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सोवियत संघ के विघटन के सूत्रधार – 3

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गोर्बाचोव अपने काले कारनामों के गवाह हैं।

उन्होंने सोवियत संघ के विघटन को ऐतिहासिक दुर्घटना ही नहीं बनाया, बल्कि समाजवादी विश्व, वैश्विक आर्थिक एवं सामरिक संतुलन और साम्राज्यवादी आतंक के विरूद्ध तीसरी दुनिया के देशों की सुरक्षा एवं उनके विकास को भी तोड़ दिया। गैर पूंजीवादी विकास की संभावनाआें की हत्या कर दी। इराक और लीबिया का पतन इसके प्रमाण हैं। सीरिया के जारी संघर्ष को हम भूल नहीं सकते। अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी देशों में जो हो रहा है- सैनिक एवं वैधानिक तख्तापलट- उसमें सोवियत संघ का न होना भी एक कारण है।

उन्होंने रूस में येल्तसिन के उत्थान और पतन को देखा। वे रूस के वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन को भी देख रहे हैं। उन्हें यह देखना भी बदा है, कि विश्व फिर से दो शिविरों में बंट गया है। वह एक बड़े युद्ध के मुहान पर है। अमेरिकी साम्राज्यवाद टूट रहा है और पूंजीवादी विश्व संकटग्रस्त है। सोवियत संघ के न होने से उसकी चुनौतियां खत्म नहीं हुई।

उन्होंने अपने इस झूठ को सच बनाया कि ‘सोवियत संघ समाजवादी समाज निर्माण में इतनी दूर तक बढ़ आया है, कि उसकी वापसी नहीं हो सकती।‘‘

उन्होंने बिना किसी निर्णायक प्रतिरोध समाजवादी समाज व्यवस्था को शताब्दि भर पीछे खड़ा कर दिया। उनके इस कमाल से विश्व समुदाय और दुनिया की आम जनता स्तब्द्ध रह गयी। यह सोच ही टूट कर बिखर गयी कि ऐतिहासिक विकास की चरम अवस्था विकसित साम्यवाद है।

उन्होंने ऐसी स्थितियां पैदा की कि बिना कुछ किये ही मान लिया गया कि विश्व का पहला साम्यवादी देश फ्रांस के ‘कम्यून विद्रोह‘ की तरह ही असफल हो गया है।

उन्होंने सोवियत संघ को गृहयुद्ध से बचाने का दावा पेश किया है।

यह सोच कर हैरत होती है, कि अपनी सड़ी हुई सूरत लिये गोर्बाचोव इतने दिनों तक कम्युनिस्ट कैसे बने रहे?

आज सोवियत संघ के पतन के चाहे जितने भी कारणों को हम गिन और समझ लें, कितु उसके पतन से हमें भी हैरत हुई थी। हमारी भी रातों की नींद उड़ गयी थी। मार्क्सवाद की संभावनाओं को समझने और लेनिनवाद की समझ को विकसित करने में दिक्कतें पेश आयी थीं।

इसके बाद भी हम मानते हैं, कि कोई भी व्यक्ति इतना बड़ा नहीं होता कि वह एक पूरी व्यवस्था को बदल सके।

विकसित होते समाजवादी संक्रमण के दौर में ही लापरवाही हुई थी। ब्रेझनेव का यह दावा गलत था, कि ‘‘सोवियत संघ समाजवाद से साम्यवादी समाज व्यवस्था में संक्रमण कर रहा है।‘‘ ख्रुश्चोव ने जब स्टॉलिन की कब्र खोदी और उनका गैर मार्क्सवादी तरीके से अवमूल्यन किया था, उस समय ही यह तय करना था कि ‘सर्वहारा की तानाशाही‘ संक्रमण का आधार है। स्टॉलिन की कब्र खोदना, लेनिन की कब्र खोदने से अलग नहीं।

बहरहाल, हमारे सामने ध्वस्त सोवियत संघ और संकटग्रस्त पूंजीवादी समाज व्यवस्था है। गोर्बाचोव और येल्तसिन है, और हावर्ड विश्व विद्यालय के वो लोग हैं, जिन्होंने विघटन के बाद, समाजवादी प्रतिरोध को रोकने के लिये ‘शॅक थेरेपी‘ की नीतियां रची।

