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बाजार में बिके पतंगों की डोर

kites

खबरें
फैलायी गयीं राजभवनों से
कि ‘पतंग की डोर
हमारे हाथों में है।’
हमने बाजार में बिके पतंगों को देखा
आसमान में उड़ते,
हमने देखा अपने शहर को,
और छतों, मुंडेरों पर खड़े
पतंगबाजों को।
कौम
कुनबा
और जमातों से रंगी
पतंगें हैं आसमान में,
मगर क्षितिज को छूने की समझ
किसी में नहीं।
एक भी ऐसी पतंग नहीं
जिस पर टिके नजरें,
उम्मीदें ऊंचाईयों की बने छोटी ही सही।
आसमान
छोटा है उनका,
छोटी है उड़ानें
ऊंचाईयों की समझ भी छोटी है।
वो उछालते हैं पतंगों को आसमान में
कमंद की तरह,
कि खोल सकती हैं पतंगें
आसमान में उनके लिये खिड़कियां,
कामगरों
और कारिगरों का
हुनर दिखा सकती हैं।
पालतू परिन्दों की तरह
वो बाज को
कबूतरों के पीछे लगाते हैं
और देते हैं ढ़ील बाजार की डोर को,
मगर पतंग परिन्दे नहीं,
डोर थामे
पतंगबाजों का नहीं आसमान।
आसमान
सूरज और परिन्दों का है जनाब,
आप चाहे जो कहें
बाजार में बिके पतंगों की डोर
हमारे हाथों में नहीं है
भले ही खबरें
फैलायी जा रही हैं राजभवनों से
कि उड़ते पतंगों की डोर
हमारे हाथों में है।

-आलोकवर्द्धन

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