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पूंजीवाद – सदियों का हत्यारा

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(इस आलेख के लिये हमने मई दिवस को आधार बनाया था, किंतु लगा इतिहास को दुहराने से अच्छा है, जहां उसे रोका गया है, वहां से धक्का दें। उन ताकतों की पहचान जरूरी है, जिन्होंने इतिहास को रोका है।)

हम अपने को, अपने परिवेश को जीते हैं, और लिखते हैं। जहां उम्मीदें तो हैं, मगर सामाजिक रूप से उम्मीदों के टूटने की आवाजें भी हैं। कुछ ऐसा भी है जिसे नहीं होना चाहिये। जो हमारी हड्डियों को गला रहा है। जो हम नहीं हैं, या तो हमें वैसा बना रहा है, या जो हम बन सकते हैं, उसे बनने से रोक रहा है। सबसे बुरी बात यह है, कि उसने हमें बनाने या बनने से रोकने की स्थितियों को अपने काबू में कर लिया है। सोच कर देखें, आपको यह बात कहीं से सही नहीं लगेगी कि आदमी सलाखों के पीछे जन्म ले, वहीं जीये, सलाखों से टकराता रहे और मर जाये। एक पूरी सभ्यता सलाखों के पीछे हो। एक पूरी व्यवस्था जेल की सलाखें हों।

यह बुरा है, मगर है।

ऐसा भी है, कि मुक्त होने की लड़ाईयां कभी थमी नहीं। जहां वैचारिक रूप से आज भी हम एक जुलूस हैं।

जिसे आज मई दिवस का जुलूस कह लें, मजदूर दिवस का जुलूस कह लें, मजदूर-किसान, कर्मचारी और बुद्धिजीवियों का जुलूस कह लें या उन लोगों का जुलूस कह लें, जो शोषण और दमन के खिलाफ हक और उसूलों की लड़ाईयां लड़ रहे हैं। एक पूरी सभ्यता के मुक्ति की लड़ाईयां लड़ रहे हैं।

आप यकीन करें और महसूस करके देखें, जुलूस व्यक्ति को संगठित वर्ग बनाता है। हमारे सामूहिक हितों की सामाजिक अभिव्यक्ति है। एक साथ खड़े होने और एक साथ आगे बढ़ने की जिंदा तस्वीर है। आज की तारीख में जुलूस हमारे जीने की लड़ाई है।

लड़ाई हक और उसूलों की है। एक गैर जरूरी समाज व्यवस्था के विरूद्ध जरूरी समाज व्यवस्था की है। सर्वहार संघर्ष, समाजवादी क्रांति और समाजवादी समाज व्यवस्था की है। जिसका ऐतिहासिक एवं सामाजिक आधार तो है, किंतु उम्मीदों के टूटने की आवाज भी है। आम संकट से घिरे पूंजीवाद की गुर्राहट भी है। जो अपने को बनाये रखने की न सिर्फ लड़ाई लड़ रहा है, बल्कि अपने को बचाने के लिये समाज के श्रमजीवी बहुसंख्यक वर्ग को भी खत्म कर रहा है। उसकी कोशिश आज के विरूद्ध आने वाले कल की उम्मीदों को तोड़ने की है।

दुनिया के आम आदमी की उम्मीदें न सिर्फ पूंजीवाद से टूटी हैं, बल्कि, बन कर बिखरे समाजवाद से भी उसकी उम्मीदें टूटी हैं। वह अपनी टूटी उम्मीदों से परेशान है। इसके बाद भी वह जन विरोधी बाजारवादी सरकारों के विरूद्ध जन समर्थक सरकारों के पक्ष में है। उसे इस बात का एहसास होने लगा है, कि समाजवाद हर हाल में पूंजीवाद से बेहतर है। समाजवादी सर्वहारा क्रांति और विकास के जरिये समाजवाद की नयी सोच पैदा हो गयी है। उसे यह लगने लगा है, कि पूंजीवादी साम्राज्यवाद दुनिया की शांति और स्थिरता और इतिहास के स्वाभाविक विकास के विरूद्ध है। अमेरिकी साम्राज्यवाद मानव सभ्यता के लिये सबसे बड़ा खतरा है।

पूंजीवाद ने कभी सोचा ही नहीं, कि उसके खिलाफ खड़े होने की वजह क्या है?

