Home / साहित्य / कविता / [मई दिवस पर विशेष] हंथौड़ा लोहा बन गया

[मई दिवस पर विशेष] हंथौड़ा लोहा बन गया

anekshghta

सैकड़ों बाहों के साथ
उठी हमारी बाहें
और एक मजबूत हंथौड़ा
जंग लगे लोहे पर गिरा धड़ाम से।
जबर्दस्त शोर हुआ
पपड़ियां उधड़ीं
बुनियादें हिलीं
और एक बड़ी धरती कांप गयी।
गला फाड़ कर चिल्लाया लोहा
लौह व्यवस्था के खूनी पंजे
जमीन में धंस गये
वह जहां था
अपने रिसते खून के साथ
वहीं जम गया अवशेषों की शक्ल में।
उसने जड़ जमायी
अपनी खाल मोटी की
हिले हुए बुनियादों की
की मरम्मत
और फिर धीरे-धीरे
हंथौड़े को अपनी गिरफ्त में ले लिया,
थामी उसकी मूंठ राजदण्ड की तरह
लाल खून को सर्द लोहे का रंग दिया।
अब हंथौड़ा
लोहे की दीवारों पर नहीं
लोहे की खदानों
लोहे के कारखानों
लोहे के औजारों के साथ
उन हाथों से चलता है
जिनमें हुनर
बेजान लोहे में जान डालने की है।
अब हंथौड़ा
एक साथ उठे
करोड़ों-करोड़ बाहों के लिये नहीं
लोहे के लिये
खटता और खटाता है लोगों को।
हंसिया के साथ भी
कुछ ऐसा ही हुआ,
ऐसा होता नहीं पर हुआ।
सोच की हाथ से छूट कर हंथौड़ा
लोहा बन गया।

-आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top