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उधड़ी हुई सड़कों का चौराहा

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हम उस चौराहे पर खड़े हैं

जहां से निकली और जहां तक पहुंची राहें

उधड़ी हुई, बेमरम्मत हैं।

ध्वस्त हैं बांये बाजू की राहें

दायें बाजू विध्वंस है।

चौराहे पर टंगा निर्देश है- ‘बांये बाजू से चलें

लालबत्ती से रूकें

संभल कर चलें’

लोकतंत्र का चौराहा झूठ है

अपनी राह चलने की छूट नहीं।

दक्षिणपंथी-प्रतिक्रियावादी ताकतों ने व्यक्ति और समाज का, राज्य और सरकारों का अवमूल्यन कर दिया है।

किसी भी चीज के लिये उसकी धारणा स्थिर या स्थायी नहीं। समय और अपने हितों के लिये वह अपनी मान्यताओं और परिभाषाओं को बदल देता है।

कभी समाज की वरियता होती है, तो कभी राज्य की।

कभी राज्य की वरियता होती है, तो कभी बाजार की।

अभी वह बाजार की वरियता से संचालित हो रहा है, लगे हाथ राज्य की वरियता के लिये वह समाज को धर्म, जाति और नस्लों में बांट रहा है। उसके लिये समाज व्यवस्था का एक ही रूप है- शोषण, दोहन ओर दमन।

समाज के बहुसंख्यक वर्ग का अबाध शोषण,

प्रकृति का अबाध दोहन

और इन्हें बनाये रखने के लिये दमन। उत्पीड़न।

यही उनकी समृद्धि और श्रेष्ठता का आधार है। यही उनकी सभ्यता और संस्कृति है। यही उनकी सामाजिक एवम् राजनीतिक संरचना का आधार है। कह सकते हैं आप कि यदि यह शोषण, दोहन और दमन न हो तो पूंजीवादी समाज व्यवस्था का सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना का कोई आधार नहीं है। उनकी सभ्यता और संस्कृति नहीं है। उनकी श्रेष्ठता और उनकी समृद्धि नहीं है। जिसे प्रचारित ऐसे किया जाता है जैसे इसके अतिरिक्त मानव समाज के विकास की कोई दिशा नहीं है। यह विकास की ऐसी अवस्था है जिससे निजात पाने की जरूरत नहीं है।

इन्हीं के बीच आज का साहित्य है। रचनायें और रचनाकार हैं। यह सवाल है कि ‘क्या यह सच है?’

विवादहीन रूप से, झूठ की पहचान मुश्किल है, क्योंकि हर हाथ में विरोध और समर्थन का झण्डा है। हर कदम पर उधड़ी हुई सड़कों के चौराहे हैं।

यदि आप वास्तव में रचनाकार और बुद्धिजीवी हैं तो समाज के लिये ऐसी सड़कें बिछायें जो लोगों को बाजार के चौराहे से बाहर निकालें।

-आलोकवर्द्धन

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