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भारत-पाक – बुलेटप्रूफ कण्टेनर में बैठकर क्रांति

A supporter of Sufi cleric and leader of Minhaj-ul-Quran organisation Qadri chants slogan during the third day of protests in Islamabadभारत और पाकिस्तान के बीच, युद्धविराम और शांतिवार्ता के दौरान भी, युद्ध और आतंक की सिथतियां बनी रहती हैं। सीमा विवाद और कश्मीर का मुददा दोनों ही देशों के बीच खड़ा रहता है। पाकिस्तान आज तक स्वीकार नहीं कर सका है कि उसका इतिहास भारत के इतिहास से अलग नहीं हो सकता, और जो इतिहास 1947 के बाद लिखा गया है, उसमें ‘एक विभाजित देश’ के लिये कहीं कोर्इ गरिमा नहीं है। हां, हम यह कह सकते हैं कि भारत के साथ आर्थिक विकास और लोकतंत्र की संभावनायें जुड़ी रही हैं, जबकि पाकिस्तान भारत विरोध को पालता हुआ, आज युद्ध, अस्थिरता और आतंकवाद की चपेट में है और लोकतंत्र की हत्या वहां बार-बार होती रही है। आवाम की हुकूमत वहां जड़ जमा नहीं पाती और फौजी हुकूमतें वहां बार-बार खड़ी हो जाती हैं। कश्मीर के लिये वह ‘बांगलादेश’ को खो चुका है, आश्चर्य नहीं होगा यदि वह सिंध और बलूचिस्तान को भी खो बैठे। विभाजन का खतरा उसके सामने है और आवाम की हुकूमत वहां उल्टी गिनती गिन रही है। अमेरिका का साथ दुश्मनों की मेहमान नवाजी है। जो दोनों ही देशों का मेहमान बना बैठा है।

आप हिंदुस्तान में हों, या पाकिस्तान में, यह सच है कि आप अमेरिकी नीतियों का शिकार हैं।

ऐसा नहीं है कि यह कोर्इ नायाब खोज है, नहीं! ऐसा नहीं है। दोनों ही देशों की आम जनता इस बात को अच्छी तरह जानती है। बस, उसके पास अपनी बात को कहने का संयुक्त मंच नहीं है। भारत में अमेरिका विरोध उसकी आर्थिक नीति एफडीआर्इ, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और परमाणु करार की वजह से होता है, और पाकिस्तान में हो रहे अमेरिकी ड्रोन हमले, आतंकी गतिविधि और सैन्य अभियानों की वजह से होता है। वह भारत में उसकी आर्थिक नीतियों और वित्तव्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेता जा रहा है, जबकि पाकिस्तान अमेरिका के लिये अघोषित फौजी छावनी है। पाकिस्तान की आम जनता अपने देश को फौजी छावनी बनाने के खिलाफ है, और भारत में विरोध वित्तीय साम्राज्यवाद की वजह से है। दोनों ही देशों के बैठकखाने में बैठे बराक ओबामा आर्थिक एवं सैनिक बिसात पर भारत-पाक के मोहरे चल रहे हैं।

देखिये, क्या हो रहा है?

इधर भारत के दो जवानों की पाक सेना के द्वारा नृ:संश हत्यायें होती हैं, सीमा पर तनाव बढ़ता है, पाकिस्तान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होता है। पहले से तैयार अमेरिकी वक्तव्य आ जाता है कि ”दोनों देश शांति की बहाली के लिये द्विपक्षीय वार्ता करें।” पाकिस्तान का भड़काऊ रूख, नरम हो जाता है। पाकिस्तान में मौलाना कादरी खड़े हो जाते हैं। सुप्रिम कोर्ट प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी का आदेश देता है। पाक सरकार की अमेरिका विरोधी छटपटाहट संकटग्रस्त हो जाती है। गोटियां फिट, खेल सुपरहिट। न तुम हारे, न हम हारे। भारत पर पाक आतंकवाद का डर और पाक पर तख्तापलट का खतरा। अमेरिका की जय! बराक ओबामा की जय! पाक सरकार के ऊपर से कादरी का संकट स्थगित हो गया। जिन्न अपना है, बोतल अपनी है। उसे बोतल के बाहर निकालने और भीतर घुसाने का खेल चलता रहेगा। अमेरिका को पाकिस्तान में एक ऐसी सरकार की जरूरत है, जो उसके सैन्य अभियान में सहयोगी हो। उसे इस बात से परहेज नहीं है कि वह जम्हूरियत का झण्डा लिये हुए है, या फौजी बंदूक। और भारत में मनमोहन सिंह के रहते, उसके हितों को कोर्इ खतरा नहीं है।

