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सोवियत क्रांति और सोवियत संघ के पतन के बहाने – 1

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सोवियत संघ की सर्वहारा क्रांति का यह शताब्दी वर्ष है।

सोवियत क्रांति के साथ ही अब सोवियत संघ के विघटन का जिक्र जरूरी है, इसलिये नहीं कि सोच के स्तर पर मार्क्सवाद को असंदर्भित करार दिया जा सके, लेनिनवाद के समाज व्यवस्था के पांव के नीचे से समाजवाद की जमीन खींची जा सके, और दुनिया को सिर के बल खड़ा करके कहा जाये कि ‘‘पूंजीवाद का कोई विकल्प नहीं है।‘‘ कि समाजवाद एक ऐसा आदर्श है, जिसे हासिल नहीं किया जा सकता। इसलिये, सर्वहारा क्रांति का कोई मतलब नहीं है।

नहीं, यह गलत है।

मार्क्सवाद आज भी संदर्भित है।

लेनिनवाद आज भी समाजवादी क्रांति का आधार है।

और सिर के बल खड़ी दुनिया को पांव के बल खड़ा करने की अनिवार्यता आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है, क्योंकि पूंजीवाद संकटग्रस्त है। उसने विकास की तमाम संभावनायें खो दी है। विश्व आज विनाश के उस मुहाने पर खड़ा है, जहां फॉसिस्ट ताकतें मानव सभ्यता को समाप्त करने पर तुली हैं। वित्तीय साम्राज्यवाद और पूंजीवादी वित्तीय तानाशाही का सबसे भयानक चेहरा हमारे सामने है। जिसने आर्थिक रूप से सारी दुनिया पर कब्जा कर लिया है।

पूंजीवादी वैश्वीकरण, मुक्त व्यापार और बाजारवाद पूंजीवाद की नयी परिभाषा है। वह खुंख्वार, खूनी और आतंकी ही नहीं, विश्व के लिये सबसे बड़ा खतरा है। वह उस हत्यारे की तरह है, जो मरने से पहले आखिरी गोली वहां दागना चाहता है कि कहीं कोई न बचे। वह पेट फटने तक दुनिया को खा लेना चाहता है।

हमारे सामने यह गंभीर चुनौती है, कि हम अपनी दुनिया को, अपनों को और अपनी संभावनाओं को कैसे बचायें? जबकि समाजवादी खेमा उजड़ा हुआ है, और लातिनी अमेरिकी देशों में ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की जड़े कमजोर पड़ती जा रही हैं। बाजारवादी हमले हो रहे हैं। कह सकते हैं, कि 21वीं सदी का समाजवाद धीरे-धीरे असफल होता जा रहा है।

हम संक्रमण के उस ऐतिहासिक दौर में हैं, जहां पूंजीवाद मर तो रहा है, मगर मरने से पहले अपने को बचो की लड़ाई लड़ता हुआ समाजवादी संभावनाओं को भी खत्म कर रहा है। उसने यह दावा भी पेश किया है, कि ‘‘पूंजीवाद विकास की चरम अवस्था है।‘‘ कि ‘‘समाजवाद भी धीरे-धीरे पूंजीवाद में बदल जाता है।‘‘ कि ‘‘राज्य की इजारेदारी समाजवाद नहीं।‘‘

यह सच है, कि राज्य की इजारेदारी समाजवाद नहीं, और सोवियत संघ में पूंजीवाद की पुर्नस्थापना हुई है।

और दुनिया में जहां भी गैर-पूंजीवादी समाज व्यवस्था है, और जहां भी समाजवादी समाज व्यवस्था है, वहां पूंजीवादी अवशेषों ने अपने को पुर्नगठित कर लिया है। वो राजसत्ता की लड़ाई में शामिल हो गये हैं। मुक्त व्यापार और बाजारवादी वित्तीय संरचना की जड़े जम गयी हैं। इसके बाद भी सच है, कि पूंजीवाद संकटग्रस्त हैं वह आम संकट से घिरा है।

(जारी)

-आलोकवर्द्धन

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