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पोस्टर

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‘जो गुनाह
हमने किये नहीं
उन गुनाहों की सजा हमें मिलेगी’,
खबर पक्की है।
और मैं समझता हूं
कि सजा हमें मिलनी भी चाहिए
कि हमने देखा नहीं
उस कल को बिगड़ते हुए
जो हमारा आज है…शहादत के बाद
नयी शहादतें लेता हुआ।
हमने देखा नहीं
फटे हुए पोस्टरों को आपस में जुड़ते हुए
गोला-बारूद
और रूपये की पोटली सहेजते हुए,
बैंकों और बाजार की ताकतत से जुड़ते हुए।

यह गुनाह है
कि हमने मान लिया
लोकतंत्र कहीं जायेगा नहीं
बैठा रहेगा संसद भवन में
बैठा रहेगा सड़क के किनारे।
फासिस्टों के फटे पोस्टर,
उपनिवेशों के उतरे झण्डे की
वापसी नहीं होगी,
नहीं लौटेंगे जहाजी बेड़े,
निजी कम्पनियां नहीं लौटेंगी
पाउण्ड
डॉलर
और युआन की हंथकड़ी-बेड़ियों के साथ।

यह गुनाह है
कि बढ़ते खतरे को
हमने सूंघा नहीं,
लोकतंत्र को अंधा होने दिया।
नहीं दी अंधे को अपनी आंखें
लूले-लंगड़े को अपना हाथ-पांव
अपना दिल, दिमाग नहीं दिया।
अंधी अदालतों को
तय करने दिया
चुनी हुई सरकारों के तौर-तरीके।
हमने रोजी-रोजगार
और रोटी के दलालों को नहीं रोका,
बाजार को बढ़ने दिया
सरकारों को बिकने दिया
झूठ और फरेब के पोस्टरों को, फिर से चिपकने दिया।

यह गुनाह है
कि चुनी हुई सरकारों को
हमने लोकतंत्र का दर्जा दिया,
और उसे
उन्हें सौंप दिया
जिन्होंने काटे उसके हाथ-पांव
उसे लूला-लंगड़ा बनाया,
बनाया संसद और सड़क का भिखमंगा।
यह गुनाह है
कि हमने
चुनी हुई सरकारों को
बाजार का साईनबोर्ड बनने दिया,
उस जन-जत्थे का इंतजार किया
जो लाल पताके फहराता अब तक नहीं गुजरा
और लोकतंत्र फासिस्टों का पोस्टर बन गया।

-आलोकवर्द्धन

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