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‘आप इराक में असफल होंगे’ -सद्दाम – 2

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सद्दाम हुसैन जुलाई 1979 से अप्रैल 2003 तक इराक की सत्ता में रहे। 30 दिसम्बर 2006 को ईद-अल-अदहा के दिन उन्हें फांसी दी गयी। यह दिन इस्लाम के आधार पर ‘आत्मस्वीकृति और त्याग’ का दिन है। जिसे उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया, यह त्याग उनसे जबर्दस्ती लिया गया। वो अपने को इराक की चुनी हुई सरकार का राष्ट्रप्रमुख मानते रहे। उन्हें दी गयी फांसी इराक और सद्दाम हुसैन को ठिकाने लगाने की नाकाम कोशिश थी। एक देश और उसके राष्ट्रप्रमुख की हत्या।

आज इराक जो भी है, वह सद्दाम हुसैन और उनकी बाथ पार्टी के न होने और अमेरिका एवं साम्राज्यवादी ताकतों के होने की वजह से है। साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और जेहादी-आतंकियों की चपेट में इराक ध्वस्त है। आम इराकी अमेरिकी सेना और इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों की गिरफ्त में है। लगभग डेढ़ दशक से वह जंग के मैदान में जी रहे हैं। उन गिद्धों और बाजों के बीच जी रही है जिन्हें इंसानों को मुर्दा बनाने और मुर्दा मांस खाने में महारथ हासिल है। आम इराकी के पास न तो अपना देश है, ना अपनी सरकार है, और ना ही आने वाले कल की अच्छी उम्मीद है। उनकी उम्मीदें मरी हुई हैं।

जिस इराक की आम जनता के दमन के आरोप में सद्दाम हुसैन को अपराधी माना गया और फांसी की सजा दी गयी, वही आम इराकी आज हर कदम पर सद्दाम और उनकी सरकार के न होने को महसूस करती है। अपने महफूज न होने को झेलती है। जबकि जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अपने अमेरिकी राष्ट्रपति के वक्तव्य में कहा था- ‘‘यह इराक की आम जनता का आदेश है। सद्दाम को दी गयी फांसी की सजा उनकी इच्छा है।’’ उन्होंने कहा- ‘‘हालांकि सद्दाम हुसैन ने आम इराकियों का दमन कर भयानक अपराध किया है, मगर उन्हें निष्पक्ष न्यायिक कार्यवाही और निष्पक्ष न्याय मिला है। जो सद्दाम की तानाशाही में संभव नहीं था।’’

जबकि अमेरिका ने जो इराक में किया और कर रहा है, यदि हम सद्दाम हुसैन पर लगाये गये तमाम आरोपों को मान लें, तब भी अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और बराक ओबामा सौ सद्दाम हुसैन से भी बड़े अपराधी हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों की सरकारें युद्ध अपराधी हैं। जिन्हें कटघरे में खड़ा करने वाला कोई नहीं। जॉर्ज डब्ल्यू बुश जीवित है और बराक ओबामा सकुशल व्हाईट हाउस से विदा होने वाले हैं।

ईरान ने जब अमेरिकी समर्थक शाही राजवंश को इस्लाममी क्रांति के जरिये सत्ता से बेदखल किया था, तब वाशिंगटन ने सद्दाम हुसैन को मजबूत सहयोगी के रूप में देखा और उनका उपयोग किया। अमेरिकी सहयोग से इराक ने सितम्बर 1980 में ईरान पर हमला किया, लेकिन सद्दाम हुसैन को अपनी भूल का एहसास हो गया और उन्हें रक्षात्मक होना पड़ा। अगस्त 1988 में इराक-ईरान युद्ध का अंत हुआ। जिसमें 1 मिलियन से ज्यादा लोग मारे गये और 1.2 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक नुक्सान हुआ। जबकि दोनों देशों की सीमा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

आने वाले समय में इराक और अमेरिका के रिश्तों में दूरियां आती चली गयीं। अमेरिका ने जिस मकसद से सद्दाम हुसैन का समर्थन किया था, वह पूरा होता हुआ नहीं पा कर अमेरिकी सरकार सद्दाम विरोधी हो गयी।

अमेरिकी सरकार ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से 1990 में कुवैत पर हमला करने के लिये सद्दाम हुसैन को विवश किया। अमेरिकी राजदूत एप्रिल ग्लेस्पी ने प्रभावी भूमिका अदा की। उनके यह कहने पर कि ‘‘कुवैत का मुद्दा वाशिंगटन से जुड़ा हुआ नहीं है। इस युद्ध के बारे में वह कोई अलग धारणा नहीं रखता।’’ परिणामस्वरूप इराक ने कुवैत पर हमला कर दिया। जिससे इराक के आर्थिक हित भी जुड़े हुए थे।

अमेरिका ने सऊदी अरब के हितों को सुरक्षित करने के नाम पर ‘ऑपरेशन डेजर्ट शिल्ड’ नामक एक अंतर्राष्ट्रीय अभियान को संगठित किया। जनवरी 1991 में कुवैत को स्वतंत्र कराने के लिये ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म’ की शुरूआत की गयी। इराक के विरूद्ध अमेरिका और राष्ट्रसंघ ने प्रतिबंधों की घोषणां की जो आगे चलकर अमेरिकी नेतृत्व में बहुराष्ट्रीय सेना के द्वारा हमले की पृष्टभूमि बनी। गलत आरोपों के तहत इराक पर हमला हुआ। व्हाईट हाउस, पेंटागन और सीआईए यह प्रमाणित करने में नाकाम रहे कि सद्दाम हुसैन के पास जनसंहारक घातक हंथियारों का जखीरा है और 9/11 के आतंकी हमलावरों का साथ उन्होंने दिया था।

