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सपाट बनाने का कारखाना

coffee-1816108_1280कई बार जिंदगी बड़ी सपाट सी लगने लगती है, जो कि है नहीं। सुबह, दोपहर, शाम और रात। यही सिलसिला। दिन का सिलसिलेवार तरीके से बीतना। रात का ऐसा गुजरना जैसे गाफिलों की नींद। बुरा लगता है, कि जो है नहीं, वह क्यों लगता है? तमाम घट रही घटनाओं के बीच ऐसा क्यों है जैसे जीवन घटना शून्य है?

किसी चीज से, किसी बात से वह वास्ता नहीं जुड़ता कि यदि वह अच्छा है, तो हम अपनी उलझनों से उबर कर उसे जी सकें। यदि बुरा है, तो उसे बदलने के लिये कुछ करें।

नहीं, हम ऐसा नहीं करते, और शायद इसीलिये घटना शून्य हो जाते हैं। घटना शून्य जीवन की दूर्घटना से गुजरने लगते हैं। वास्ताहीन जिंदगी के जाल में उलझ जाते हैं। न हंसते हैं, न रोते हैं। दुखी या खुश होना भूल जाते हैं। हमारे भीतर मशीन का वह पुर्जा बनने लगता है, जो मशीन के चलने से चलता है, और मीशन के रूकने से रूक जाता है। और सबसे बड़ी बात यह है, कि मशीन के चलने, रूकने पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। पुर्जे की पकड़ किसी भी चीज पर नहीं होती।

घिसने या टूटने पर उसे बदल दिया जाता है। वह चाहे, न चाहे उसे बदल दिया जाता है। जिंदगी खत्म हो जाती है।

एक आदमी कूड़े के ढ़ेर में होता है। कबाड़ी की दुकान में होता है। वहां होता है, जहां उसे होना नहीं चाहिये। सामान से भरी यह दुनिया, आदमी के लिये जरूरत से ज्यादा बुरी हो गयी है। और सबसे बुरी बात यह है, कि हम यह जानते ही नहीं, कि हमें क्या करना है?

एक पेट है अपना, जिसे भरना है।

एक जिंदगी है अपनी, जिसे जीना है।

दिमाग को हमने सवालों से खाली कर दिया है।

अपनी मानवीय भावनाओं को खारिज कर दिया है।

हमारे पास सामूहिक, सामाजिक जिंदगी है ही नहीं। जबकि मशीन पुर्जों से बनता है, पुर्जों के चलने से चलता है। दुनिया मे कोई खुदाई खिदमदगार नहीं। हम भी नहीं।

हमें इस बात की जानकारी भी नहीं, कि हम जिन्हें बनाते हैं, उन्होंने हमें सपाट बनाने के लिये एक रोड रोलर बना लिया है। जो चलता है हमसे, हमारी ताकत, हमारी लाचारी से। यदि आपने देखी है ऊंची इमारतें, मिनारें तो जान लें कि उन्हें भी हमने ही बनाया है। राजभवनों और स्मारकों को भी हमने ही बनाया है, जहां आज कल बड़ी सरगर्मी है। आदमी को पुर्जा बनाने की सोच पल रही है, योजनायें बन रही हैं, अभियान चल रहे हैं। एक पुर्जे से दूसरे पुर्जे को अलग रखने के लिये जरूरी है, कि हम सपाट हों। यह अमानवीय है कि हम सपाट हैं।

दुनिया में लोगों को सपाट बनाने के इतने कारखाने लग गये हैं, कि आधी से अधिक आबादी या तो सपाट हो गयी है, या सपाट हो रही है। भारत में भी ऐसे कारखाने लगाये जा रहे हैं। झांक कर देखें कि क्या आपके भीतर वह कारखाना है?

हमारे साथ बुरा हो रहा है, कि वह कारखाना चारो ओर बड़ी तेजी से बन रहा है।

-आलोकवर्द्धन

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