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सामाजिक विकास की उल्टी दिशा

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समाज में बुद्धिजीवियों की क्या कोई जगह है?

इस सवाल से आप टकरा कर देखें, होश उड़ जायेंगे। भारत में यह वर्ग दशकों से नहीं, बल्कि सदियों से विभाजित है। और यह विभाजन स्वाभाविक है। समाज यदि बंटा हुआ है, तो साहित्य अपने आप बंट जायेगा।

हम बंटी हुई ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां विचारों के सीने पर बंदूकें तनी हैं। तनी हुई बंदूकों से गोलियां निकलती हैं। निकलने को अब मिसाईलें भी निकलने लगी हैं। सोच की जमीन की निगरानियां होती हैं, और बम फटते हैं। मुद्दों की गर्दन पकड़ी जाती है, गला घोंटा जाता है।

समाज में बढ़ती हुई सामाजिक असहिष्णुता का मुद्दा उठा, असहिष्णुता तो बढ़ गयी, मगर मुद्दे का गला दबा ही दिया गया। संघर्ष समाज के बुद्धिजीव वर्ग ने शुरू की, मुद्दे का राजनीतिकरण हो गया। बात आयी-गयी सी हो गयी, समझना आसान नहीं होगा कि यदि मुद्दे का विस्तार हुआ है, तो संघर्षों की परिधि क्यों घट गयी?

यहां गाय से लेकर बाबरी मस्जिद के ध्वंस और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के मुद्दे खड़े हैं।

यह सवाल भी खड़ा है, कि राजसत्ता की वजह से अल्पसंख्यक समुदाय उदार हो गया है, या डरा हुआ है?

उनकी धड़कन बढ़ी हुई है।

एक की पेशकश है- गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दें।

राम मंदिर निर्माण के लिये ‘मुस्लिम कारसेवक मंच‘ के लोग विवादित स्थल तक 3000 ईंट लेकर पहुंच रहे हैं।

राजस्थान में साध्वी कमल पहलू खां के हत्या के आरोपी को भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुखदेव बता रही है। सीख दे रही है- ‘गो माता की जय‘ बोलना सिखाओ।

उमा भारती- जो बाबरी मस्जिद ध्वंस की ओरोपी हैं – कहती हैं- ‘‘तिरंगा, गंगा और राम मंदिर के निर्माण के लिये कोई भी सजा भुगतने के लिये तैयार हैं।‘‘ धर्म अब हिंदू राष्ट्रवादी हो गया है।

जिसका मतलब वाम बुद्धिजीवियों को मालूम है। वो यह भी जानते हैं, कि देश के इतिहास और संस्कृति का हिंदूकरण हो रहा है, और बड़ी संकीर्णता से हो रहा है, लेकिन उनकी आवाज दबी हुई है, आम लोगों तक सही संदर्भों से जुड़ कर पहुंच नहीं रही है। बुद्धिजीवी वर्ग का एक हिस्सा राजसत्ता से जुड़ा हुआ धर्म-जाति-समुदाय से बने हिंदू राष्ट्रवाद की बातें कर रहा है।

सामान्य रूप से राजसत्ता से जुड़े हिंदू राष्ट्रवाद को हिंदूओं का समर्थक और अल्पसंख्यक समुदाय -विशेष कर मुसलमानों- के लिये खतरा माना जाता है, मान लिया जाता है, कि यह अल्प संख्यक समुदाय के लिये अस्तित्व का संकट है, मगर सच यह भी है, कि यह हिंदूआों के लिये भी उतना ही बड़ा संकट है, क्योंकि देश के सबसे बड़े समुदाय को अपने राजनीतिक हितों के लिये इस्लामी जेहादियों की तरह कट्टर और उन्मादी बनाया जा रहा है। जिनके पीछे साम्राज्यवादी वित्तीय ताकतें हैं, जिनके लिये व्यक्ति श्रम का स्त्रोत, उत्पादन का साधन, उत्पाद और उपभोक्ता है, मुनाफा का जरिया है। जो पूंजी के वर्चस्व को बनाये रखने के लिये कहीं इसाई राष्ट्रवाद, कहीं इस्लामी राष्ट्रवाद तो भारत में हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ा रहा है। उसने समाज के प्रबुद्ध वर्ग को भी बांट दिया है। उसने सामाजिक विकास के पांव को प्रतिगामी बना दिया है।

-आलोकवर्द्धन

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