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मिट्टी होने की लड़ाई

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लोहे को
काट और मोड़-बांध कर
खड़ा करता है वह
उस इमारत का ढ़ांचा
जिसकी गहरी बुनियाद में है वह मिट्टी
जो लोहे से ज्यादा मजबूत
और मुलायम है,
जिसके खिलाफ
इमारत
मरे हुए ईंट-पत्थर
और मरी हुई लकड़ियों से लड़ाई है,
जो मिट्टी से बनते और बिगड़ते हैं।
जानता है लोहा
मिट्टी से लड़ाई उसकी नहीं
सीमेंट
रेत
और उन पत्थरों की भी नहीं
जिनसे लोहे के ढ़ांचे को
जकड़ा गया है।
लोहे का दिल
उस आदमी के लिये होता है नर्म
जो उसे काटता
पीटता है हंथोड़े से,
और मोड़-बांध कर
खड़ा करता है इमारत के लिये,
लादता है उस पर
दशकों और सदियों का बोझ
कि लोहा मिट्टी नहीं होता,
जबकि
बुरे वक्त के शिकंजे में फंसा लोहा
न जाने कब से
मिट्टी होने की लड़ाई लड़ रहा है।

-आलोकवर्द्धन

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