पूरा किया।

-आलोकवर्द्धन

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