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चुनी हुई सरकारें लोकतंत्र के लिये बड़ा खतरा

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चुनाव जनतंत्र का झूठा चेहरा बन कर रह गया है।

आम जनता चाह कर भी अपना प्रतिनिधि नहीं चुन सकती।

जिन जन प्रतिनिधियों से जनतंत्र में चुनी हुई सरकारें बनती हैं, वे जन प्रतिनिधि आम जनता का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते।

राजनीतिक दल अपना उम्मीदवार खड़ा करते हैं, और संवैधानिक तरीके से हमसे कहा जाता है- ‘‘हम अपना प्रतिनिधि चुन लें।’’

मतलब? जिन उम्मीदवारों को राजनीतिक दलों ने हमारे लिये तय किया है, हमें उन्हीं में से किसी एक को अपना प्रतिनिधि चुनना पड़ता है। जिन्हें सामने खड़ा कर के प्रचार अभियान चलाया जाता है, झूठे-सच्चे वायदे किये जाते हैं, खुलेआम सौदेबाजी होती है, धर्म-जाति और समुदायों का समिकरण बैठाया जाता है, वैध-अवैध तरीके अपनाये जाते हैं। तमाम दावों का सच सिर्फ इतना है, कि हम चार-पांच साल के लिये अपना वैधानिक हाथ कटवा लेते हैं, अपनी गिरेबां थमा देते हैं। कहा जाता है- ‘अपनी सरकार बना लेते हैं।’

ऐसी सरकार बना लेते हैं, जो हमसे ज्यादा उन ताकतों का खयाल रखती है, जो उनसे समझौते करती है, पानी की तरह पैसा बहाती है, प्रचार अभियान चलाती है, मतदाताओं के हाथ पकड़ कर अपने हिस्से उनका मत ले लेती है।

सरकार बनाने की वैधानिक औपचारिकतायें पूरी हो जाती हैं। यह मान लिया जाता है, कि देश की आम जनता ने अपने लिये अपनी सरकार बना ली है।

खबर अच्छी लगती है, और यह भी लगता है, कि ‘भाई वाह, सरकारें अब हमारा काम करेंगी।’

भले ही, अब तक का अनुभव हमारा यह नहीं है।

आजादी के पांच दशक बाद तक की सरकारें वर्ग एवं समुदायों के बीच आर्थिक एवं सामाजिक संतुलन को कुछ तो बना कर चल रही थीं। संविधान में घोषित लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणां को ले कर चल रही थीं। आर्थिक विकास की नीतियों में समाज खारिज नहीं था। लोगों को बेवकूफ बना कर रखने की सोच साफ नहीं थी। लेकिन अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और नवउदारवादी वैश्वीकरण की सोच ने आम आदमी के हितों को सिर के बल खड़ा कर दिया।

सरकारें देश की आम जनता की मूलभूत जिम्मेदारियों से हाथ खींचती जा रही हैं।

देश की मौजूदा सरकारें (केन्द्र एवं राज्यों की सरकारें) कुछ ऐसी ही हैं। सरकारें निजी वित्तीय पूंजी और बाजार के हाथों बिकी हुई हैं। आर्थिक विकास के नाम पर देश की अर्थव्यवस्था का निजीकरण हो रहा है। केन्द्र की संसद और राज्यों की विधान सभाओं को एक ही कपड़ा पहनाया जा रहा है। वैश्विक वित्तीय ताकतों -राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों- के लिये उन्हें वैधानिक इकाईयों में बदला जा रहा है। सरकारें देश की प्राकृतिक सम्पदा, श्रम एवं बौद्धिक सम्पदा को बेचने वाली दलाल बन गयी हैं। सरकारों की तरह सरकार बनाने की चुनावी प्रक्रिया और राजनीतिक दलों का भी निजीकरण हो रहा है।

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में यह प्रक्रिया बड़ी साफ नजर आयी। कांग्रेस राहुल गांधी बन गये, समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव बन गये, बहुजन समाज पार्टी मायावती बन गयीं, और भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह नरेन्द्र मोदी बन गयी। लोकतंत्र का चुनावी ढ़ांचा ही संकटग्रस्त हो गया। जन प्रतिनिधियों को इतना बौना बना दिया गया है, कि वो प्रदेश की आम जनता का प्रतिनिधित्व कर ही नहीं सकते।

इस मामले में भाजपा इकलौती ऐसी पार्टी है राष्ट्रीय स्तर पर, जिसके पास नरेन्द्र मोदी के अलावा कोई दूसरी सूरत नहीं है। मोदी ऐसे प्रचारित ‘जन नायक’ है। जो कॉरपोरेट जगत का प्रतिनिधित्व करते हैं। लोकतंत्र के लिये यह जरूरत से ज्यादा बड़ा खतरा है, कि उसका वजूद आम जनता पर नहीं, राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मर्जी पर निर्भर है। यह कड़वी सच्चाई उभर कर सामने आ रही है, कि चुनी हुई सरकारें ही लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा हैं।

-आलोकवर्द्धन

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