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सीरिया को बचाने की लड़ाई

07-14

सीरिया को बचाने की लड़ाई विश्व समुदाय को लड़नी ही चाहिए, क्योंकि जिन आधारहीन आरोपों के तहत सीरिया पर अमेरिकी हमले की शुरूआत हो गयी है, वह सीरिया को इराक और लीबिया बनाने की नयी पहल है। जिसमें यूरोपीय देश और कई अरब देशों के साथ सीरिया में सक्रिय आतंकी गुट भी शामिल हैं। जिन्हें आधार बना कर अपने साम्राज्यवादी ‘आतंक विरोधी युद्ध’ के तहत अमेरिका सीरिया पर सैन्यक कार्यवाही कर चुका है, कि सीरिया की असद सरकार के समर्थन एवं सहयोग से रूस के द्वारा की गयी सैन्य कार्यवाही ने न सिर्फ स्थितियां बदल दी, बल्कि विपक्ष और हथियारबद्ध आतंकी गुटों को वार्ता के लिये विवश भी कर दिया। इस बात की संभावनायें बढ़ गयीं कि ‘सीरिया के संकट का समाधान संभव है’। कि अमेरिका के नये हमलों ने सीरिया के संकट को फिर से निर्णायक युद्ध एवं गृहयुद्ध के हवाले कर दिया है। नये वास्तविक युद्ध एवं संघर्षों की शुरूआत हो गयी है।

रूस के सामने अमेरिकी प्रस्ताव है, कि ‘रूस सीरिया और अमेरिका में से किसी एक को चुने।’

रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने स्पष्ट कर दिया है, कि ‘राष्ट्रपति बशर-अल-असद को अकेला छोड़ने का मतलब सीरिया को आतंकवादियों को सौंपना है।’

यकीन किया जा सकता है कि रूस सीरिया को आतंकी गुटों के हवाले नहीं करेगा। जहां अल् कायदा से जुड़े अल् नुसरा फ्रंट और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन हैं। जो राष्ट्रपति असद को सत्ता से बेदखल करने की लड़ाई पिछले 6 सालों से लड़ रहे हैं। अमेरिका और यूरोप सहित उसके सहयोगी देश भी यही चाहते हैं।

इसलिये अमेरिका का यह तर्क कि सीरिया में अमेरिकी हस्तक्षेप आतंकवाद के खिलाफ युद्ध है, और बशर-अल-असद की सीरियायी सेना ने रासायनिक हथियारों का उपयोग किया, आधारहीन दावे हैं। उसने ही सीरियायी विपक्ष और आतंकी गुटों को खड़ा किया और सीरिया में राजनीतिक अस्थिरता पैदा की, जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की जैसे देश भी शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ – सुरक्षा परिषद में ‘राष्ट्रपति असद के निन्दा प्रस्ताव’ के जरिये अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जो राजनीतिक पहल चाहते थे कि रासायनिक हमले के लिये असद सरकार को जिम्मेदार माना जाये, उस प्रस्ताव को रूस ने ‘वीटो पावर’ से निरस्त कर दिया। रूस खुले तौर पर सीरिया के पक्ष में खड़ा हो गया है। राष्ट्र संघ में रूस के राजदूत व्लादिमीर सैफ्रोन्कोव ने आश्चर्य व्यक्त किया कि ‘अमेरिका और पश्चिमी देश किसी भी जांच के बिना ही सीरिया की असद सरकार को दोषी करार दे रहे हैं।’ सीरिया के राजदूत ने कहा- ‘सीरिया की सेना के पास रासायनिक हथियार नहीं है, बल्कि तुर्की के रास्ते आतंकी गुटों ने दो लीटर सरीन गैस की तस्करी लीबिया से की है।’ रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने सीरियाययी सेना के द्वारा ऐसे किसी भी हमले को एक सिरे से खारिज कर दिया है। सीरिया के मुद्दे पर रूस और अमेरिका अब आमने-सामने हैं।

हमारे सामने सबसे जटिल सवाल यह है, कि ‘क्या सीरिया के होने, न होने का मामला दो महादेशों के बीच का मामला है? सीरिया की सुरक्षा और उसे बचाने की लड़ाई रूस की जिम्मेदारी है? क्या विश्व का कोई भी देश यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवादी हमलों से सुरक्षित है? उसकी स्वतंत्रता, उसकी सम्प्रभुता और उसके नागरिकों की सुरक्षा का आधार क्या है?’ हम वैश्विक संघर्ष के उस मुहाने पर खड़े हैं जहां वार्ताओं की मेज नहीं है। कूटनीतिक पहल और राजनीतिक समझ नहीं है। सीरिया को बचाने की लड़ाई में आम लोगों की हिस्सेदारी शून्य कर दी गयी है। अमेरिका की ट्रंप सरकार उत्तर कोरिया में युद्ध के नये मोर्चे रच रही है, और अफगानिस्तान में जीबीयू-43बी बम गिरा कर नया मोर्चा खोल चुकी है। जिसे हम एशिया में युद्ध का विस्तार ही मान सकते हैं।

-आलोकवर्द्धन

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