उसने यह सोचा ही नहीं, कि मजदूर, किसान, बुद्धिजीवी वर्ग के न होने का मतलब सभ्यता का सन्नाटा है। प्रकृति विहीन पृथ्वी का जनशून्य होना है। वह पागल हत्यारे की तरह लोगों को मारने और उन्हें निचोड़ने पर तुला हुआ है। उसने समाज के केंद्र से व्यक्ति को हटा कर निजी पूंजी और निजी सम्पत्ति को रख दिया है। उसने अपने शोषणतंत्र को बनाये रखने के लिये राजसत्ता से लेकर धर्म का उपयोग किया। इतने तर्क खड़े किये, कि उसके अपने ही तर्क आज उसके विरूद्ध खड़े हैं। वह मानव सभ्यता के विरूद्ध सदियों का हत्यारा बन गया है।

यह सोच कर हैरत होती है, कि एक ऐसी व्यवस्था जो व्यक्ति, समाज, देश, दुनिया और मानव सभ्यता का हत्यारा है, वह अब तक टिकी क्यों है? उसके टिके रहने का आधार क्या है?

यह बात अपने आप में तय है, कि ऐतिहासिक विकासक्रम में पूंजीवाद अपनी जिंदगी पूरी कर चुका है। अब वह दूसरों की जिंदगी जी रहा है। उसका होना मानव समाज का अंतहिन शोषण एवं दमन है। स्थितियां बद् से बद्त्तर होती जा रही हैं। वह अपने को संभालने की स्थिति में नहीं है।

यदि आर्थिक रूप से बात करें तो पूंजी का संकुचन तेजी से हो रहा है। दुनिया की आधी से अधिक सम्पत्ति 8 लोगों के पास है। जिनमें से 5 अमेरिकी निजी कम्पनियां हैं। मगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था, जिस पर 20 ट्रिलियन डॉलर का बढ़ता हुआ कर्ज है, वास्तव में दीवालिया हो चुकी है। यही स्थिति पूंजीवादी तमाम बड़ी अर्थव्यवस्था की है। मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था अंतहीन मंदी के दौर में है। राज्य के नियंत्रण से मुक्त निजी वित्तीय पूंजी निर्णायक कारक बन गयी है। विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और वॉल स्ट्रीट के बैंकों ने विश्व अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में ले लिया है। जिसका सीधा प्रभाव उसकी राजनीतिक संरचना पर पड़ा है।

राजनीतिक रूप से पूंजीवादी लोकतंत्र वित्तीय तानाशाही में बदल चुकी है। चुनी हुई जन विरोधी सरकारों ने आर्थिक विकास के नाम पर अपने देश की प्राकृतिक सम्पदा एवंम् जन सम्पदा को निजी कम्पनियों को सौंप दिया है। पहले राष्ट्रीयकरण और फिर उदारीकरण की ओट में देश की अर्थव्यवस्था का निजीकरण कर दिया है। यह प्रक्रिया आज भी चल रही है। सरकारें बिकते-बिकते बाजार के हाथों पूरी तरह बिक चुकी हैं। लोकतंत्र दिखावटी लोकतंत्र में बदल चुका है।

सामाजिक रूप से वर्ग विभाजित पूंजीवादी समाज अंधकार की उस सुरंग से गुजर रहा है, जहां व्यक्ति से ज्यादा वस्तुओं की भरमार है। मुनाफा के लिये उसके बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमता को उत्पाद में बदल दिया गया है।

आर्थिक अनिश्चयता, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक विकल्पहीनता है। फिर भी, सर्वहारा संघर्ष और समाजवादी क्रांति और पूंजीवादी विश्व में समाजवाद की दिशायें अवरूद्ध हैं। यह प्रामाणित किया जा रहा है, कि पूंजीवाद ही मानव विकास की चमर अवस्था है। किसी भी नयी व्यवस्था के लिये, कोई जगह नहीं है।

क्या स्थितियां वास्तव में ऐसी हैं?

हमार सीधा सा जवाब है- ‘‘नहीं।‘‘

किंतु, इस बात को हम अच्छी तरह जानते हैं, कि जनसंघर्ष और समाजवादी सर्वहारा क्रांति को असंभव की सीमा तक कठिन बना दिया गया है? आज किसी भी देश को, उसकी आम जनता को, अपने देश की सरकार बनाने और अपने लिये समाज व्यवस्था को चुनने का अधिकार नहीं है। पूंजीवादी वैश्विक ताकतें सदियों का हत्यारा बन चुकी हैं।

(जारी-कल भी)

-आलोकवर्द्धन

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