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मुद्दों को खारिज करने की रणनीति

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उत्तर प्रदेश में भाजपा मुद्दों को खारिज रखने की रणनीति के तहत विधानसभा चुनाव लड़ रही है। वजह सिर्फ एक है, कि आर्थिक विकास एक पांव पर खड़ी है, और जन समस्याओं का समाधान उसके पास नहीं है। जिसे वह केंद्र में मोदी सरकार की उपलब्धियां समझती है, उसने आम जनता की दुश्वारियों को बढ़ा दिया है। बाजार और कीमतें बे-लगाम हैं, राजनीतिक गिरावट अपने चरम पर है, सामाजिक खाईयां चौड़ी हुई हैं, और नोटबंदी के तमाम दावे झूठ का पुलंदा बन कर रह गये हैं। कालाधन और आतंकवाद पर लगाम लगाने के इरादों में दम नहीं। बेदम खयालों का प्रचार हो रहा है।

भाजपा मतदाताओं से सौदेबाजी कर रही है, कि ‘हमारी सरकार बनाओ, उपहार ले जाओ!‘ वह देख नहीं पा रही है, कि जिस नरेंद्र मोदी की लोकलुभावन छवि को रगड़-घिस कर चमकाया गया है, उसकी चमक फिकी पड़ गयी है। नरेंद्र मोदी कांग्रेस, सपा और बसपा पर निजी आरोपों के सहारे चुनावी सभायें कर रहे हैं। अमित शाह और केशव मोर्या रोड शो कर रहे हैं। ऐसी बातें कर रहे हैं, जैसे ‘जागीर अपनी है।‘ उनकी मीडिया सेल सक्रिय है और भीड़ दिखाने के लिये ‘फोटोशॉप‘ का सहारा लिया जा रहा है। मोदी के अपने लोक सभा सीट की हालत अजीब है। आम बनारसी की प्रतिक्रिया अभद्र है- ‘‘बुजरो वाले तीन साल से तो कुछ कइलन नाही, अब गांव में श्मशान बनई हें।‘‘

वैसे, मतदाताओं की सकारात्मक प्रतिक्रिया किसी भी राजनीतिक दल के लिये नहीं है। ले-दे कर सपा-कांग्रेस के लिये ‘हारे को हरिनाम‘ की सोच है। बसपा तीसरे नम्बर पर दिख रही है।

चंद रोज पहले मजमा लगाने वाले दो लोग आये। एक ने जादूगर का चोंगा पहन लिया और दूसरे ने डमरू बजा कर भीड़ जमा किया। 20-25 लोग जमा हो गये। जादूगर ने ‘हाथ की सफाई‘ दिखायी। सौ का नोट कहीं से निकाला और उसे गायब किया। लोगों को हंसाया, कुछ ओछी हरकतें भी की और फिर-

‘‘भाईयों और बहनों! जादू की इस झोली में आपका विकास भरा है। आपके लिये इस जादू की इस झोली से मैं विकास निकालुंगा।‘‘ और सवाल किया- ‘‘आप विकास चाहते हैं?‘‘

भीड़ को खटका हुआ, कि ‘‘कुछ तो गड़बड़ है‘, मगर उसने कहा- ‘निकालो!‘

और जादू की झोली से भाजपा का झण्डा निकला।

‘‘यह है विकास!‘‘ उसने कहा।

और झण्डे को किसी को थमा कर नरेंद्र मोदी की तस्वीर निकाली

‘‘यदि आप विकास चाहते हैं, तो मोदी जी की सरकार बनायें। सड़क, नाली, सीवर मिलेगा। बिजली, पानी और विकास मिलेगा।‘‘

भीड़ छंट गयी।

दोनो मजमाबाज दूर खड़ी गाड़ी में बैठ कर रवाना हो गये।

सवाल था- ‘‘ई जादू चली?‘‘

जवाब तो है, मगर चुनाव के बाद परिणामों की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। वैसे यह बात बिल्कुल तय है, कि सरकार चाहे जिसकी बने, आम जनता की सरकार नहीं बनेगी। आम जनता इस बात को नहीं जान रही है, मगर के आम चुनाव और 2017 के विधान सभा चुनावां के बीच ऐसा कुछ जरूर हुआ है, कि जिस भाजपा के वायदों और आश्वासनों पर उसने यकीन किया था, उसी भाजपा के वायदों और आश्वासनों पर अब वह विश्वास नहीं कर रही है। वह शिकार तो बनी है, मगर शिकार बने रहने की उसकी मानसिकता नहीं रह गयी है। उसकी समझ में आने लगा है, कि जुमलों की राजनीति मुद्दों को खारिज करने का षडयंत्र है।

भाजपा जिस चुनावी रणनीति को अपने प्रचार अभियानों का आधार बना चुकी है, मूलतः वह गलत है।

-आलोकवर्द्धन

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