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पूंजी के वर्चस्व और राजनीतिक अराजकता का समय

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बाजारवाद ने राज्य की सरकारों को आतंकी संगठन और समाज को मुक्त व्यापार का क्षेत्र बना दिया है। उसने समाजवादी समाज व्यवस्था के विकास की संभावनाओं को ही खत्म नहीं किया है, बल्कि जिस पूंजीवादी समाज व्यवस्था ने उसे जन्म दिया उसकी सामाजिक, आर्थिक एवम् राजनीतिक संरचना को भी उसने निगल लिया है। इसके बाद भी उसे इत्मिनान नहीं। युद्ध, आतंक और एक के बाद दूसरे ऐसे वित्तीय संकट की शुरूआत हो गयी है, जिसका समाधान उसके पास नहीं है।

विश्व संक्रमण के उस भयानक दौर से गुजर रहा है, जहां पूंजी राज्य के नियंत्रण से बाहर है और उसने राज्य की सरकारों को अपने नियंत्रण में ले लिया है। कह सकते हैं कि यह पूंजी के वर्चस्व और राजनीतिक अराजकता का समय है।

दो तथ्य हमारे सामने हैं-

-निजी पूंजी की वित्तीय तानाशाही, और

-राजनीतिक एकाधिकार के रूप में उभरता फॉसिस्टवाद।

विश्व की आधी से अधिक सम्पत्ति कुल 8 लोगों के पास है, और कर्ज में डूबी सरकारें दीवालिया होने की कगार पर खड़ी हैं। पूंजीवादी विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था -संयुक्त राज्य अमेरिका- पर 20 ट्रिलियन डॉलर का बढ़ता हुआ कर्ज है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और कई क्षेत्रों में सबसे बड़ी चीन की अर्थव्यवस्था पिछले सालों से सुस्त आर्थिक विकास की गिरफ्त में है। दुनिया की सभी पांच बड़ी अर्थव्यवस्था इन्हीं वैश्विक वित्तीय ताकतों की मजबूत पकड़ में है। रूस की अर्थव्यवस्था की हालत भी अच्छी नहीं।

हमारा मकसद 16 जनवरी 2017 को जारी ऑक्सफेम रिपोर्ट पर चर्चा करना नहीं है, बल्कि यह बताना है कि जिस अनुपात में पूंजी का केन्द्रियकरण निजी क्षेत्रों में हो रहा है, उसी अनुपात में सरकारें आर्थिक संकट से घिरती जा रही हैं। कि वित्तीय तानाशाही के साथ राजनीतिक तानाशाही का खतरा भी बढ़ रहा है। दोनों ही ताकतों के बीच की दोस्ती सरकार और बाजार की साझेदारी है।

ऑक्सफेम रिपोर्ट के आधार पर जिन आठ लोगों के पास दुनिया की आधी सम्पत्ति है-

बिल गेट्स – 75 बिलियन डॉलर – अमेरिका

अमेसियो ओरटेगा – 67 बिलियन डॉलर – स्पेन

वारेन बफे – 60 बिलियन डॉलर – अमेरिका

कारलोस स्लिम – 50 बिलियन डॉलर – मैक्सिको

जेफ बेजोस – 45.2 बिलियन डॉलर – अमेरिका

मार्क जुकरबर्ग – 44.6 बिलियन डॉलर – अमेरिका

लैरी एलिसन – 43.6 बिलियन डॉलर – अमेरिका

माइकल ब्लूमबर्ग – 40 बिलियन डॉलर – अमेरिका

यदि यह रिपोर्ट 2016 के अंत में जारी की गयी होती तो इनकी संख्या 9 होती। चंद महीनों में ही एक बिलियनेयर की तादाद घट गयी।

रिपोर्ट में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2017 से 7 साल पहले दुनिया की आधी से अधिक सम्पत्ति 388 लोगों में बंटी हुई थी। गये साल इनकी संख्या 62 हो गयी। और एक साल में यह घट कर मात्र 8 है। यह वही दौर है जब विश्व की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही थी, जिसकी शुरूआत अमेरिका में हुई, जहां आज 8 में से 6 बिलियनेयर हैं। आज जहां नस्लवादी, रंगभेद से पीड़ित ट्रम्प की सरकार है। जिसके खिलाफ लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। और तीसरी दुनिया के देशों के लोगों पर नस्लवादी हमले हो रहे हैं, जिनमें भारतीय भी हैं। जहां मोदी की चुनी हुई कॉरपोरेट सरकार है।

भारत में बिलियनेयरों एवं मिलियनेयरों की तादाद बढ़ी है, जहां नवउदारीकरण की नीतियों के तहत सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण हो रहा है। भारत की आम जनता ‘अच्छे दिनों’ की बाट जोह रही है, जो ‘मेक इन इण्डिया’ से ‘न्यू इण्डिया’ तक पहुंच गयी है। 2014 की उम्मीदों को अब 2022 तक खींच दिया गया है। आर्थिक विकास का मतलब वित्तीय रूप में अर्थव्यवस्था का निजीकरण और राजनीतिक रूप से राजसत्ता पर मोदी का एकाधिकार है। जिसके पीछे वॉलस्ट्रीट की कम्पनियां हैं। बैंक, वित्तीय इकाई, संगठित मीडिया और वो प्रतिक्रियावादी ताकतें हैं, जो धर्म, राष्ट्र और नस्लवादी सोच रखती हैं। भारत में फॉसिस्टवाद चुनी हुई सरकारों के तौर-तरीके से आगे बढ़ रहा है। जिसका मकसद निजी पूंजी की वित्तीय तानाशाही है। जो राजनीतिक अराजकता की ओर बढ़ रही है।

-आलोकवर्द्धन

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