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बद्जुबानी भी तो जुबान है

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बातों और बकवासों की राजनीति चल पड़ी है।

यह क्या कह दिया अखिलेश जी आपने कि ‘‘महानायक गुजरात के गदहों का प्रचार बंद करें।’’

अब आप ही बताईये, सदी ही यदि गदहों की है, तो सदी के नायक या महानायक क्या करें?

मोदी जी बड़े अच्छे आदमी हैं। पहले गुजरात के मुख्यमंत्री बने, अब देश के प्रधानमंत्री हैं। आप परेशान न हों, यदि गुजरात के गदहों के दिन बहुरे हैं, तो देश के गदहों के दिन भी बहुरेंगे। अच्छे दिन आ ही रहे हैं।

सदी के महानायक ने भी अपने को महानायक की जगह गदहा ही पाया था। जावोद साहब के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था- ‘‘एक जुमला याद आ रहा है – खुदा मेहरबान, तो गदहा पहलवान।’’

इसलिये गदहों से बिदकें नहीं, बेचारे निर्दोष जीव हैं। मलबा लादें या माल-असबाब, उन्हें फर्क नहीं पड़ता। वो समभाव समदर्शी होते हैं। एक गदहे की आत्मकथा, दूसरे गदहे की आत्मकथा से भिन्न नहीं होती। गदहापच्चीसी की उम्र बड़ी रंगीन होती है।

रंगीन सपने चायवाला भी देखता है, सियासतदां भी देखता है। उम्र ही ऐसी होती है।

मायावती जी कहती हैं- ‘‘मैंने शादी करके किसी को छोड़ा नहीं।’’

अच्छा किया बहन जी। मगर यह भी तो सोचिये कि ‘निगेटिव दलित मैन’ ने यदि एक को उपेक्षित-दलित बनाया तो क्या हुआ? उसने भी तो आपकी तरह अपना जीवन देश को समर्पित कर दिया है। उनके पास त्याग और समर्पण के अद्भुत किस्से हैं। बसपा यदि उनके लिये ‘बहनजी सम्पत्ति पार्टी’ है, तो भाजपा भी ‘मोदी सम्पत्ति पार्टी’ है। वो भी तो मोमेंट ही है।

जाने दीजिये, ऐसी बातें मोदी जी को ही करने दें। वो करिश्माई हैं। विकास पुरूष हैं। वायदों का पुलंदा हैं।

वो किसानों का कर्ज माफ करना चाहते हैं।

युवाओं को नौकरी देना चाहते हैं।

व्यापारियें को सुरक्षा देना चाहते हैं।

महिलाओं को सम्मान देना चाहते हैं।

अपनी सरकार बचाना चाहते हैं।

उत्तर प्रदेश में सरकार बनाना चाहते हैं।

ऐसा होता नहीं, मगर होता तो कितना अच्छा होता, कि प्रधानमंत्री के पास मुख्यमंत्री बनने की सुविधा भी होती। जहां भी भाजपा की सरकार होती वहां के मुख्यमंत्री भी मोदी होते।

उनकी सूरत उनके इरादों की जुबान है। यदि वो बद्जुबानी कर रहे हैं, तो करने दें, आखिर बद्जुबानी भी तो जुबान है।

क्या कीजियेगा, ‘पीएम’ का मतलब सुभाषनी जी ‘पॉकेटमार’ निकालती हैं, और कांग्रेस, सपा, बसपा का मतलब अमित शाह के दिमाग में ‘कसाब’ है।

-आलोकवर्द्धन

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