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नोटों के जाल में बेहाल

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सरकार की नीतियां बड़ी शानदार हैं।

वह अपनी सूरत बनाने और चमकाने में लगी है, इसलिये वह सिर्फ और सिर्फ अपने लिये काम कर रही है, और उन अपनों के लिये काम कर रही है, जो सरकार बनाने में उसके मददगार हैं, मालिक और आका हैं। जिनके हाथ में ‘पूंजी का चिराग‘ है। सरकार चिराग की जिन्न है।

जिन्न की हालत आज कल थोड़ी सी खराब है।

उसकी फिक्र यह है, कि पूंजी का चिराग जिन्न बदलता रहता है। एक जिन्न बद्नाम हुआ, तो दूसरा जिन्न तैयार है। पेश है! नया खिद्मदगार आम जनता की मुसीबत है।

आम जनता आज कल नोट बदली, नोट बंदी और नोटों की किल्लतें झेल रही है। नोटों के जाल में बेहाल है। कैशलेस है। कैशलेस ट्रांजेक्शन के गुर हजार हैं। पेटीएम से लेकर क्रेडिट और विजा कार्ड का प्रचार है। प्रचार पर प्रधानमंत्री जी की भोथर सी सूरत चिपकी हुई है। जिनके समर्थक लोगों को समझा-बुझा रहे हैं। नोटों के बिना काम चलाने की ओर धकिया रहे हैं। लिक्खाड़ों के लिये लिखने का मसाला है, और मीडिया के पास विज्ञापनों का कमाउ जरिया है। खबर बनाईये, खबर छुपाईये और खबरों के जरिये लोगों को बरगलाईये। चारो ओर मजाक और मजा है।

मजे की बात यह है, कि नोट बदली, नोटबंदी और नोटों की किल्लत की धक्का-मुक्की का समाधान कैशलेस ट्रांजेक्शन है।

लोगों को कैशलेस करना ‘यूएस-एड‘ का प्रोग्राम है। ‘अमेरिकी सहयोग‘ का कमाल है। भारतीय अर्थव्यवस्था और उसके मुद्रा बाजार पर कब्जा है। पैसा हमारा, सरकार की गारण्टी, मगर पैसा हमारे पास नहीं, उसे जमा रखने के लिये बैंक और लेन-देन के लिये बीच में बैठा दलाल है। दलाल वैश्विक वित्तीय ताकत है। उसे ही बीच में घुसाने और बैठाने का यह ताम-झाम है। यदि आप मुश्किल में हैं, तो रहें। नोट की किल्लत सुनियोजित षड़यंत्र है। सच यह है कि किल्लत बनी रहेगी।

जिस ‘यूएस-एड‘ को लात मार कर लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों में प्रतिबंधित करने की कोशिशें हुईं, वह भारत में पांव पसार रहा है। मोदी सरकार इन्हीं हरामखोर दलालों की सरकार है। देशभक्ति का यही राज है। दुनिया भर के मास्टर और विजा कार्ड पर बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों का आधिकार है।

अब तो आप समझ गये होंगे कि मोदी सरकार क्या कर रही है? क्या चाहती है? उसकी देशभक्ति और आम जनता के लिये प्यार कितना गहरा है?

उसकी मुश्किल यह नहीं है, कि आप कितने परेशान हैं? उसकी मुश्किल यह है, कि पांच राज्यों के घोषित चुनावी समर में यदि शिकश्त मिल गयी तो क्या होगा? उसकी मुश्किल यह है, कि वह वैश्विक वित्तीय ताकतों के हितों के लिये देश की आम जनता को देशभक्ति और आर्थिक विकास के सांचे में कैसे ढ़ाले? कैसे उसे अपने पक्ष में बना कर रखे? कैसे मोदी की छवि से उन्हें बेवकूफ बनाये? कैसे भाजपा मोदी से अलग अपनी पहचान भी ढूंढ रही है। वह भी नोटों के जाल में बेहाल है। उसे डर है और डर निर्मूल नहीं है। वित्तीय ताकतें सरकारों को हलाल करती रही हैं।

यह ‘शॉक ट्रीटमेंट‘ है। विकल्पहीन बना कर अपने फायदे का विकल्प देना। ‘पेटीएम‘ अभी सीधे तौर पर कोई कमीशन नहीं ले रहा है, मगर मास्टर और विजा कार्ड के साथ ऐसा नहीं है। सरकार के इस नीति की वजह से 2.5 प्रतिशत (कहीं ज्यादा, कहीं कम) कमीशन हमारे अपने पैसे के लेन-देन में सरकार और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हमसे ले लेती हैं। यही नहीं बैंकों में जमा हमारा रूपया आर्थिक विकास के नाम पर सरकार निजी कम्पनियों को थमाती जा रही है। हम नंगे के नंगे हैं, मगर उनके बदन पर सूट चढ़ रहा है, हमारे सूखे-टटाये बदन की वजह उन पर चढ़ी चर्बियां हैं। परत मोटी हो रही है।

और यह सब हमारे देश की चुनी हुई सरकार कर रही है। जिन्हें अपने देशभक्त होने का गुमान है, उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था के पांव में गुलामी की नयी बेड़ियां डाल दी है। सरकार इस बात को जानती है, और अंतर्राष्ट्रीय रूप से यह अनुभव है, कि वित्तीय ताकतें नयी सहुलियतों को पाने और अपनी शर्तों को मनवाने के लिये पूरी व्यवस्था को ठप्प करने की धमकियां देती रही हैं। अम्बानी साहब इस देश में ऐसा कर चुके हैं। आज जिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को हमारे लेन-देन के बीच बैठाया जा रहा है, वो ही कम्पनियां आने वाले कल में हमारे मुद्रा को अपने नियंत्रण में ले लेंगी। शर्तें उनकी होंगी और गाज हम पर गिरेगी। 125 करोड़ लोगों का बाजार उनके नियंत्रण में होगा। मानना होगा कि मोदी जी, भाजपा और संघ ‘देशभक्त‘ हैं। बड़े ‘देशभक्त‘। यह अब तक का सबसे बड़ा विश्वासघात, सबसे बड़ा घोटाला है।

-आलोकवर्द्धन

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