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मोदी को ब्राण्ड समझना गलत नहीं

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मोदी को एक ब्राण्ड समझना गलत नहीं है।

वो देश को ब्राण्ड बना रहे हैं।

देशभक्ति की ब्राण्डिंग कर रहे हैं, और देशद्रोह की भी।

जिसे आने वाले कल में तब समझा जाएगा, जब हम देश की दुर्दशा की बात करेंगे।

हम कांग्रेस की बात करेंगे। मनमोहन सिंह की बात करेंगे, और सबसे ज्यादा भाजपा, संघ और नरेन्द्र मोदी की बात करेंगे।

यह सवाल भी करेंगे कि लोकतंत्र को नकारा किसने बनाया?

एकाधिकारवादी पूंजी और एकाधिकारवादी राजनीतिक संरचना कितने लोगों की जान लेती है, और कितने बरसों तक जान लेती है?

जिसकी शुरूआत इस देश में हो चुकी है।

यह दौर राजसत्ता के लिये संघ और भाजपा के राजनीतिक उन्माद का दौर है। सरकार में बने रहने के लिये कुछ भी कर गुजरने का दौर है। आप चाहें तो मान सकते हैं कि भारत में पूंजीवादी लोकतंत्र की बुनियाद पर एकाधिकारवादी एक दल एवं एक नेता की तानाशाही का निर्माण हो रहा है। जिसके सूत्रधार निजी वित्तीय पूंजी की तानाशाही के पक्षधर निजी कम्पनियां और कॉरपोरेशन हैं। अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाईयां – विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित वॉलस्ट्रीट के बैंकर्स हैं। जिनके बारे में आप सोचेंगे और समझेंगे तो लगेगा – ‘‘भाई ये तो दुनिया के खुदा हैं।’’

जिसके खिलाफ होना खुदा की खुदाई के खिलाफ होना है।

इस नजरिये से मोदी जी खुदाई खित्मदगार हैं। वित्तीय ताकतें जो कहती हैं, वो वही करते हैं।

उन्होंने कहा- ‘‘देश को एक ब्राण्ड बनाओ।’’

मोदी जी लग गये। उन्होंने देश को बाजार के लिये ‘ब्राण्ड’ बनाना शुरू कर दिया। ‘मेक इन इण्डिया’ से लेकर ‘न्यू इण्डिया’ का सफर देश को बाजार बनाने की वह पहल है, जिसकी शुरूआत कांग्रेस के मनमोहन सिंह ने की थी। जिसका मकसद राजसत्ता के जरिये आर्थिक सत्ता को अलग करना है। खुले तौर पर अर्थव्यवस्था का निजीकरण है।

आम जनता के लिये रोजी-रोजगार, आर्थिक विकास और देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने का सपना है। जिसमें उसे खोना तो सब कुछ है -अपना देश, अपनी सरकार, अपने संवैधानिक अधिकार और जीने की न्यूनतम परिस्थितियां- मगर पाना कुछ भी नहीं है, बद्तर होती स्थितियां ही उसका हासिल हैं।

भूख, गरीबी, बेरोजगारी, अधिकारहीनता की स्थिति में जीना और बड़ी-बड़ी बातें सुनना ही देशभक्ति है। मोदी जी इसी देशभक्ति की ब्राण्डिंग कर रहे हैं। देश के लिये उन्माद और उस डर का माहौल है, जो लोगों की समझ में नहीं आ रहा है, लेकिन तेजी से बढ़ रहा है।

सालों पहले बाबरी मस्जिद के ध्वंस और अयोध्या में राम मन्दिर के निर्माण के लिये संघर्ष ने डराया था।

गये साल जेएनयू प्रकरण और कन्हैया कुमार के मामले में तिरंगा और ‘भारत माता की जय’ ने डराया।

अब गाय डरा रही है।

डरने की रोज नयी वजहें बन जाती हैं। ऐसी वजहें जो राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय, देशभक्ति और देशद्रोह में बदल जाती हैं। हालत ऐसे हो गये हैं कि पाकिस्तान और इस्लाम न हो तो देशभक्ति और हिन्दू धर्म के प्रदर्शन की जरूरत ही न बने।

लोगों तक सही खबरें पहुंचाने वाले लोग हरामखोर हो गये हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे सरकार और वित्तीय ताकतों के हितों के अलावा उनके जेहन में कुछ बचा ही नहीं। देश-दुनिया और आम लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को उन्होंने खारिज कर दिया है।

हम उस जाल में फंस चुके हैं, जहां से सही-सलामत बाहर निकलना संभव नहीं है। आजादी के बाद लोककतंत्र का भरम जो बना था, वह भी टूट रहा है। हमारे सामने संभवनायें कम और आशंकाएं कुछ ज्यादा ही हैं, क्योंकि साम्राज्यवादी, फासिस्ट ताकतें किसी भी देश को सही-सलामत नहीं छोड़तीं। हम इन्हीं ताकतों की मजबूत गिरफ्त में हैं और सबसे बुरी बात यह है कि देश और जनविरोधी इन्हीं ताकतों को मीडिया और देश की आम जनता मजबूत बना रही है। ब्राण्ड और ब्राण्डिंग का मतलब देश और देशवासियों को मुनाफा का जरिया बनाना है। देशभक्ति और राष्ट्रवाद की बनती हुई यह नयी परिभाषा है।

-आलोकवर्द्धन

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