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पार्टी की तरह दिखते नेता

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राजनीतिक दल की तरह दिखते नेता यदि मौजूदा उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की विशेषता है, तो भारतीय लोकतंत्र के लिये यह घटित होती दुर्घटना भी है। जिसकी शुरूआत भले ही राष्ट्रीय कांग्रेस के विभाजन से हुई, मगर जिसका चरम भाजपा के नरेंद्र मोदी हैं। जिसे चुनावी लोकतंत्र के जरिये खुले आम बढ़ाया जा रहा है। जिसके पीछे ‘एक नेता‘ की फॉसिस्ट सोच है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा नरेंद्र मोदी हैं।

कांग्रेस, राहुल गांधी हैं।

सपा, अखिलेश यादव हैं।

बसपा, मायावती हैं।

बाकि जो भी हैं, उनका कोई खास वजूद नहीं है। वो गठबंधन से जुड़े ऐसे राजनीतिक चेहरे हैं, जो ‘अपना दल‘ की अनुप्रिया पटेल की तरह घूम-फिर रहे हैं।

भाजपा का चुनावी चेहरा बने नरेंद्र मोदी भारी सुरक्षा के बीच, खुली गाड़ी में घूम कर जा चुके हैं। उन्हीं की सूरत पोस्टर, बैनर और विज्ञापनों का मसाला हैं।

‘जनता जनार्दन के दर्शन‘ के नाम पर रोड़ शो हुआ।

‘काशी विश्वनाथ‘ और ‘काल भैरव‘ मंदिरों में मत्था टेका गया।

बड़ी-बड़ी और ओछी बातें हुईं। मकसद एक है- उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बने और 2019 का चुनावी लक्ष्य सधे।

उनके चेहरे के आस-पास कोई स्थानीय चेहरा नहीं है। भाजपा और संघ उनके पीछे है। जहां नाराजगी और असहमति है। असंतोष भी है। नहीं है तो यह समझ कि नरेंद्र मोदी को खड़ा करके भाजपा मर रही है। चुनावी परिणाम चाहे जो भी आये भाजपा और नरेंद्र मोदी दुर्घटनाग्रस्त हो गये हैं। केंद्र का पूरा कैबिनेट बनारस में डंटा रहा।

मीडिया मोदी का प्रचार कर रही है। जो है, उसे बड़ा करके दिखा रही है। समाचारपत्रों के मुख्य पृष्ठ पर मोदी के कार्यक्रमों का ‘फुल पेज‘ विज्ञापन है। उन्हीं की खबरों और विज्ञापनों से अखबार पटे हैं। मतदाताओं को ‘ओवर डोज‘ मिल रहा है। मोदी वायदे भी किये और बकवास भी, मगर ‘यूपी को ये साथ पसंद है‘ और ‘काम बोलता है‘ में सेंधमारी, शायद नहीं हो सकी है। ‘राहुल-अखिलेश का रोड शो‘ मोदी के रोड शो पर भारी पड़ा है। भाजपा-संघ को इस बात पर विश्वास नहीं है, कि मोदी के अलावा उत्तर प्रदेश में कोई ऐसा नेता भी है, जो मुख्यमंत्री का चेहरा बन सके। इसलिये 2014 के आजमाये हुए चुनावी नुस्खे -‘अबकी बार, मोदी सरकार‘ की तर्ज पर ‘अबकी बार भाजपा सरकार‘ भी वह नहीं कर पा रही है, क्योंकि ‘अबकी बार‘ के साथ ‘अच्छे दिन आने वाले हैं‘ का सवाल जुड़ गया है।

जवाब में अमित शाह ‘न आने का ठिकरा‘ सपा-कांग्रेस पर फोड़ते फिर रहे हैं। वो यह बताने लायक नहीं हैं, कि जहां भाजपा की सरकार है, वहां ‘अच्छे दिन‘ की हालत क्या है? क्या ‘अच्छे दिन‘ राज्यों में भाजपा की सरकार के बनने के बाद का वायदा है?

भाजपा ‘अबकी बार‘ और ‘अच्छे दिन‘ से बच कर ‘ना गुण्डा राज, ना भ्रष्टाचार, आओ बनायें पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार‘ से काम चला रही है।

यह काम चला या नहीं?

नहीं कहा जा सकता, मगर नरेंद्र मोदी ऐडी चोटी का जोर लगा कर जा चुके हैं। धर्म-जाति का समिकरण बैठाया गया है। ‘यह करेंगे‘ ‘वह करेंगे‘ के वायदे हुए हैं। चुटकुले बाजी और तंज कसे हैं। चुनाव को मुद्दों से खिसका कर निजी वारदातों में बदलने की कोशिशें हुई हैं। चुनावी राजनीति निचले दर्जे पर है। उसे जितना गंदा और बकवासी बनाया जा सकता है, उतना बनाया गया है।

राहुल-अखिलेश ने तमाम समिकरण के साथ विकास को मुद्दा बनाया है। जिन सवालों से भाजपा कतराती है, और मोदी भागते हैं, उन सवालों को भी खड़ा किया है। मायावती मूर्तियों से तौबा करती नजर आती हैं। ‘रोड शो‘ का प्रायोजित जनसैलाब उन्माद फैलाने का नया तरीका है। अपने प्रचार अभियान में मोदी जी ‘जन नायक‘ बन गये हैं। यह अलग बात है, कि बेचारे न तो गांधी हैं, ना ही जय प्रकाश नारायण हैं।

क्या आपको नहीं लगता कि उनकी दावेदारी की दिशा ही गलत है? जनता और जन प्रतिनिधि के बीच आया यह ‘जन नायक‘ गलत है? ऐसी गलती सपा-कांग्रेस ने भी की है। अखिलेश और राहुल गांधी ने अपने वक्तव्य में सपा-कांग्रेस गठबंधन को दो युवा नेताओं का गठबंधन कर दिया है। आखिर राजनीतिक दलों को नेताओं के पीछे छुपाने का क्या मतलब है? क्या लोकतंत्र चुनावी करतब है? राजनीतिक दल नेताओं का गिरोह है?

-आलोकवर्द्धन

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