Home / साहित्य / मुद्दा साहित्य के छोटा या बड़ा होने का नहीं

मुद्दा साहित्य के छोटा या बड़ा होने का नहीं

pen-1743189_1280

साहित्य में राजनीति की बात चलती रहती है, मगर समझ यह पैदा की जाती है, कि राजनीति की बात करने से साहित्य छोटा हो जाता है।

क्या वास्तव में ऐसा होता है?

क्या यह साहित्य को उसके समय से काट कर देखने का आग्रह नहीं है?

क्या यह समाज और उसकी दिशा को तय करने वाले वर्ग को खुली छूट देना नहीं है, कि आप राजनीति करें, राजसत्ता को अपने कब्जे में रखें, हम इसके सही या गलत होने की बात नहीं करेंगे। हमें शोषित, भिखमंगा और गैरजिम्मेदार बने रहना मंजूर है।

वजह कुछ खास नहीं।

बात बस इतनी है, कि समाज से ज्यादा साहित्य के दर्जा को ऊंचा रखने की जिम्मेदारी हम पर है।

कृष्ण महारथि, परमब्रम्ह हैं।

कोई बात नहीं।

महाभारत राजसत्ता और साम्राज्य की लड़ाई है।

चलेगा। भगवत् गीता भी पढ़ें।

राम मर्यादा पुरूषोत्तम हैं। राजा हैं। भगवान हैं।

रामायण, रामचरित्र मानस आदर्श राजा, राज्य और राजतंत्र का समर्थन है। उन्हीं की गाथा है।

यह राजनीति नहीं है। साहित्य है। जन मानस का साहित्य है।

यह भी राजनीति नहीं है, कि राम को स्थापित करने के लिये अयोध्या में मंदिर का निर्माण हो। बाबरी मस्जिद का ध्वंस हो।

समाज का एक समुदाय डरता है, तो डरे। यह बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का मामला है। उसकी मानें तो आपको कोई डर नहीं। असुरक्षा नहीं। विवाद का आपसी समाधान ऐसी वार्ता है कि ‘‘आप मुझे मन्दिर दें, मैं आपको मस्जिद दूंगा।’’ बात मानें तो बात बनी रहेगी।

मुद्दा राजनीति की बात न करने और साहित्य को ऊंचा उठा कर रखने का है।

शोषण, दमन और अत्याचार के खिलाफ खड़ा होना राजनीति है।

शोषण, दमन और अत्याचार के पक्ष में रहना या चुप रहना राजनीति नहीं है।

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि साहित्य और राजनीति के बीच की दूरियां सत्तारूढ़ वर्ग का वर्गहित बढ़ाता है?

सत्तारूढ़ वर्ग के हित में लिखे गये किसी भी साहित्य को कभी भी सामाजिक एवं वैधानिक चुनौती का सामना नहीं करना पड़ता। उन्हें मान-प्रतिष्ठा एवं सम्मान मिलता है, उनके लिये सामाजिक स्वीकृति का वातावरण बनाया जाता है। इसके विपरीत समाज के बहुसंख्यक – श्रमजीवी वर्ग के हितों में खड़े साहित्य को प्रतिबंधों से लेकर हिरासत और मुंह बंद कराने का जोखिम उठाना पड़ता है। उन्हें संगठित अभियान का शिकार बनाया जाता है। उन्हें खुले रूप में राजनीतिक हितों से प्रेरित देशद्रोही करार दिया जाता है। जुबान खींचने, हांथ काटने और ऐसे रचनाकारों के सिर कलम करने की घटनायें भी घटती हैं।

इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी रोक लगाने की नयी कोशिशें हो रही हैं। जन विरोधी सरकारें इन्हें ‘साइबर क्राईम’ से जोड़ती जा रही हैं। मुख्य धारा की मीडिया पहले से ही दैत्याकार कम्पनियों और कॉरपोरेशनों की गिरफ्त में है। सरकार समर्थक लोगों का आई.टी. सेल भी तैयार है। एन.एस.ए. जैसे कार्यक्रमों से लोगों की सोच पर निगरानियां हो रही हैं। राजनीति और राजसत्ता की पैठ रचनाकार के निजी से निजी क्षणों में भी है। राजनीति और राजसत्ता से बाहर कुछ भी नहीं है, जो बाजारवादी वैश्विक वित्तीय ताकतों के कब्जे में है।

ऐसे में सोच और समझ के हाथ-पांव बांधने के मुद्दे पर बंहस होनी चाहिए। साहित्य के छोटा या बड़ा होने का मुद्दा ही नहीं है।

-आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top