यह आम जनता के हाथों से समाजवादी सुविधा और सुरक्षा को छीनने की नीति थी। येल्तसिन ने यही किया। उन्होंने समाजवादी सरकार की सामाजिक सम्पत्ति का अंधाधुंध निजीकरण किया। उन्होंने नवउदारवादी बाजारवाद को बढ़ाने के लिये वस्तु की कीमत और मुद्रा पर से सरकारी नियंत्रण को हटा लिया। आम जनता को मिलने वाली सुविधाओं और छूट को समाप्त कर दिया। सरकार के नियंत्रण से बाजार को मुक्त कर दिया। रूस को, रूस की अर्थव्यवस्था को उसके संसाधन और प्राकृतिक सम्पदा तथा आम रूसी को बाजार के हवाले कर दिया। इतने बड़े पैमाने पर निजीकरण हुआ, कि सामाजिक विकास की जनसंभावनायें ही मर गयीं। लोग भौचक रह गये।

और जब होश आया, पूरी व्यवस्था ही बदल गयी। सिर के बल खड़ी सरकार से वास्ता पड़ा। एक ऐसी जनविरोधी सरकार जिससे सोवियत संघ की इस पीढ़ी का वास्ता कभी पड़ा ही नहीं था।

गोर्बाचोव के लिये पूंजीवादी लोकतंत्र भले ही रंगीन परों वाली चिड़िया रही हो, मगर पूर्व सोवियत संघ के लोगों के लिये वह पूंजीवादी अमेरिकी बाज ही प्रमाणित हुई। जिसने उनके घोसले से सारा मांस ही उड़ा लिया। एक ही झप्पट्टे में येल्तसिन ने 90 प्रतिशत आवश्यक वस्तुओं के व्यापार से सरकारी मूल्य नियंत्रण को समाप्त कर दिया और दो साल से भी कम समय में 15,000 सरकारी कम्पनियों को उठा कर निजी कम्पनियों के हवाले कर दिया। निजीकरण के इस ढ़ाचे का निर्माण भले ही येगोर गाएदर और अनातोली चोबेइ ने किया मगर, उन्हें हावर्ड विश्व विद्यालय के प्रोफेसर जेफरी सैक्स और उनके सहयोगियों की सलाह मिली। उन्होंने प्रभावशाली भूमिका अदा की। निजीकरण के जरिये उन्होंने एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया, जो पूंजीवादी वैश्विक वित्त व्यवस्था का सहयोगी हो।

किंतु, समाजवादी सोच को मारने में वो नाकाम रहे। सोवियत संघ के जिस पीढ़ी ने समाजवाद और अक्टूबर क्रांति के लिये कुर्बानियां नहीं दी थीं, जिन्हें समाजवादी व्यवस्था दशकों के संघर्ष की सौगात की तरह मिल गयी थी, जो पूंजीवादी लोकतंत्र और पूंजीवादी बाजार व्यवस्था को नहीं जानते थे।, उनका मोह भंग होता चला गया। रूस आज भले ही पूर्व सोवियत संघ के सदस्य देशों को आपस में जोड़ रहा है, और एक नये संघ की स्थापना की दिशा में बढ़ रहा है, किंतु यह सत्य है, कि वह सोवियत संघ का दर्जा हासिल नहीं कर सकता। वह चीन के साथ मिल कर मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों का निर्माण कर रहा है। जिसमें लातिनी अमेरिकी देशों की हिस्सेदारी भी है।

क्यूबा सोवियत संघ का अभिन्न मित्र देश रहा है। क्यूबा के समाजवादी क्रांति के स्थायित्व एवं उसकी अर्थव्यवस्था एवं अमेरिकी साम्राज्यवादी ताकतों से उसकी लड़ाई सोवियत संघ के बिना संभव न थी। किंतु गोर्बाचोव के आते ही स्थितियां बदलने लगी थीं। आर्थिक सहयोग एवं सामरिक सुरक्षा में कमियां आने लगीं। फिदेल कास्त्रो ने तब कहा था- ‘‘क्रेमलिन में शैतान बैठा है।‘‘