पाकिस्तान के भविष्य का निर्धारण पहले अल्ला, आर्मी और अमेरिका करता था, अब अदालत भी इस जमात में शामिल हो गया है। अल्ला के बारे में कुछ भी कहना मुनासिब नहीं होगा, क्योंकि उसके बंदे पाकिस्तान की अमन पसंद आवाम ही नहीं दहशतगर्द भी हैं और ताहिर-अल-कादरी भी हैं। जो खुदार्इ खिदमतगार की तरह कनाडा से पाकिस्तान के बुलेट प्रूफ ग्लास में अवतरित हुए। और छा गये। हजारों लोग उनके साथ ‘इस्लामाबाद लाग मार्च’ में शामिल हो गये। कहा गया दो लाख लोग इस मार्च में शामिल हुए, और दस लाख लोग उनके समर्थक हैं। उन्होंने पाकिस्तान सरकार को 24 घण्टे का अल्टीमेटम दे दिया। अदालत ने प्रधानमंत्री रजा परवेज अशरफ के गिरफ्तारी का आदेश दे दिया और लगा अब सेना सत्ता संभाल लेगी। मगर समझौता हो गया। अभी कुछ नहीं हुआ, मगर आगे कुछ होगा जरूर। क्योंकि अल्ला सभी के साथ है, आर्मी अमेरिकी इशारे का इंतजार करेगी। अमेरिका पाकिस्तान में अपनी सरकार चाहेगा। अदालत ने बड़े ही नाजुक दौर में प्रधानमंत्री को उनके ओहदे से उतारने वाला फरमान जारी कर दिया है। सीमा पर भारत के साथ रार लगा दिया गया है। ताहिर-अल-कादरी ‘बुलेटप्रूफ कंटेनर में बैठ कर क्रांति’ कर रहे हैं।

पाकिस्तान की सरकार अगले आम चुनाव तक सर्वसम्मति से कार्यकारी प्रधानमंत्री चुनने के लिये सहमत हो गयी है। 11 सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल ने कादरी के सभी मांगों को मान लिया है। प्रांतीय और राष्ट्रीय असेम्बली भंग होगी। ‘इस्लामाबाद लाँग मार्च घोषणापत्र’ को अंतिम रूप दिया गया। जिन्ना एवेन्यू में आम जनता के समने समझौता पत्र पर हस्ताक्षर हुआ, उसे पढ़ कर सुनाया गया। प्रधानमंत्री रजा परवेज अशरफ ने भी हस्ताक्षर किये। इनके अलावा वर्तमान मंत्रीमण्डल के भेजे गये मंत्री, पी0एम0एल0क्यू0 के अध्यक्ष चौधरी शुजात हुसैन और मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट पार्टी के फारूक सत्तार ने भी हस्ताक्षर किये।

माना यही जा सकता है, कि पाकिस्तान के मौजूदा राजनीतिक संकट पर धूल डाला जा रहा है। प्रधानमंत्री अशरफ की गिरफ्तारी के आदेश पर अमल को लेकर, सुप्रिम कोर्ट के आदेश के खिलाफ पाकिस्तान के सभी राजनीतिक दलों के बीच एकजुटता भी बन गयी है। राजनीतिक दल सरकार के साथ हैं, क्योंकि पाकिस्तान भी भ्रष्टाचार के मामले में भारतीय राजनीति से पीछे नहीं है। 70 प्रतिशत असेम्बली मेम्बर राजनीतिक एवं आर्थिक भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। पाक विदेश मंत्री रब्बानी ने भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का सार्वजनिक जिक्र भी किया। भारत में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े आंदोलन और भ्रष्टाचार के मुददों का भटकना हम देख ही रहे हैं।

