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पूंजीवाद – सदियों का हत्यारा – 2

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(इस आलेख के लिये हमने मई दिवस को आधार बनाया था, किंतु लगा इतिहास को दुहराने से अच्छा है, जहां उसे रोका गया है, वहां से धक्का दें। उन ताकतों की पहचान जरूरी है, जिन्होंने इतिहास को रोका है।)

‘‘हम इतने बड़े हैं, कि कोई हमें हरा नहीं सकता‘‘ की सोच उनकी है, जो साल के पहले महीने में ‘दावोस‘ में मिलते हैं, और अपने बड़े होने की खुशियां मनाते हुए, ‘‘दुनिया को किस हाल में रखना है?‘‘ यह तय करते हैं। उनकी वार्ताओं की मेज पर होते हैं, हम और हमारी पृथ्वी जिसे वे बनाते-बिगाड़ते हैं। जिनके लिये विश्व उनकी जागीर है।

और इसमें शामिल होते हैं, वो दैत्याकार लोग और उनके समर्थक देशों की सरकारें, राष्ट्राध्यक्ष या उनके प्रतिनिधि। बैंक, वैश्विक वित्तीय संगठन, महत्वपूर्ण सर्वे एवं रेटिंग एजेंसियां, गिनी-चुनी मीडिया और अपने क्षेत्र के वे विशेष लोग जो मानते हैं, कि उनका वहां होना बड़ी बात है।

‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम‘ आज की दुनिया की, एकमात्र ऐसी इकाई, ऐसा संगठन है, वास्तव में जिससे बड़ा कोई नहीं है। जिसकी मरजी के बिना न तो सरकारें बनती हैं, ना ही टिकती हैं।

दुनिया को अपने मुताबिक चलाने और पूंजीवादी व्यवस्था के विरूद्ध किसी भी दूसरी व्यवस्था को न बनने देने की स्थायी नीतियां दावोस की हैं। जहां विश्व समुदाय, विश्व जनमत और आम लोगों का हित कहीं नहीं है। हम उनकी निगरानी में हैं। उनकी निगरानी में हमारा आज और आने वाला कल है। वो सदियां हैं, जो बीतीं, वो सदिया हैं, जो बीत रही हैं, और वो मानते हैं, कि आने वाली सदियां भी उनके कब्जे में हैं। यदि वो नहीं तो कुछ भी नहीं।

मार्क्स ने जिस उपनिवेशवाद को साम्राज्यवाद में बदलते देखा था, लेनिन ने जिस साम्राज्यवाद को बढ़ते और पूंजी के जिस इजारेदारी को बनते देखा था, पूंजी की यह इजारेदारी उससे बहुत बड़ी है। पूंजीवाद के गुरू एडम स्मिथ और शिकागो स्कूल के उनके चेलों ने भी जिसकी कल्पना नहीं की थी, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम उससे बड़ा और शक्तिशाली बन चुका है।

एक बार हम यह मान लें कि हमारे मौजूदा विश्व के केंद्र में वह पूंजी है, जो विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व व्यापार संगठन, वॉल स्ट्रीट और दुनिया भर के फेडरल, रिर्जव और सेण्ट्रल बैंक को संचालित करती है, और विश्व अर्थव्यवस्था के साथ उसकी राजनीतिक एवं सामाजिक संरचना को नियंत्रित करती है, जिसके आगे पीछे द्विपक्षीय और बहुपक्षीय आर्थिक, सामरिक एवं कूटनीतिक संधि समझौते घूमते-फिरते हैं। यूरोपीय देश, अमेरिकी साम्राज्य और तीसरी दुनिया के सहमत-असहमत देशों की सरकारें हैं, जिन्होंने अपने होने का निर्णायक जाल इस तरह फैला लिया है, कि हम और आप उससे बाहर नहीं जी सकते। हमारे लिये सिर छुपाने पांव फैलाने की तो क्या पांव रखने को भी जगह नहीं है।

और यह सच है। सच की यह तस्वीर जरूरत से ज्यादा भयावह है। आम आदमी उस संरचना की गिरफ्त में है, जिस पर उसकी कोई पकड़ नहीं। आज से पहले की दुनिया ऐसी नहीं थी। शोषण एवं दमन का तंत्र भले ही सदियों पुराना है, किंतु राज्य एवं साम्राज्य की उत्पत्ति और वैश्विक वित्तीय ताकतों का उस पर नियंत्रण ने, आम आदमी के हाथों से उसकी दुनिया छीन ली है। और जिन्होंने हमसे हमारी दुनिया छीनी है, वे ही स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और मानवाधिकार की बातें करते हैं। भूख, गरीबी, बेरोजगारी और अमानवीय स्थितियां के विरूद्ध बढ़ते जनअसंतोष को गलत दिशा देने के लिये हमसे हमारा विरोध और प्रतिरोध भी छीन लेते हैं। नकली जन आंदोलन और जन प्रदर्शनों का आयोजन करते हैं। लोकतंत्र और समाजवाद के विरूद्ध ऐसी सरकारों का गठन करते हैं, जो आम जनता के हितों के नाम पर राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और कॉरपोरेशनों के लिये काम करती है।

जन असंतोष और जन आंदोलनों के बढ़ते अपहरण में, मीडिया की भूमिक बड़ी हो गयी है। वो उन संगठित आतंकवादियों की तरह ही है, जिसे राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिये साम्राज्यवादी ताकतों ने खड़ा किया है, और जिनके खिलाफ सैन्य हस्तक्षेप कर इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया जैसी स्थितियां पैदा की जाती हैं। जन समर्थक सरकारों के विरूद्ध आज जो वेनेजुएला में हो रहा है, वह बदले संदर्भों में चिली में पहले हो चुका है। सैनिक एवं वैधानिक तख्तापलट की नयी शुरूआत हो गयी है। जिसका मूल मकसद है ‘‘विकास के जरिये समाजवाद की अवधारणा‘‘ को रोकना। पूंजीवादी विश्व में समाजवादी विकल्प को रोकना। नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के लिये समाजवादी एवं गैर पूंजीवादी देशों की अर्थव्यवस्था को तोड़ना।

नव उदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवाद की साम्राज्यवादी सोच ने दुनिया को जिस मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया है, जहां युद्ध, आतंक और असुरक्षा है। पतनशील व्यवस्था का मलबा भहरा कर गिर नहीं रहा है, बल्कि वह उन्हें दूसरों के कंधे पर लादता जा रहा है। उसका अपना वजन भी इतना बढ़ गया है, कि खुद को संभालना भी उसके अपने बस में नहीं है। वह विश्व के वैकल्पिक व्यवस्था को ही नहीं खा रहा है, बल्कि अपने को भी खा रहा है। पूंजीवाद खुद को निगलते हुए अजगर की तरह है।

(जारी – कल भी)

-आलोकवर्द्धन

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