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गणतंत्र के पक्ष में खड़ा होने की चुनौती

Independence Day 2

विभाजन के बाद देश की आजादी को सुरक्षित रखने के लिये जिस लोकतंत्र और संघीय गणतंत्र की स्थापना की गयी थी, उसकी दिशा अब बदल गयी है। प्रतीक चिन्ह और आदर्शों का स्वरूप बदल गया है।

राष्ट्रगान में ‘अधिनायक’ पर जोर है।

राष्ट्रीय ध्वज उन हाथों में है, जिन्हें अशोक चक्र और तिरंगा से ज्यादा डण्डा पसंद है।

‘लोक कल्याणकारी राज्य’ और ‘समाजवाद’ भारतीय संविधान का ऐसा सच है, जिसे सरकार बनाने वाली राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय ताकतें तनी हुई रस्सी पर नट की तरह नचाती हैं। 15 अगस्त और 26 जनवरी को मजमा लगा कर विकास का करतब दिखाती हैं। यह दिखाती हैं कि ‘देखो, पहले इस देश में सुई नहीं बनती थी, अब मिसाइल बन रहे हैं।’

सुई से फटे-पुराने कपड़ों की मरम्मत तो हो जाती थी, मिसाइलें न जाने किसके काम आयेंगी?

बाजार के लिये लड़ाईयां वित्तीय हो गयी हैं, और वित्तीय ताकतों के हाथों में ऐसी सरकारें हैं जो युद्ध और युद्ध की आशंकाओं को सिर्फ इसलिये बढ़ाती हैं, कि हंथियारों का कारोबार चलता रहे, और आर्थिक विकास को आम जनता की पहुंच से बाहर रखा जा सके।

अर्थव्यवस्था का निजीकरण हो गया है। आर्थिक रूप से देश पहले से ज्यादा गुलाम है। सरकार और बाजार की साझेदारी पक्की हो गयी है। मिश्रित अर्थव्यवस्था ध्वस्त है और सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों का शिकार कर, कर के उन्हें निजी कम्पनियों के हवाले करती जा रही है। बैंकों एवं वित्तीय इकाईयों पर उन वित्तीय ताकतों का कब्जा है, जो सरकार की साझेदार है और सरकारें आम जनता के पैसों को बैंकों में जमा करा कर, उस पर अपना नियंत्रण ही नहीं बना रही हैं, बल्कि ‘कैशलेस ट्रांजक्शन’ के नाम पर सभी लेन-देन के बीच निजी कम्पनियों को बैठाती जा रही हैं। भारत में यह खेल चल रहा है। जो वास्तव में वित्तीय तानाशाही को स्थापित करने का जरिया है।

देश की सरकार ही लोकतंत्र और उसकी लोकतांत्रिक संरचना की सबसे बड़ी दुश्मन बन गयी है। और यदि लोकतंत्र के पक्ष में सरकार की नीतियों की आलोचना की जाती है, तो सरकार इसे ‘विकास विरोधी’ ही नहीं ‘राष्ट्र विरोधी’ भी बना देती है। उसने राष्ट्रवाद और देशभक्ति को अपने कब्जे में कर लिया है। लोकतंत्र, भारतीय गणतंत्र के पक्ष में खड़ा होना, एक बड़ी चुनौती बन गयी है। देश की आम जनता के हाथों से उसे छीन लिया गया है। उसकी नयी परिभाषा चुनी हुई सरकार का जनविरोधी होना है।

-आलोकवर्द्धन

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