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समाजवादी क्रांति और सोवियत संघ के पतन के बाद – 2

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पूंजीवाद का संकटग्रस्त होना समाजवादी सर्वहारा क्रांति की ऐतिहासिक अनिवार्यता है, किंतु समाजवाद के सामने भी गंभीर संकट है।

यह सवाल है, कि

सोवियत संघ का विघटन समाजवादी समाज व्यवस्था के विघटन का आखिरी पड़ाव नहीं। क्या राज्य की इजारेदारी और सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के बीच की समाजार्थिक स्थितियां समाज के विकास की दिशा को अवरूद्ध करती है? सोवियत संघ में लेनिन का विस्तार यदि स्तालिन हैं, जिन्होंने समाजवाद का निर्माण किया, तो ख्रुश्चेव और ब्रेझनेव-कोसिगिन जैसे संशोधनवादियों का उदय क्यों?

माओ के बाद ही, चीन की समाजवादी व्यवस्था प्रतिगामी पूंजीवादी संक्रमण की ओर मुड़ गयी। बाजारवादी वैश्वीकरण आज चीन के विकास की संकटग्रस्त दिशा है। उसके समाजवादी ढांचे में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के अवशेषों ने निर्णायक जगह बना ली है। राज्य अधिकृत कम्पनियों के साथ निजी कम्पनियों को जगह मिल गयी है, जिसका सीधा सा मतलब है, कि चीन की अर्थव्यवस्था में निजी पूंजी की गिरफ्त में है और समाजवादी अर्थव्यवस्था अब समाजवादी नहीं। यहां तक की राज्य की इजारेदारी भी खत्म हो चुकी है। उत्पादन के साधन पर राज्य एवं बाजारवादी ताकतों का अधिकार है। समाज का बहुसंख्यक -सर्वहारा वर्ग- अब शासक नहीं शोषित वर्ग है। वह बाजार में श्रमशक्ति का स्त्रोत है।

कहा जा सकता है, कि सोवियत संघ के राज्य की इजारेदारी के साथ चीन में वित्तीय इजारेदारी की व्यवस्था विकसित हो गयी है। वह पूंजीवादी विश्व की दूसरी और कई मामलों में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। विवादहीन रूप से चीन अब समाजवादी अर्थव्यवस्था नहीं है। यूरोप और अमेरिकी अर्थव्यवस्था का वैश्विक वित्तीय संकट अब चीन का भी वितीय संकट है। वह मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना कर रहा है। चीन के विकास की संभावनायें विश्व के लिये समाजवादी विकल्प नहीं, बल्कि पूंजीवादी विश्व की तरफदार है। भले ही वह पूर्व समाजवादी देश और तीसरी दुनिया के देशों के लिये अमेरिकी एवं यूरोपीय साम्राज्यवाद के विरूद्ध बहुध्रुवी विश्व का पक्षधर है, किंतु पूंजीवादी एकाधिकारवाद का वह हिस्सा बन चुका है। उसने माओवाद को समाजवादी सोच के अजायबघर में खड़ा कर दिया है।

सोवियत संघ में जिस तरह लेनिन की प्रतिमायें तोड़ी गयीं, भले ही उस तरह चीन में माओ की प्रतिमायें नहीं तोड़ी गयीं, मगर चीन अब साम्यवादी देश नहीं है, हम यह मानते हैं। वह भी समाजवादी समाज व्यवस्था के इतिहास का संदिग्ध पड़ाव है। आर्थिक रूप से पूंजीवादी विश्व का संकट समाजवादी विश्व का संकट बन गया है, जबकि समाजवाद, इतिहास के विकास की स्वाभाविक दिशा और पूंजीवाद का क्रांतिकारी विकल्प है। आज समाजवादी विश्व की वैकल्पिक दावेदारी संकटग्रस्त है।

यह संकट स्वाभाविक नहीं है। यह संकट प्रायोजित है।

यह संकट संक्रमणकालीन विश्व का संकट है।

पूंजीवाद का संकटग्रस्त होना इस बात का प्रमाण है, कि वह मानव समाज के विकास का अंतिम पड़ाव नहीं है। जिसकी दावेदारी वह करता रहा है। उसने समाजवादी संभावनाओं को खत्म करने के लिये अपनी संभावनाओं को भी खत्म कर लिया है। जिस राज्य की इजारेदारी से वित्तीय पूंजी पर नियंत्रण संभव है, उसने उस राज्य की वित्तीय इजारेदारी को भी समाप्त कर दिया है। निजी वित्तीय पूंजी का वह सच उसके सामने है, जो खुद उसके नियंत्रण से बाहर है।

आज पूंजीवादी देशों में, निजी वित्तीय पूंजी की वह तानाशाही है, जिसकी सोच पूंजीवादी समाज व्यवस्था के किसी चिंतक की नहीं थी। एडम स्मिथ और उनके चेलों ने भी नहीं सोचा था, कि निजी वित्तीय पूंजी राज्य के स्वरूप को इतना बदल देंगी कि पूंजी को नियंत्रित करने वाली सरकारें उनकी गिरफ्त में होंगी।

वैश्विक वित्तीय ताकतों ने दुनिया पर जितनी पकड़ बना ली है, उस अनुपात में आम लोगों की पकड़ ढीली पड़ गयी है। समाज का बहुसंख्क वर्ग पहले से ज्यादा असुरक्षित ही नहीं हुआ है, बल्कि उसके मुक्ति की तमाम राहें भी बंद कर दी गयी हैं। समाजवादी सर्वहारा क्रांति हो या चीन की साम्यवादी क्रांति हो, या क्यूबा की जनक्रांति, अब संभव नहीं है। लातिनी अमेरिकी देशों के ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की राहें भी अवरूद्ध हो गयी हैं। इसके बाद भी सच यह है, कि पूंजीवाद समाज के विकास की चरम अवस्था नहीं, वह आम संकट से घिरा हुआ है। उसकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना टूट रही है।

(जारी)

-आलोकवर्द्धन

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