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सोवियत संघ के विघटन के सूत्रधार – 2

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‘‘मैं उनके (गोर्बाचोव) किसी भी बात पर विश्वास नहीं करता’’ रूस की कम्युनिस्ट पार्टी के वॉलेरी राश्किन ने कहा- ‘‘गोर्बाचोव लोकतंत्र के प्रवर्तक और ऐसे सिक्रेट एजेन्ट हैं जो संदेहास्पद लोगों को गलत काम करने के लिये उकसाते हैं। वे लोगों की भावनाओं से खेल रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि आम लोगों की राय और समाज का मिजाज़ क्या है?’’ उन्होंने आगे कहा, कि ‘‘उनके पास सोवियत संघ को पतन से बचाने के लिये सेना, के.जी.बी. और पुलिस थी। देश के 80 प्रतिशत नागरिकों का समर्थन था। जिन्होंने सोवियत संघ के पक्ष में मतदान किया था।’’

यह सवाल तो है

कि सोवियत संघ की समाजवादी सरकार कमजोर नहीं थी

कि सेना से लेकर आम लोगों का समर्थन उसे हासिल था

कि वो तमाम स्थितियां थीं कि गोर्बाचोव जिन्हें ‘प्रशासनिक प्रदर्शनकारी’ और उनकी एकजुटता का ‘गैंग’ मान रहे थे, जिन्हें कुचला जा सकता था, जो सोवियत संघ और उसकी समाजवादी सरकार विरोधी थे, जिन्हें देश की आम जनता का समर्थन हासिल नहीं था, उनके सामने गोर्बाचोव ने समर्पण क्यों किया?

राष्ट्रपति के पद से इस्तीफा क्यों दिया, और इस्तीफे से पहले समझौते पर हस्ताक्षर और सोवियत संघ के विघटन की घोषणां क्यों की?

लगभग सात दशक लम्बी अक्टूबर क्रांति और उसकी समाजवादी व्यवस्था को खामोशी से मार क्यों दिया?

सबसे जटिल सवाल यह है, कि सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी और समाजवादी सोच से संचालित देश की 80 प्रतिशत आबादी ने गोर्बाचोव और येल्तसिन जैसे लोगों के ‘करार’ और ‘घोषणां’ का विरोध क्यों नहीं किया? वो सड़कों पर क्यों नहीं उतरे? सेना ने विद्रोह क्यों नहीं किया? कम्युनिस्ट पार्टी ने गोर्बाचोव को कूड़े के डब्बे में क्यों नहीं डाला?

यह भूलने की कोई वजह नहीं थी, कि समाजवादी विश्व, दुनिया की आधी से अधिक आबादी और विश्व समुदाय का समर्थन सोवियत संघ को हासिल था। यह भूलने की कोई वजह नहीं थी, कि सोवियत संघ समाजवादी सोच का प्रतिनिधित्व कर रहा था, कि सोवियत संघ की सीमायें भौगोलिक नहीं मानसिक भी थीं, वह तीसरी दुनिया के देशों का भी था। जिसे तोड़ दिया गया।

यह अलग बात है कि मार्क्सवाद आज भी अपनी संभावनाओं के साथ खड़ा है। लेनिन और अक्टूबर क्रांति और सोवियत संघ को चाहने वालों की कमी नहीं है। पूंजीवादी विश्व संकटग्रस्त है, और अमेरिकी साम्राज्यवाद के पांव उखड़ चुके हैं, वैश्विक वित्तीय ताकतों ने अमेरिकी कांग्रेस, व्हाईट हाउस को, उसकी सेना और सरकार को खरीद लिया है। वॉलस्ट्रीट और फेडरल रिज़र्व ने उस पर अधिकार जमा लिया है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था 20 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज में है। अमेरिका अघोषित रूप से दीवालिया और बिकी हुई चीज़ है। जबकि अक्टूबर क्रांति और सोवियत संघ इतिहास में ही नहीं हमारे आज में भी हैं, वह 21वीं सदी के समाजवाद के लिये भी सबक हैं।

