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‘आप इराक में असफल होंगे’ -सद्दाम – 1

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इराक की हत्या की गयी।

उसके संघर्षों को सद्दाम हुसैन की तरह फांसी के फंदे से टांग दिया गया।

आज भी इराक अमेरिकी साम्राज्य और साम्राज्यवादी ताकतों से उनके कारनामों के खिलाफ लड़ रहा है।

अमेरिकी आतंक और ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया – आईएसआईएस’ के खिलाफ लड़ रहा है।

इराक हमारे लिये लीबिया से पहले का सबक है। यह समझ है, कि अमेरिकी नेतृत्व में बहुराष्ट्रीय सेना, नाटो सैन्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र संघ क्या है?

अंतर्राष्ट्रीय अपराधियों की एक जमात ने इराक का न्याय किया। वह आज भी न्याय ही कर रही है।

और न्याय की समझ में यह बात ही नहीं है, कि वह किस अंधे कुवें में पड़ी है? अपराधियों की जमात से वह अपनी बांह छुड़ाये कैसे?

जिन आरोपों के तहत अमेरिकी नेतृत्व में बहुराष्ट्रीय सेनाओं ने इराक पर हमला किया, जिसको स्वीकृति संयुक्त राष्ट्रसंघ के सुरक्षा परिषद ने दी और विश्व समुदाय ने दर्शक बने रहने की बेवकूफियां की, इराक के पतन के बाद यह प्रमाणित ही नहीं हुआ कि इराक विश्व शांति के लिये खतरा है।

कि सद्दाम हुसैन के पास घातक हथियारों का जखीरा है।

कि 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकी हमले के पीछे इराक है। सद्दाम हुसैन हैं।

कुछ भी प्रमाणित नहीं हुआ, कोई प्रमाण नहीं मिला, मगर इराक का कत्ल हो गया। लाखों इराकियों को मार डाला गया। सद्दाम हुसैन को 30 दिसम्बर 2006 को फांसी के फंदे से टांग दिया गया।

चंद भयानक तस्वीरें हैं मेरे जेहन में, आप उसे देखना और जानना चाहेंगे?

आप जानना चाहेंगे कि इराक बलात्कार के बाद हत्या है।

कि आम इराकी अमेरिकी सेना के लिये एक नम्बर है।

कि इराकी बच्चे ने अपने बंदी पिता को देखा है।

अबूगरेब और ग्वांतेनामो से भी भयावह तस्वीरें हैं मेरे जेहन में। कई बार सद्दाम हुसैन मुझे अंगुलियों के बीच जलती सिगरेट, फैलते धुंवे और धुंवे की तरह हवा में गुम होते हुए दिखते हैं। उस आदमी की तरह बैठे दिखते है।, जिसने पूरी गरिमा के साथ अपनी लड़ाई लड़ी और जिसे सिगरेट खत्म कर के फांसी के तख्ते तक अपनी पूरी गरिमा के साथ उठ कर जाना है। जिसके पीछे जॉर्ज डब्ल्यू बुश यह देखने के लिये खड़ा है कि घुटने कांपते, पांव लड़खड़ाते हैं या नहीं? उसके कंधे झुकते हैं या नहीं? उसके चेहरे पर बद्हवासी आयी या नहीं?

हत्यारा मायूस हो जाता है, कि सद्दाम को यकीन था कि ‘इराक को तुम इराकियों से छीन नहीं सकते।’

बुतों को तोड़ने से इंसान नहीं टूटता।

सद्दाम ईंट-पत्थर और गारा नहीं। इराकी तेल कुओं में लगी आग बुझने को नहीं है।

तस्वीरों की बातें हम बाद में करेंगे। अभी तो मुझे तथ्यों के आधार पर आपसे बातें करनी है।