इस बात की तारीफ भी की जाती है, कि भारत में जनतंत्र की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि दुनिया की सबसे भ्रष्टतम सरकारों में से एक होने के बाद भी, दिल्ली की सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर लेती है। यह भी प्रचारित किया जाता है कि भारत में सैनिक तानाशाही का कोर्इ खतरा नहीं है, और सेना राजनीति से अलग रहती है। जनतंत्र के लिये, भारत में सेना का सत्ता से दूर रहना, अच्छी बात है। मगर, राजनीतिक भ्रष्टाचार और भ्रष्टतम सरकार का सत्ता में बने रहना और जनविरोधी मौजूदा सरकार की मुक्त बाजारवादी नीतियों से, देश में वित्तीय तानाशाही के लिये राह बनाते हुए चलना, भारतीय जनतंत्र के लिये बड़ा खतरा है। और हम खतरों से घिरे हैं। क्योंकि राजनीतिक अनास्था तेजी से फैल रही है।

भारत-पाक सीमा का विवाद और हाल-फिलहाल की घटी घटनाओं को, सिर्फ पाक सरकार और पाक सेना से जोड़ कर देखना, जो है उसे उससे कम करके आंकने की कोशिश है। एशिया में राजनीतिक हितों के लिये, साम्राज्यवादी ताकतों ने इस्लामी आतंकवादियों को अपना हथियार बना लिया है। बड़े पैमाने पर आतंकी घुसपैठ और राजनीतिक असिथरता पैदा करने के लिये विद्रोह की सिथतियां पैदा की जाती हैं। ज्यादातर आतंकी ताकतों के पीछे अमेरिकी साम्राज्य और पाशिचमी ताकतें हैं। सीरिया का मुददा हमारे सामने है, जहां तुर्की और जार्डन की सीमा से आतंकी घुसपैठ कराया गया। राजनीतिक असिथरता और गृहयुद्ध की सिथतियां आज भी बनी हुर्इ हैं। पाक सरकार की कोशिशें भारत को असिथर बनाने की है। मगर, वह इतना बड़ा सपना अकेले तो देख सकता है, मगर उसकी पहल वह अकेले नहीं कर सकता।

पाक सरकार और पाकिस्तान की सेना के साथ मिल कर अमेरिकी साम्राज्य और पशिचमी ताकतों ने पाक-अफगान सीमा पर इस्लामी आतंकियों को जन्म दिया। संसद भवन से लेकर मुंबर्इ पर आतंकी हमले हुए। और इसका अंत अब तक नहीं हुआ है। पाकिस्तान में खुलेआम रह रहे लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सर्इद को हमले से पहले पाक अधिकृत कश्मीर में देखा गया, जिसने भारत के खिलाफ आतंकी हमले तेज करने की बात की है। जो मुंबर्इ हमले का मास्टर मार्इंड है। देश की गुप्तचर सेवा से यह भी जानकारी मिली है कि 2,500 प्रशिक्षित आतंकवादी भारत में घुसपैठ के लिये तैयार बैठे हैं। तहरीक-ए-तालिबान ने एक वीडियो जारी कर अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा से बाहर कश्मीर भारत और अमेरिका तक पर हमले की धमकी दी है। पाकिस्तान के खैबर, पख्तूनख्वाह, ननकाना साहब, बलूचिस्तान में सिक्ख हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं, अगवा की गयी लड़कियों से जबरन निकाह, फिरौती और हत्यायें हो रही हैं। सिंध की हालत भी यही है।

भारत-पाक के रिश्तों में आयी तल्खी, अमेरिकी सक्रियता, पाकिस्तान में जातीय हिंसा, कादरी का उदय और राजनीतिक संकट और आनन-फानन में सभी मसलों को टांगने की कवायतें, पूरी तरह प्रायोजित ही लगती हैं। कादरी की पृष्टभूमि सूफियाना से ज्यादा इस्लामी है, और परवेज मुर्शरफ के द्वारा तख्तापलट में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। बुलेटप्रूफ कन्टेनर में उनका होना, अमेरिकी संरक्षण ही है। जिस तरह पशिचमी मीडिया ने रातों-रात उन्हें हीरो बनाया, वह भी इस ओर ही इशारा करते हैं कि आवाम को गलत दिशा दी जा रही है और उनके पीछे पशिचमी ताकतें और सेना है। आतंकवादी पाकिस्तान में ही नहीं, भारतीय सीमा पर भी हैं। हमारे लिये यह सोचना जरूरी है कि यूरो-अमेरिकी शकितयां पाकिस्तान के माध्यम से भारत से क्या चाहती हैं?