सद्दाम हुसैन को दी गयी फांसी के दौरान ‘नूर-अल-मलिकी सरकार के सुरक्षा सलाहकार मुवफ्फक-अल-रूबाई ने हाल ही में ‘आरटी अरेबिक’ को दिये इण्टरव्यू के दौरान कहा कि ‘‘सद्दाम हुसैन ने ना तो किसी किस्म की प्रार्थना की ना ही उन्होंने माफी मांगी।’’ उन्होंने उस दौरान लगाये गये नारों और स्लोगनों का उल्लेख किया-

इराक जिन्दाबाद।

इराकी आवाम जिन्दाबाद।

फिलिस्तीन विजयी हो।

अमेरिकी साम्राज्य का नाश हो।

जो सच हमारे सामने आया है उस आधार पर सद्दाम हुसैन ने इराक और इराक की आम जनता और फिलिस्तीनियों के जीत की ही नहीं अमेरिका के असफल होने और उसकी मृत्यु को भी सुनिश्चित माना था। उन्होंने कहा था- ‘‘आप मुझे दुबारा पाने की दुआ करेंगे।’’

रूबाई ने कहा कि ‘‘जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने सद्दाम हुसैन को दी जाने वाली सजा का समर्थन किया था। बुश ने इराकी प्रधानमंत्री अल् मलिकी से पूछा- ‘आप उस इंसान के साथ क्या करने जा रहे हैं?’ अल् मलिकी ने कहा- ‘हम उसे मृत्युदण्ड देने जा रहे हैं।’ इसके जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति ने ‘थम्स अप’ किया। इससे खुला समर्थन संभव ही नहीं था।’’ इराक की अमेरिका समर्थित सरकार ने सद्दाम हुसैन के साथ जो किया वास्तव में वह अमेरिकी कारनामे हैं। आज भी इराक का संकट अमेरिका की देन है। इराक और उस क्षेत्र की शांति एवं स्थिरता के लिये वह सबसे बड़ा खतरा है।

14 दिसम्बर 2011 को जब आखिरी अमेरिकी सैन्य टुकड़ियां इराक छोड़ रही थीं, तब बराक ओबामा ने कहा था- ‘‘हम अपने पीछे एक सम्प्रभुसत्ता सम्पन्न इराक छोड़ रहे हैं, जो स्थिर और आत्मनिर्भर है।’’

जिस समय ओबामा ने यह कहा था, उस समय भी यह झूठ था और आज 2017 में भी झूठ है। अमेरिकी सेना ने कभी इराक को मुक्त नहीं किया। यह उनका मकसद ही नहीं था। इस क्षेत्र की शांति और स्थिरता अमेरिकी हितों के विरूद्ध है। इराकी सम्प्रभुसत्ता अभी दूर की चीज़ है। दिसम्बर 2011 में इराक से अमेरिकी सेना की वापसी की औपचारिक घोषणां की गयी और 15 अप्रैल 2016 में ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया’ से लड़ने के बहाने 5000 अमेरिकी सैन्य टुकड़ियों की तैनाती फिर से इराक में हो गयी।

2003 से अब तक अमेरिकी नेतृत्व में हुए इराकी युद्ध में अब तक 1 मिलियन से ज्यादा इराकियों ने अपनी जान गंवाई है। और 6 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च अमेरिका इस युद्ध में कर चुका है। अन्य नाटो देशों का खर्च अलग है और इसका हासिल ध्वस्त इराक और इस्लामिक स्टेट है। कुछ ऐसा हासिल है जैसे एक पागल लोगों को मारता और चीज़ों को तोड़ता हुआ बढ़ रहा है। और वह अपने को शांति, स्थिरता, लोकतंत्र और मानवाधिकार समर्थक मानता है। वह अपने को इराक का ‘मुक्तिदाता’ मानता है। उसके अक्ल पर पत्थर और बारूद के बुरादे पड़े हैं। वह व्हाईट हाउस में रहता है। वॉलस्ट्रीट के इशारे पर नाचता और लड़ता है।

15 अप्रैल 2016 में ‘अरब यूथ सर्वे’ की जारी रिपोर्ट के आधार पर 18 से 24 साल के 93 प्रतिशत युवा इराकी अमेरिका को इराक का मुक्तिदाता नहीं बल्कि प्रमुख शत्रु मानते हैं। 6 प्रतिशत युवा इराकी ही अमेरिका पर विश्वास करते हैं, और 1 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिनकी अपनी कोई राय नहीं है। यह सर्वे इराक के तीन शहरों में 250 नौजवानों से मिल कर आमने-सामने लिया गया है। अमेरिकी विरोध का यह प्रतिशत अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल करने और उन्हें फांसी की सजा देने के बाद इराक की जैसी स्थिति है, उसने जो कभी सद्दाम विरोधी थे उन्हें भी सद्दाम हुसैन का पक्षधर बना दिया है।

-आलोकवर्द्धन, अनुकृति

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