यह सच तो अब खुलेआम है, कि अमेरिका शांति और स्थिरता के खिलाफ है। उसने ही अफगानिस्तान, इराक और लीबिया को आतंकवादियों का गढ़ बनाया। लीबिया में कर्नल गद्दाफी के रहते आतंकवादियों को पांव रखने की जगह नहीं मिली, उन्होंने विकास के जरिये आतंकवाद को रोक कर रखा। ‘‘यदि सद्दाम हुसैन सत्ता में रहते तो ‘इस्लामिक स्टेट’ को वह सफलता नहीं मिलती, जो उसने हासिल कर ली है।’’ यह कहना है जॉन निक्सन का, जिन्होंने 13 दिसम्बर 2003 को अमेरिकी सैनिकों द्वारा सद्दाम हुसैन को हिरासत में लेने के बाद सबसे पहले उनसे पूछताछ की थी।

जॉन निक्सन ने उस घटना के 13 साल बाद अपनी एक किताब प्रकाशित की है, जिसका शीर्षक है- ‘डीब्रिफिंग द प्रेसिडेण्ट : द इन्ट्रोगेशन ऑफ सद्दाम हुसैन’। जॉन निक्सन ने लिखा- ‘‘पूछताछ के दौरान सद्दाम हुसैन ने हमारे अनुमानों को एकदम उलट कर रख दिया।’’ निक्सन के इस किताब को ‘टाईम’ और ‘डेली मेल’ द्वारा प्रकाशित किया गया है।

पूर्व सीआईए एजेन्ट जॉन निक्सन से जब यह पूछा गया कि ‘‘क्या होता यदि सद्दाम हुसैन अभी भी इराक में सत्ता में रहते?’’ तो उन्होंने निष्कर्ष के रूप में कहा- ‘‘अन्य परिणामों के साथ इतना तो तय है कि इस्लामिक स्टेट का उदय इतनी तेजी से नहीं होता। यह असंभव होता।’’ निक्सन ने लिखा- ‘‘यह असंभव था कि इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी गुट सद्दाम हुसैन के शासन काल में उनके दमनकारी नीतियों के सामने उतना सफल हो पाते, जितना शिया नेतृत्व में बगदाद सरकार के रहते उसने सफलतायें पा ली हैं।’’ निक्सन के अनुसार ‘‘सद्दाम हुसैन इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि जेहादी आन्दोलन के बढ़ने का मतलब क्या है? उन्होंने इस्लामिक आतंकी गुटों के खतरे को भांप लिया था, कि ये गुट उनकी सरकार के लिये सबसे बड़ा खतरा हैं। उनका सुरक्षा व्यवस्था विभाग इस खतरे को जड़ से उखाड़ने के लिये काम करता था।’’

सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल करने के लिये अमेरिका ने ऐसे ही आतंकी एवं जेहादी गुटों का समर्थन किया था। आज जिस इस्लामिक स्टेट के खिलाफ वह आतंकवाद विरोधी सैन्य अभियान चला रहा है, उसे उसने ही इराक और सीरिया में बढ़ाया है।

आईएसआईएस के बारे में निक्सन के इस अनुमान का अगस्त में जारी ‘चिलकोट रिपोर्ट’ भी समर्थन करता है, जो ब्रिटिश सांसदों द्वारा 2003 के इराक युद्ध में अपने देश की सम्बद्धता को तय करने के लिये आयोजित था।

यह रिपोर्ट यह प्रदर्शित करता है कि इराक पर कब्जा करने के तीन साल बाद 2006 में ब्रिटिश खुफिया अधिकारी इराक में सुन्नी जेहादी प्रतिरोध के उदय को लेकर काफी चिंतित थे। उनकी चिंता का कारण यह था कि रेडिकल्स अतिवादी और बर्खास्त इराकी सेना के कुछ लोग बाद में आईएसआईएस जैसे जेहादी गुटों में शामिल हो गये।