रस्किन ने कहा- ‘‘अभी भी 50 प्रतिशत से ज्यादा रूसी नागरिक सोवियत संघ की पुर्नस्थापना के पक्ष में हैं। 50 प्रतिशत से अधिक लोग -जिनमें रूस की नयी पीढ़ी की हिस्सेदारी विशेष है, जो नहीं जानती कि सोवियत संघ वास्तव में कैसा था?- सोवियत संघ का समर्थन करती है।’’ उसने मार्क्सवाद पर गिरे परदे, लेनिन की खण्डित प्रतिमा और रेड स्क्वायर के घटे दर्जे को स्वीकार नहीं किया है। रूस मुक्त बाजार में भले ही खड़ा है, किंतु चीन के साथ मिल कर वह आज भी अमेरिकी और यूरोपीय साम्राज्यवाद के लिये गंभीर चुनौती है।

8 दिसम्बर 1991 को बोरिस येल्तसिन (रूस) लिओनाएड क्रावचुक (यूक्रेन) और स्टैनिस्लाव सुस्केविच (बेलारूस) ने ‘बेलावेझा अकॉर्ड’ पर हस्ताक्षर किये और ‘कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेन्डेण्ट स्टेट’ (सीआईएस) की स्थापना की, और 25 दिसम्बर 1991 की रात गोर्बाचोव ने इनके पक्ष में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सोवियत संघ के विघटन की घोषणा की।

सोवियत संघ टूट कर रूस और 12 अन्य देशों में बंट गया। पूरे क्षेत्र को पूंजीवादी बाजार व्यवस्था में बदल दिया गया। एक ऐसी व्यवस्था में बदल दिया गया, जो समाजवादी समाज व्यवस्था के विपरीत थी।

एक ऐसी पीढ़ी जिसने बाजार में लोगों और सरकारों को बिकते नहीं देखा था, उनके सामने दुनिया की सबसे बड़ी खरीदी-बिक्री की शुरूआत हुई। सोवियत संघ को टुकड़ों में बांट कर उसे कुछ सालों में ही बाजारवादी बना दिया गया। उसकी राजनीतिक संरचना टूट गयी और उसकी अर्थव्यवस्था का निजीकरण कर दिया गया। इन देशों की आम जनता जनसमर्थक सरकारों को जानती थी, मगर पहली बार उसका वास्ता जनविरोधी सरकारों से पड़ा।

इन देशों की अर्थव्यवस्था के निजीकरण की कार्ययोजना को पश्चिमी अर्थशास्त्रियों की देख-रेख में तैयार किया गया। सोवियत संघ के प्राकृतिक गैस एवं तेल सम्पदा सस्ते में बेचने और खरीदने को मंजूरी दी गयी। राष्ट्रीयकरण एवं समाजीकरण की तमाम सुरक्षित सीमाओं को हटाया जाने लगा। इसी बीच क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पूंजीवादी मंदी का शिकार हो गयी। सामाजिक एवं आर्थिक असमानतायें तेजी से बढ़ने लगीं। समाज वर्गों में विभाजित हो गया। शोषक और शोषितों की जमातें बन गयीं। जो अमेरिका और यूरोपीय देशों में हो रहा था, वहा होने लगा।

2 जनवरी 1992 की रात -सोवियत संघ के विघटन की घोषणां के एक साल 1 सप्ताह बाद- रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने 90 प्रतिशत कारोबारी सामान पर से मूल्य नियंत्रण को समाप्त कर दिया, और एक नये ‘वाउचर सिस्टम’ को लागू किया, जिसके अन्तर्गत रूस की आम जनता को ‘फ्री पोटेंसियल शेयर’ -संभावित पावती शेयर- दिया गया, ताकि सम्पत्ति को चंद लोगों के हाथों में केंद्रित होने से बचाया जा सके। जिसका कोई लाभ आम रूसी को नहीं मिला। वे ऐसी व्यवस्था को समझने के लायक ही नहीं थे। उन्होंने अपने ‘वाउचर’ को उन्हें बेच दिया जो कि उसे जल्द से जल्द खरीदने में सक्षम थे। उन्होंने निजी कम्पनियों के शेयर को, उसके बहुत बड़े हिस्से को, खरीद दिया। मात्र दो साल में वाउचर प्रोग्राम के तहत 15000 कम्पनियों का निजीकरण हो गया। इस प्रक्रिया को तेज करने के लिये रूस की येल्तसिन सरकार ने ‘लोन फॉर शेयर प्रोग्राम’ का निर्माण किया जिसके तहत रूस के सबसे बड़े प्राकृतिक संसाधन वाले फर्मों को ना के बराबर कीमतों पर बेचा गया।

