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अपने को बचाने की लड़ाई

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‘कांग्रेस’ ने थोड़ा झुक कर ही सही, उत्तर प्रदेश में ‘समाजवादी पार्टी’ से चुनावी दोस्ती गांठ ली है। एक ऐसे गठजोड़ का निर्माण हो गया है, जो ‘बहुजन समाज पार्टी’ ही नहीं ‘भारतीय जनता पार्टी’ के लिये भी चुनौती है।

महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि कांग्रेस 105 और सपा 298 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। यह अनुपात सही है या गलत?

इस बात का भी महत्व नहीं है कि इस गठजोड़ के लिये प्रियंका गांधी और प्रशांत किशोर या डिंपल यादव और अखिलेश यादव ने क्या किया?

महत्व इस बात का है कि आंतरिक कलह से उबरी सपा और प्रदेश में अपनी जमीन तलाशती कांग्रेस ने यह मान लिया है कि चुनावी समर में भाजपा के विरूद्ध गठबंधन के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। मतों के विभाजन को रोकना और मतों के ध्रुविकरण को अपने पक्ष में करना ही एकमात्र विकल्प है। वैसे भी राष्ट्रीय स्तर पर गठजोड़ की सरकार भारतीय लोकतंत्र का चरित्र बन गयी है। देश के ज्यादातर राजनीतिक दल किसी न किसी मोर्चे से जुड़ हुए हैं। वाम मोर्चा भी है। जो खिसकते हुए वहां पहुंच गया है जहां उसे नहीं होना चाहिए।

वैसे भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर और प्रदेश स्तर पर अपने को जितना मजबूत दिखा रही है, उतनी मजबूत नहीं है। सामाजिक रूप से उसका वर्ग चरित्र साफ हो गया है। वह बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों के लिये राष्ट्रवाद को भावनात्मक रूप से स्थापित करने में लगी है, जहां जनहित के लिये कोई जगह नहीं है। वह अपने को बनाये रखने के लिये किसी भी स्तर तक जा सकती है। जिस स्तर पर गठजोड़ से ले कर दलबदल और भ्रष्ट राजनीतिकबाजों से लेकर दागियों को साथ कर रही है, यह चुनाव जीतने के लिये उसकी अपनी कार्यनीति है। प्रदेश चुनाव में भी नरेन्द्र मोदी को चेहरा बनाना भी उसकी कमजोरी और गिरावट है, जिनकी छवि में दरारें रोज पड़ रही हैं। संभवतः उसने झूठ को लगातार दोहराते रहने का निर्णय लिया है, ताकि वह सच की तरह लगे। उसके प्रचारतंत्र का आधार भी यही है। फिर भी वह आश्वस्त नहीं। 265 प्लस का दम निकला हुआ है। समर्थकों की हुंकारी में भी दम नहीं है।

बसपा भी अपने जनाधार को बचाने और बढ़ाने के प्रति आश्वस्त नहीं है। कांग्रेस-सपा गठबंधन उसके लिये भी चुनौती है। अल्पसंख्यक समुदाय और दलितों को वह संभाल नहीं पा रही है। अब तक उसके ही जनाधार पर सेंधमारी होती रही है।

प्रदेश में सभी राजनीतिक दल, कांग्रेस हो या सपा, बसपा हो या भाजपा, सभी अपने को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। खोने के लिये जिसके पास जितना ज्यादा है, उसकी बेचैनी भी उतनी ही बड़ी है। सपा के पास प्रदेश की सरकार है, और भाजपा के पास केन्द्र की ऐसी सरकार है, जिसके निशाने पर 2019 का लोकसभा चुनाव है। उसके ऊपर मोदी को बचाने की ऐसी जिम्मेदारी है, जिसे निभाने में उसे दिक्कतें आ रही हैं। मोदी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों के हितों का प्रतीक बन गये हैं, आम जनता के लिये जिनके पास वायदों, आश्वासनों, घोषणाओं और बकवास के अलावा और कुछ नहीं। मीडिया जिन्हें हीरो बना कर रखी है, मगर उसकी शाख लगातार घट रही है। ‘नोटबंदी’ और ‘कैशलेस ट्रांजक्शन’ का सच यदि सामने आ जाये तो भाजपा की हालत बिगल जायेगी, मोदी साहब को हीरो बनाये रखने में जो दिक्कते आ रही हैं, वह और बढ़ जायेगी। यही कारण है, कि भाजपा जातीय समिकरण, दलबदल, दागी, गठजोड़ के हंथकण्डों के साथ ‘विकास…विकास’ चिल्ला रही है। अपने को देशभक्त और राष्ट्रीय दिखा रही है। जिससे समाज का उदार और अल्पसंख्य वर्ग अब डरने लगा है। जिसकी वजह है। जिसकी बुनियाद है।

यह तय नही है, कि सरकार किसकी बनेगी? मगर चुनावी अभियानों की शुरूआत हो गयी है। राजनाथ सिंह ने पंजाब में कहा- ‘‘आप हमें वोट न दें, मगर जूता-लाठी-डण्डा तो न दें।’’ जो उत्तर प्रदेश में भी भाजपा कार्यकर्ताओं को मिलने लगा है। वजह नोटबंदी और कैशलेस ट्रांजक्शन की मोदीछाप नीति है। भाजपा पराजय को स्वीकार करने की मानसिकता नहीं रखती, सपा की ताकत भी कम नहीं है, इसलिये सहज और स्वाभाविक चुनाव की अपेक्षा रखना उतना आसान नहीं है, चुनाव आयोग जितना आसान मान रही है।

-आलोकवर्द्धन

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