Home / विश्व परिदृश्य / सीरिया का संकट

सीरिया का संकट

timthumb

इराक में 2003 से अब तक अमेरिका घातक -रासायनिक एवं जैविक- हथियार ढ़ूंढ़ रहा है जो नहीं मिला, मगर जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इराक को तबाह कर दिया, सद्दाम हुसैन को फांसी दी और एक मिलियन से ज्यादा इराकियों को मौत के घाट उतार दिया। अमेरिकी सेना और उसके आतंकी गुट आज भी यही कर रहे हैं।

लीबिया को 2011 में बराक ओबा ने ध्वस्त किया, कर्नल गद्दाफी की हत्या की, लाखों-लाख लीबियायीयों को मार डाला, उन्हें आतंकी मिलिशियायी गुटों के हवाले कर दिया। लीबिया के साथ अफ्रीकी महाद्वीप की एकजुटता की ठोस होती संभावनायें मर गयीं।

अफगानिस्तान के बहुराष्ट्रीय हत्यारों को तो आप जानते ही हैं, जिन्होंने तालिबानियों को बनाया, अल्कायदा को पैदा किया।

अब डोनॉल्ड ट्रंप ने सीरिया में हुए ‘रासायनिक हमले’ को मुद्दा बना लिया है, कि सीरिया को नेस्तनाबूद किया जा सके, बशर-अल-असद को सत्ता से बेदखल किया जा सके। सीरिया और असद को ठिकाने लगाया जा सके। जिसे पिछले 6 सालों से गृहयुद्ध के आग में धकेल दिया गया है। यह प्रायोजित गृहयुद्ध यूरोपीय संघ के सदस्य देश, अमेरिकी साम्राज्य और उनके समर्थक कई अरब देशों की कारस्तानी है। जिन्होंने असद विरोधी विपक्ष और अल्कायदा से जुड़े आतंकी संगठनों को बढ़ाया। उन्हें आर्थिक एवं कूटनीतिक समर्थन दिया। हथियार और प्रशिक्षण दिये। ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड सीरिया’ (आईएसआईएस) को इन्हीं ताकतों का छुपा समर्थन हासिल है, जिसके खिलाफ सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप हुआ। अमेरिका का नया सैन्य हस्तक्षेप इन्हीं आतंकियों को बचाने की अमेरिकी साजिश है, जिन्हें रूस के सहयोग से सीरियायी सेना खत्म कर रही है।

यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है कि सीरिया के इडलिब प्रांत में हुए रासायनिक हमले के लिये सीरिया की सेना को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, मगर सीरिया के पास रासायनिक हथियार नहीं है। अमेरिका-रूस और विश्व समुदाय की निगरानी में उसे समाप्त किया जा चुका है। इसके विरूद्ध इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि इराक में आतंकी गुटों ने आम इराकियों और इराकी सेना के खिलाफ रासायनिक हमले किये हैं। जहां अमेरिकी सेना की मौजूदगी है। इस बात की आशंकायें पहले भी जताई गयी थीं कि यूरोपीय देशों -खास कर ब्रिटेन- के सहयोग से ही आतंकी गुटों के पास रासायनिक हथियार पहुंचे हैं। इस बात के भी पर्याप्त प्रमाण हैं कि रासायनिक हथियारों को बनाने की तरकीबें और संसाधन इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन के पास हैं, जिसे यूरोपीय देशों ने ही उपलब्ध कराया है।

इसलिये यह माना जा सकता है कि नये सिरे से अमेरिकी हस्तक्षेप के लिये यूरो-अमेरिकी समर्थक आतंकी गुटों ने ही अपने विरूद्ध रासायनिक हमला किया, ताकि सीरिया की असद सरकार को दोषी ठहराया जा सके और सीरिया के गृहयुद्ध को उस अंजाम तक पहुंचाया जा सके, जिसका मकसद सीरिया की असद सरकार को सत्ता से बेदखल करना है। वैसे भी अमेरिका सीरिया पर रूस के वर्चस्व को समाप्त करना चाहता है। सीरिया की सुरक्षा रूस और उसके सहयोगी देशों से टिक कर रह गयी है। तीसरी दुनिया के देशों के लिये यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद गंभीर चुनौती है।

दुनिया की शांति और स्थिरता के लिये सबसे बड़ा खतरा वो पाजी देश है जो दूसरे देशों में अपने बाजारवादी हितों के लिये राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट पैदा करते हैं। जिनकी पकड़ विश्व अर्थव्यवस्था पर है, और जो आतंकी संगठनों को नियंत्रित करते हैं। किसी भी देश को इराक, अफगानिस्तान और लीबिया बना देते हैं। सीरिया जैसी स्थितियां पैदा करते हैं। अपने देश की सरकार बनाने के आम जनता के अधिकार को ही खत्म कर देते हैं। सीरिया का प्रायोजित संकट इसलिये भी गंभीर है, कि विश्व दो साम्राज्यवादी खेमों में बंट गया है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन शतरंज के खिलाड़ी हैं, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ऐसे लट्ठमार राजनीतिज्ञ हैं, जिनके लिये अमेरिकी फौज सबसे बड़ी निर्णायक ताकत है।

सीरिया को लेकर अमेरिका और रूस के बीच युद्ध के फासले रोज घट रहे हैं।

-आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top