रूस की प्राकृतिक सम्पदा और उसके संसाधनों को येल्तसिन ने सस्ते में नीलाम कर दिया। रूसी, यूरोपीय एवं अमेरिकी कम्पनियों ने इसका भरपूर लाभ उठाया। रूस में एक ऐसी सरकार बनी जिसने बाजारवादी लूट को वैधानिक बनाया।

यूकोस -एक तेल एवं गैस कम्पनी- को मिखाइल खोद्रोकोवस्की को 310 मिलियन अमेरिकी डॉलर में बेच दिया गया, जिसकी वास्तविक कीमत 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर थी।

इसी तरह एक अन्य तेल कम्पनी -सिबनेफ्ट- को भी मात्र 100 मिलियन डॉलर में बोरिस बेंजोवस्की को बेच दिया गया, जिसकी वास्तविक कीमत 3 बिलियन डॉलर थी।

येल्तसिन की सरकार ने अर्थव्यवस्था के निजीकरण के तहत सरकारी शेयर को सस्ते में उन लोगों को बेच दिया जो नव कुलीन वर्ग के ऐसे लोग थे जो बैंकों को संचालित करते थे, जो वित्तीय रूप से काफी मजबूत थे। इन्हीं लोगों ने सस्ते में खरीदे गये सरकारी शेयर को बाद में बोली लगवा कर (बीडिंग) बेचा और भारी मुनाफा कमाया। रूस की राष्ट्रीय एवं सामाजिकृत अर्थव्यवस्था देखते ही देखते निजी कम्पनियों के हवाले कर दी गयी।

1995 तक रूस के जीडीपी और औद्योगिक उत्पाद में 40 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ गयी। जबकि रूस के नये कॉरपोरेट ने वैश्विक स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग (मुद्रा का अवैध कारोबार), ऑफशोर एकाउण्ट (देश से बाहर खाता), टैक्स अवॉइडेन्स (करों की चोरी) और अण्डर पेमेंट (मजदूर-कर्मचारियों को कम भुगतान) के जरिये ढ़ेरों दौलत बनाये, भारी लूट हुई। इसी दौरान रूस के बुर्जुआ ने 150 बिलियन डॉलर से ज्यादा पैसे विदेशों के बैंक खातों, निवेश और सम्पत्ति की खरीदी करके छुपाये। सोवियत संघ के समाजवादी व्यवस्था के अवशेषों पर पूंजीवादी इमारते खड़ी की गयीं। आज रूस के 110 लोगों के पास वहां की 35 प्रतिशत सम्पत्ति है। चंद लोगों ने रूस की अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लिया है।

आज रूस चीन के साथ मिलकर मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना कर रहा है, मगर वह अमेरिकी साम्राज्य के लिये वह चुनौती नहीं है, जो कभी सोवियत संघ था। सोवियत संघ के विघटन में गोर्बाचोव ने अमेरिका एवं यूरोपीय देशों के सहयोग एवं हस्तक्षेप के बारे में पूछे गये सवालों का ठोस जवाब नहीं दिया था लेकिन उसके निजीकरण की योजना के पीछे कौन था? का सवाल हम करें तो जवाब खुलेआम है- हावर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेफ्फरे सैक्स और उनके हावर्ड इंस्टीच्यूट फॉर इंटरनेशनल डिपार्टमेंट से जुड़े मित्र थे, जो रूस की अर्थव्यवस्था के निजीकरण के निकटतम सलाहकार थे। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक और यूरोप के बैंकों का सहयोग भी मिला था।

सोवियत संघ के विघटन में मिखाईल गोर्बाचोव और बोरिस येल्तसिन की सूरतें आपस में जुड़ी हुई हैं। यह अच्छी बात है, कि गोर्बाचोव अभी जीवित है- अपने कारनामों को देखने के लिये, यह जानने और समझने के लिये कि जिस ग्लासनोत्स और पेइस्त्रोइका को उन्होंने मार्क्सवाद और लेनिनवाद पर बिछाया था, उस पर किसी को थूकने की भी फुर्सत नहीं है।

जारी

-आलोकवर्द्धन

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