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बिना लाल बत्ति की सरकार

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लाल बत्ती के दिन लद गये।

यह अच्छी बात है, मगर इसमें ऐतिहासिक क्या है? क्या आप बता सकने के लायक हैं?

कैबिनेट ने निर्णय लिया, प्रस्ताव पीएम साहब का था।

बत्तियां गुल हो गयीं।

तमाम भेंड़ दिखा-दिखा कर बत्तियां उतारने लगे। नजारा कुछ ऐसा है, जैसे लाल बत्ती के उतरने से जमाना बदल गया। सरकार को कुछ ज्यादा दिखने लगा, मंत्रियों ने चश्मे उतार दिये, धूप खिली हुई है और सुर्खियों को सुर्खाब के पर लग गये। आम आदमी की दुश्वारियां खत्म हो गयीं, जितने भी अंधे थे उन्हें साफ-साफ दिखने लगा, कि मंत्री और संतरी में कोई फर्क नहीं। सरकार बिना बत्ती की है।

यह बुरी बात है या अच्छी?

पता नहीं।

मजदूर जहां खटता था, उसको वहीं खटना है, मेहनताना जितना मिलता था, उतना ही मिलना है, काम के घण्टों में कमी नहीं आयी, काम करने के बुरे हालात वही हैं। किसान दिहाड़ी मजदूर बन रहा है।

किसान की स्थिति बद्तर है। रोज का रोना भी वही है।

कर्मचारी, मध्यम वर्ग के लिये कुछ भी नहीं बदला।

बुद्धिजीवी भौचक हैं, कलम घिसें या नहीं? जिसका जहां सधता है, वह वहीं देख रहा है।

जिसके पास पैसों की कमी नहीं है, उसका रूतबा लाल बत्ती के बिना भी मजबूत है। इस देश के उन 100 बड़े लोगों को निकाल लीजिये जिनके पास बड़ी दौलत है, क्या उनके पास लाल बत्ती थी? नहीं न। मगर वो तमाम लाल बत्ती वालों को नचाते थे, आज भी नचा रहे हैं। वो ऐसे बत्ती वाले हैं, जिनकी बत्तियां गुल नहीं होतीं। जिनकी वजह से लोगों की बत्तियां गुल हो जाती हैं। सरकार और उसके लोग यह बताते फिर रहे हैं, कि ‘इनकी वजह से ही बत्तियां जल रही हैं। आर्थिक विकास हो रहा है।’

तर्क देने वालों का यह भी कहना है, कि ‘यह ‘वीआईपी कल्चर’ पर हमला है।’

चलिये अच्छा है। मान लेते हैं।

बस इतना बता दें ‘कॉरपोरेट कल्चर’ क्या है? किसके हिस्से है अंधेरा, किसे पास उजाला है?

-आलोकवर्द्धन

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