भारत खुला बाजार बना हुआ है और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अगवानी मनमोहन सरकार बड़े ही धूमधाम से कर रही है। वालमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां 500 करोड़ से बड़ा खुदरा बाजार हथियाने की होड़ में लगी हैं। बीमा योजनाओं से लेकर कृषि, उधोग और हथियारों के साथ भारत के प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जमाने की नीतियों में अनुकूल सुधार की जरूरतें अमेरिकी सरकार और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां महसूस करती रही हैं। उन्हें और सहुलियतें चाहिये। निजी क्षेत्र में पूंजीनिवेश की नयी संभावनायें बनाने के लिये उन्हें मनमोहन सिंह जैसा ही नेतृत्व चाहिये। आम जनता जिनके पक्ष में नहीं है। राजनीतिक भ्रष्टाचार के अनगिनत कारनामों ने जनप्रतिरोध को जन्म दे दिया है। बढ़ती हुर्इ महंगार्इ और सरकार की जनविरोधी नीतियों ने आम जनता को सड़कों की राह दिखा दी है। देश की सुरक्षा और राजनीतिक असिथरता इन मुददों को पीछे धकेल सकती है। उन मुददों को पीछे धकेल सकती है, जो उदारीकरण और अमेरिका विरोधी हैं।

भारत में आम चुनाव 2014 में है, इसलिये माहौल को बदलने की अमेरिकी कोशिशों में मौजूदा सरकार भी तटस्थ नहीं रह सकती है। इस बात के निशिचत प्रमाण खुलेआम भेल ही नहीं हैं, किंतु साम्राज्यवादी ताकतें जो दुनिया के देशों में करती रही हैं, उसे भारत में क्यों नहीं करेंगी? का जवाब नहीं है। भारत अमेरिकी खेमें में है, मगर उसका होना निरापद नहीं है। पूर्व समाजवादी देशों से भी उसके सम्बंध हैं। चीन, रूस, र्इरान और गैर अमेरिकी खेमें के देशों से भी वह जुड़ा हुआ है। अनगिनत मुददे हैं जहां वह दुनिया में अमेरिका के साथ नहीं है। चीन के उपसेना प्रमुख जनरल क्वीजियांगुओ ने भारतीय रक्षा सचिव शशिकांत शर्मा के साथ दो दिवसीय रक्षावार्ता के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि ”उनका मकसद सीमा और दक्षिण एशिया में शांति एवं सिथरता को बढ़ावा देना है।”

11 जनवरी को चीन के शीर्ष राजनयिक दार्इ बिंगुओं ने चीन के भावी नेतृत्वकर्ता शी जिनपिंग का पत्र नर्इ दिल्ली को सौंपा, जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस पत्र का जवाब है, जो शी जिनपिंग के कम्युनिस्ट पार्टी आफ चाइना के महासचिव तथा हूजिंताओ के उत्तराधिकारी चुने जाने पर लिखा था। पत्र में शी जिनपिंग ने लिखा है कि ”बीजिंग नर्इ दिल्ली के साथ सम्बंधों के विकास को अत्यधिक महत्व देता है।” उन्होंने द्वीपक्षीय सहयोग को बेहतर बनाने के लिये करीबी सम्बंध बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए लिखा है कि ”चीन और भारत के समान विकास के लिये दुनिया में पर्याप्त गुंजाइश है।”

क्वी बिंगुओ ब्रजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिणी अफ्रीका (बि्रक्स) के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों की बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली आये थे।

रूस के राष्ट्रपति पुतिन की, पिछले माह की यात्रा को भी, महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिसमें कर्इ महत्वपूर्ण समझौते हुए। वैसे भी, भारत के लिये 70 प्रतिशत हथियारों की आपूर्ति रूस ही करता है। साम्राज्यवादी देश इसमें सेंधमारी चाहते हैं। लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों के संगठन के प्रतिनिधि क्यूबा, वेनेजुएला और चिली की भारत यात्रा के बाद से ही इस प्रक्रिया में गति आयी है। जिन्होंने भारत और चीन को बहुधु्रवी विश्व की अवधारणा से जोड़ने की सकारात्मक पहल की।

भारत-पाक के रिश्तों का उलझना, पाकिस्तान की आंतरिक उलझनों का विस्फोटक होना, सेना के साथ आतंकवादियों के लिये निर्णायक जगह बनाने की साम्राज्यवादी साजिशें हैं, ताकि भारत को मुक्त बाजार और पाकिस्तान को सैनिक ठिकाना बनाया जा सके। मौजूदा घटनायें भारत-पाक के लिये अमेरिकी सबक हैं। जहां इस्लामी आतंकवाद समान खतरा है।

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