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ट्रंप का व्हाईट हाउस में होना

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डोनाल्ड ट्रंप व्हाईट हाउस में हैं। यह किसी के लिये अच्छी खबर नहीं है, न संयुक्त राज्य अमेरिका के लिये, और ना ही विश्व समुदाय के लिये।

कहा यही जा रहा है, और प्रचारित भी यही किया जा रहा है। यह शायद पहली बार हो रहा है, कि अपने राष्ट्रपति के लिये आम अमेरिकी खुद को बंटा हुआ और अपमानित महसूस कर रहा है।

ट्रंप अमेरिका के ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं, जो खुले तौर पर व्यापारी हैं। उनके पास राजनीति नहीं, व्यापार का अनुभव है। अपने लिये एक ‘बिजनस अम्पायर‘ खड़ा करने का अनुभव है।

क्या दुनिया भर की सरकारें आज इसके अलावा कुछ कर रही हैं?

क्या मुक्त बाजार और नव उदारवादी वैश्वीकरण की सोच के बाद, किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसके अलावा कुछ किया है?

क्या पूंजीवाद समाज को बाजार बनाने के अलावा और कुछ है? जिसका मकसद वर्ग विभाजित समाज और तीसरी दुनिया का अबाध शोषण है।

क्या सरकारें पूरी तरह अब बाजार के कब्जे में नहीं हैं?

क्या सरकारों ने आम जनता की जिम्मेदारियों से हाथ नहीं खींच लिया है?

क्या सरकारें अब आर्थिक विकास के नाम पर वैश्विक वित्तीय ताकतों के लिये काम नहीं कर रही हैं?

आज आर्थिक सम्बंधों के अलावा किसी भी देश का दूसरे देश से कोई वास्तविक रिश्ता बचा है?

आज सरी दुनिया जिस वैश्विक खतरे को झेल रही है, वह बाजारवादी हस्तक्षेप के अलावा और कुछ नहीं है।

यदि यह सच है, तो यह भी सच है, कि व्हाईट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप का होना वैश्विक वित्तीय ताकतों की रजामंदी है। और अब जो भी हो रहा है, वह उनकी मरजी है। चाहे वह समर्थन हो या विरोध प्रदर्शन। विरोध प्रदर्शन में भले ही आम जनता की नाराजगी हो, लेकिन उसका उपयोग भी वैश्विक वित्तीय ताकतें ही कर रही हैं।

जिस अमेरिकी साम्राज्य का विघटन हमें नजर आ रहा है, उसका पतन उस दिन ही हो गया था, जब वॉल स्ट्रीट का कब्जा व्हाईट हाउस, अमेरिकी कांग्रेस और फेडरल रिजर्व पर हो गया था। आज 20 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज में डूबी अमेरिकी अर्थव्यवस्था, उसकी राजनीतिक संरचना और खुफिया तंत्र से लेकर दुनिया भर में फैली उसकी सेना का वजूद सिर्फ इसलिये है, कि वह बाजारवादी ताकतों के लिये काम कर रही है। ट्रंप का सनकी होना, महज दिखावा है। जन असंतोष और जनध्रुवीकरण को रोकने का नया प्रयोग है। यह बाजारवाद (साम्राज्यवाद) को बचाने की ऐसी नीति है, जो अमेरिका को गृहयुद्ध और विश्व को महायुद्ध के जाल में फंसा सकती है। ट्रंप का व्हाईट हाउस में होना इत्तफाक नहीं, सोची-समझी कार्यनीति है।

-आलोकवर्द्धन, अनुकृति

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