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भाजपा की जीत स्वाभाविक नहीं

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उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव परिणाम आने के दौरान ही बहुजन समाज पार्टी की सब कुछ मायावती ने प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर भाजपा और केन्द्र की सरकार पर चुनावी मशीन -ईवीएम- से छेड़-छाड़ करने का सीधा आरोप लगाया था। सपा के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी आरोप लगाया और मायावती का समर्थन किया। बात चुनाव आयोग तक भी पहुंचायी गयी।

भाजपा की जीत स्वाभाविक नहीं है।

भाजपा मुद्दों को बरगलाती रही।

मीडिया जो नहीं था, उसकी हवा बनाती रही।

ईवीएम मशीनों ने वही किया, जो राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतें चाहती थीं।

‘लोक सभा’ के साथ ‘राज्य सभा’ का उपहार मोदी को ‘विधान सभाओं की जीत’ ही दे सकती थी, वह मिल गया।

यह सब होना था, हो गया। कैसे हुआ? यह सवाल है। जिसका जवाब न तो चुनाव आयोग देगा, न देश की सरकार देगी, ना ही देश की मीडिया ‘जो सच है’ उसे सामने लायेगी। बस बवाल मचेगा। देश की आम जनता में न तो वर्गगत राजनीतिक चेतना है, ना ही राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों की निर्णायक ताकत को वह समझती है। देश के किसी भी राजनीतिक दल में वह ताकत नहीं है कि सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ लोकतंत्र के लिये जन आन्दोलन खड़ा कर सके। उनकी ताकत बंटी-बिखरी है।

ईवीएम मशीन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।

मध्य प्रदेश के भिंड में ‘मशीन के ट्रायल’ के दौरान यह सच सामने आया कि अलग-अलग बटन दबाने पर भी वीवीपीएटी मशीन से भाजपा के कमल निशान की पर्ची निकलती है। वोट आप किसी को दें, आपका वोट भाजपा को ही जायेगा। यह है भाजपा के ‘जनसमर्थन’ और ‘चुनावी जीत’ का आधार। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अपने प्रमाणों के साथ चुनाव आयोग पहुंच चुकी हैं। ‘आप’ के अरविन्द केजरीवाल ने कहा- ‘‘तो ऐसे ईवीएम के कीचड़ से कमल निकल रहा है।’’

इन राजनीतिक दलों ने मायावती की तरह ही ‘मतपत्रों’ से मतदान कराने की मांग की है। अखिलेश यादव ने ‘चुनावी प्रक्रिया में आम जनता के विश्वास’ को मुद्दा बनाया है, मगर मुद्दा भारतीय लोकतंत्र है, जहां अर्थव्यवस्था के उदारीकरण से शुरू हुई प्रक्रिया अर्थव्यवस्था के निजीकरण में बदल गयी है, और वित्तीय ताकतों ने उसकी चुनावी प्रक्रिया पर अपनी पकड़ बना ली है। जिनके पास राजनीतिक एकाधिकार की भावना से पीड़ित भाजपा जैसी राजनीतिक दल है, जो देश की संरचना और उससे बनी सरकार को जन विरोधी बना चुकी है। जिसका मकसद अपने को सरकार बनाये रखने के लिये निजी वित्तीय पूंजी की तानाशाही है।भारतीय लोकतंत्र की हत्या सुनियोजित है। लोकतंत्र के विरूद्ध जारी अभियान अभी रूकने को नहीं है। जन आन्दोलन और जन संघर्षों की पृष्टभूमि बनाना ही एकमात्र विकल्प है।

भारतीय लोकतंत्र में भाजपा एक ऐसी राजनीतिक पार्टी बन कर उभरी है जो किसी भी कीमत पर सरकार बने रहना चाहती है। उसके पास अपनी हिन्दूवादी सोच और संगठन है, राजनीतिक एकाधिकार की भावना है, जिसे आप फॉसिस्ट तानाशाही भी कह सकते हैं, और जिसके पास उन राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों का सहयोग है, जिनके लिये दिखावटी लोकतंत्र और फासिस्टवादी तानाशाही ज्यादा उपयोगी है।

इस बाबत 9 मार्च 2017 का आलेख- ‘चुनी हुई सरकारें लोकतंत्र के लिये बड़ा खतरा’ और 13 मार्च 2017 को प्रकाशित आलेख- ‘नोटबंदी का रिटर्न गिफ्ट’ चाहें तो ई-न्यूज में आप देख सकते हैं।

-आलोकवर्द्धन

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