और इस शैतान ने समाजवादी शिविर को ही नष्ट कर दिया।

‘‘सोवियत संघ के पतन के बाद, दुनिया आम लोगों से छीन ली गयी‘‘ यदि हम यह कहते हैं, तो हम यह भी कह रहे होते हैं, कि ‘‘सोवियत समाजवादी दुनिया पर आम लोगों की ठोस दावेदारी थी।‘‘ आज इसी दावेदारी को हासिल करने और उसे खारिज करने की लड़ाई चल रही है। दुनिया की मेहनतकश आवाम के खिलाफ पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतें अलग-अलग नाम और अलग-अलग लिबासों में लड़ रही है। नवउदारवादी वैश्वीकरण से लेकर मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था की घातक बेवकूफियां चल रही हैं। यहां तक कि आतंकवाद को भी इन ताकतों ने समाजवाद के खिलाफ अपने साथ जोड़ लिया है। वैश्विक वित्तीय ताकतों ने बाजार को बढ़ा कर राज्य की सरकारों को अपने कब्जे में ले लिया है। वह अपने को बचाने के लिये अपनी राजनीति संरचना और अपनी सोच को खा रहा है। उसने अपने को उस मुकाम पर खड़ा कर लिया है, जहां उसके लिये न तो सूरज है, न पृथ्वी है, ना ही विश्व है, जिसे वह विश्व की आम जनता से छीनता रहा है। वह अंधकार और आकाश की अतल गहराईयों से घिरा है। बाजार यदि खुदा है, तो आप यकीन के साथ कह सकते हैं, कि उस खुदा ने उसे धोखा दे दिया है।

25 दिसम्बर 1991 की रात पूर्व सोवियत संघ के आखिरी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव ने जब सोवियत संघ के विघटन की घोषणां की थी, पूंजीवादी विश्व ने मान लिया था, कि सोच और समाज व्यवस्था के स्तर पर उसकी वैश्विक चुनौती का अंत हो गया। लेकिन वह धोखे में था। उसने यह धोखा भले ही विश्व समुदाय और विश्व जन समुदाय के लिये रचा था, जिसका अंत उसके अपने अंत की तरह है। वह अंत के करीब है, मगर उसे अपने अंत का यकीन नहीं। उसके लिये ‘पूंजीवादी वैश्वीकरण‘ ‘इतिहास का अंतिम पड़ाव‘ है। जिसके लिये जरूरी है, कि वह विश्व के वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था के विरूद्ध अपना अभियान जारी रखे। और वह यही कर रहा है। यूरो-अमेरिकी साम्राज्य, वॉलस्ट्रीट और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम सहित वैश्विक वित्तीय ताकतें यही कर रही हैं।

अक्टूबर क्रांति के बाद जैसे दुनिया बदल गयी थी, सोवियत संघ के विघटन के बाद भी दुनिया बदल गयी है। अमेरिका के साम्राज्यवादी मंसूबों को खुली छूट मिली। जिस शीतयुद्ध के भय को फैलाया गया था और समाजवादी शिविर ने जिसे रोक कर रखा था, वह सोवियत संघ समर्थक समाजवादी, गैर-पूंजीवादी देशों के विरूद्ध युद्ध में बदल गयी, अफगानिस्तान घायल हुआ, इराक की हत्या की गयी, लीबिया को मारा गया, तीसरी दुनिया के देशों में तख्तापलट की नयी पहल हुई, सीरिया में आज भी युद्ध जारी है। 1991 के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने बोस्निया, क्रोएसिया, सर्बिया, कोसोवो, अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया और यूक्रेन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप किया। लातिनी अमेरिकी देश चिली के तख्तापलट के बाद जिस दौर पर रोक लग गयी थी, सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी साम्राज्य और उसके सहयोगी देशों ने सैन्य ही नहीं, वैधानिक तख्तापलट को भी बाजारवाद के लिये जरिया बना लिया। जन विरोधी सरकार और अमेरिकी मनमानी ने विश्व को एक ऐसे बड़े युद्ध के करीब ला कर खड़ा कर दिया कि ‘तीसरा विश्व युद्ध‘ किसी बहाने की खोज में है, और बहानों की कोई कमी नहीं है।

आज दुनिया का कोई भी देश सुरक्षित नहीं है। अमेरिकी साम्राज्य भी अपने पतन के मुहाने पर खड़ा है। वैश्विक वित्तीय ताकतों ने उसके राजनीतिक संरचना और अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर लिया है। सोवियत संघ का पतन पूंजीवादी विश्व के लिये भी घातक ही प्रमाणित हुआ।

सोवियत संघ के विघटन की बात करते हुए, हम इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, कि हमारे लिये यह 1917 के अक्टूबर क्रांति का शताब्दी वर्ष है।

-आलोकवर्द्धन

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