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चिनम्मा कोई सबक नहीं

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चिनम्मा कोई सबक नहीं।

राजनीतिक गलियारे में भ्रष्टाचार की परम्परा बड़ी समृद्ध है।

तमिलनाडु की राजनीति में वी. के. शशिकला सत्ता के गलियारे में ही रह गयी, उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के बाद सत्ता तक पहुंचने की कोशिशें जरूर की, मगर आय से अधिक सम्पत्ति का मामला, जिसे उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री दीवंगत जयललिता के साथ मिल कर, बड़े ही प्यार और अपनापन से गले लगाया था, वह गले पड़ गया।

सुप्रिम कोर्ट ने जयललिता के साथ मिल कर भ्रष्टाचार करने, आय से अधिक सम्पत्ति रखने और साजिशें रचने का दोषी करार दिया। चार साल की कैद और 10 करोड़ का जुर्माना भी है। सुप्रिम कोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा। वैसे कर्नाटक हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था।

शशिकला का दोषी पाया जाना जयललिता के दोषी होने का भी ठोस प्रमाण है, लेकिन अम्म जिन्दगी भर राजसत्ता का सुख भोग सकी और चिनम्मा बेचारी राजसत्ता के गलियारे में ही रह गयीं। राजसत्ता हासिल कर लेतीं तो अम्मा की जिंदगी उन्हें भी मिल जाती, लेकिन ऐसा नहीं हो सका और राजनीति का गलियारा जेल की कोठरियों की ओर मुड़ गया। शशिकला जेल में हैं।

निर्णय पर नजर डालिये तो लगेगा कि न्याय की सर्वोच्चता है। मगर उसकी समय सीमा और जयललिता को देखिये तो लगेगा पूरी व्यवस्थ कितनी लचर और लाचार है।

कानून है। व्यवस्था है। भ्रष्टाचार है। क्षमता और अधिकार है, मगर मुर्चा इतना लगा हुआ है, कि सभी पर भारी राजसत्ता और दांव पेंच है। सभी को कपड़े पहन कर बाहर निकलना पड़ता है, शराफत का यही तकाजा है, और सबसे बड़ी बात यह है, कि न तो व्यवस्था दोषी है, न सरकार दोषी है, और ना ही सरकारों के पीछे खड़ी वित्तीय ताकतें दोषी हैं। सिर से लेकर पांव तक पूरी व्यवस्था कीचड़ से सनी हुई है। केंद्र से लेकर राज्यों में सरकारें बनी ताकतें आरोपी हैं। न्यायालय के न्यायाधीशों पर भी आरोप है। और सभी मिल कर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं, देश की मीडिया भी यही कहती है।

यह सवाल ही पैदा नहीं होता, कि एक ऐसी व्यवस्था जिसकी राजनीतिक संरचना सड़ी हुई है जिसमें सरकार बने लोग अपने हितों के लिये वित्तीय ताकतों के साथ मिल कर देश और समाज को लूट रहे हैं। जिसका प्रचारतंत्र लोगों को गलत मुद्दे दिखाने में लगी है, उस व्यवस्था को बना कर रखना क्यों जरूरी है?

-आलोकवर्द्धन

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