सीआईए एजेन्ट निक्सन सद्दाम हुसैन के मित्र नहीं हो सकते, यह हम जानते हैं, इसके बाद भी जॉन निक्सन ने लिखा- ‘‘न चाहते हुए भी इस बात की तारीफ करनी होगी कि सद्दाम हुसैन ने इराक को एक करके रखा। इस बात के लिये उन्हें सम्मान देना ही होगा।’’ निक्सन का निष्कर्ष इस सच की ओर खुला संकेत है, कि अमेरिकी नेतृत्व में 2003 के अभियान के बाद इराक में जिस तरह से शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच जितनी अराजकता बढ़ी उसे देखते हुए किसी को भी लग सकता है कि सद्दाम हुसैन विकल्प के रूप में बुरे नहीं थे। भले ही निक्सन ने सद्दाम हुसैन को ‘तानाशाह’ और उनकी नीतियों को ‘दमनकारी’ ही कहा है।

यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है, कि सद्दाम हुसैन यह जानते थे, कि अमेरिका के लिये इराक बड़ी असफलता ही प्रमाणित होगा। निक्सन ने कहा कि उन्हें सद्दाम हुसैन ने चेतावनी दी थी कि अमेरिका के द्वारा इराक की स्थिरता की कोशिश नाकाम होगी। उन्होंने कहा था- ‘‘आप इराक में असफल होने जा रहे हैं, क्योंकि आप न तो हमारी भाषा जानते हैं, ना ही हमारा इतिहास जानते हैं, ना ही आप अरबों की मानसिकता को समझते हैं।’’

मैं तो समझता हूं कि सद्दाम हुसैन ने इराक के अमेरिकी हत्यारों से बड़ी शराफत से बातें की, जिसे व्हाईट हाउस आज तक नहीं समझ सका। जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इराक को कत्लगाह बनाया और उसी कत्लगाह को लेकर बराक ओबामा लीबिया पहुंच गये। बीच में और भी कई मकाम हैं। सीरिया अमेरिकी समर्थक आतंकी गुटों का ऐसा दलदल है, जहां वो फंस भी गये हैं। इराक, अफगानिस्तान और लीबिया ने विश्व समुदाय को यह समझ भी दी कि ‘अमेरिकी मनमानी अब और नहीं।’ सीरिया में रूस की मौजूदगी ने अंततः अमेरिका और अमेरिकी समर्थक आतंकी और हंथियारबद्ध सीरियायी विपक्ष को वार्ता की मेज पर बैठने के लिये विवश कर दिया है। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी को इस बात से खुशी होगी कि बशर-अल-असद को अब तक न तो सत्ता से बेदखल किया जा सका, ना ही फांसी के फंदे से टांगा गया, और ना ही उनके सीने में गोली पैबस्त हुई।

मगर हम जानते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद जब तक है, अपनी हरकतों से बाज नहीं आयेगा। जॉन निक्सन अपने अमेरिकी और सीआईए एजेंट होने का हक अदा करते हुए लिखते हैं कि ‘‘वाशिगटन समर्थित इराकी सेना और मिलिशिया ने ‘इस्लामिक स्टेट’ को खत्म करने में कुछ सफलतायें हासिल की हैं, मगर हम अपने इस मकसद से काफी दूर हैं।’’ और यह दूरी तय होने को नहीं है।

सच यह है कि अल्कायदा हो या इस्लामिक स्टेट और उनसे जुड़े छोटे-बड़े आतंकवादी संगठन, उनमें से ज्यादातर अमेरिकी हितों के लिये काम करते हैं। यही कारण है कि आतंकवाद के खिलाफ जारी अमेरिकी सैन्य अभियान वास्तव में साम्राज्यवादी हमले और युद्ध के अलावा और कुछ नहीं है। एशिया और अफ्रीका में ये बहुराष्ट्रीय, नाटो सैन्य संगठन और अमेरिकी सेना के अग्रदूत हैं।

जारी

-आलोकवर्द्धन, अनुकृति

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