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पूंजीवाद – सदियों का हत्यारा – 3

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(इस आलेख के लिये हमने मई दिवस को आधार बनाया था, किंतु लगा इतिहास को दुहराने से अच्छा है, जहां उसे रोका गया है, वहां से धक्का दें। उन ताकतों की पहचान जरूरी है, जिन्होंने इतिहास को रोका है।)

हम अपनी बात इस सवाल से शुरू करेंगे कि ‘‘जो व्यवस्था अपने का बचा नहीं सकती, वह कब तक टिकी रह सकती है?‘‘

और इससे भी ज्यादा जरूरी सवाल यह है, कि किसी भी व्यवस्था के टिके रहने का आधार क्या है? उसे क्यों टिके रहना चाहिये?

यह तो मानी हुई बात है, कि पूंजीवाद ने अपने को दुनिया पर थोप कर रखा है, उसकी ऐतिहासिक अनिवार्यता समाप्त हो चुकी है। भले ही उसकी सोच है, कि ‘‘वह मानव सभ्यता का चरम विकास है।‘‘ किंतु बढ़ते हुए जन असंतोष और गहराते हुए संकट ने खबरें फैला दी है, कि पूंजीवाद जन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। आज विश्व के सामने जितनी भी समस्यायें हैं, वह इस रूकी हुई व्यवस्था की वजह से है। ऐतिहासिक विकास क्रम में वह पूरी तरह से असंदर्भित हो गया है। उसका वैश्वीकरण भूख, गरीबी, आतंक और युद्ध का वैश्वीकरण है।

जिसे वह अर्थव्यवस्था का उदारीकरण कहता है, वास्तव में वह अर्थव्यवस्था का निजीकरण हैं आम जनता और आम जनता के द्वारा चुनी हुई सरकारों को अपने कब्जे में लेना है। आर्थिक विकास उसके स्त्रोत, उत्पादन के साधन और बाजार पर बेरोक-टोक अधिकार जमाना है। आर्थिक रूप से पूंजी की तानाशाही और राजनीतिक रूप से एकाधिकार स्थापित करना है।

क्या पूंजीवादी समाज व्यवस्था का उदय इन्हीं उद्देश्यों को पाने के लिये किया गया था?

जवाब तो है- ‘‘नहीं!‘‘

लेकिन, राज्य एवं साम्राज्य की उत्पत्ति का आधार ही है – शोषण और दमन।

हम चाह कर भी सोच और इतिहास की गहराईयों में उतर नहीं सकते। हमारी सीमायें हैं। ‘‘विपन्नता के साम्यवाद‘‘ से कबिलाई समाज, सामंतवाद से लेकर पूंजीवाद का, और समाजवाद से लेकर विकसित साम्यवाद का जिक्र नहीं कर सकते। बस, इतना ही कह सकते हैं, कि ‘‘मार्क्सवाद‘‘ एक सुसम्बद्ध विचार और समाज व्यवस्था है, एक ऐसी चिंतन धार है, जो ‘लेनिनवाद‘ से ‘21वीं सदी के समाजवाद‘ तक पूंजीवाद का एकमात्र विकल्प है। जिसे जानने और मानने की सख्त जरूरत है। उसके मरने की घोषणां, या एक ऐसी चिंतन धारा प्रमाणित करना जो ‘समाज व्यवस्था‘ नहीं बन सकती, हर पल बदलते पूंजीवाद के शातीर दिमाग की उपज है। जिसका एक ही मकसद है, कि सोच एवं समाज व्यवस्था के स्तर पर विश्व विकल्पहीन रहे, ‘समाजवादी विकल्प‘ से बच कर पूंजीवादी विकल्प की गालियों में भटकती रहे। समाजवाद को रोकने के लिये उसने आर्थिक, सामरिक, कूटनीतिक और सांस्कृतिक मोर्चे खोल रखे हैं।

और सबसे बड़ी बात यह है, कि वह इन मोर्चों पर असफल नहीं है। उसकी वित्तीय इकाईयां वैश्विक स्तर पर मंदी का भूत खड़ा करती है, और ओझा-गुनिया की तरह झाड-फूक भी करती है। जिस मुक्त व्यापार और बाजारवादी अर्थव्यवस्था ने वैश्विक स्तर पर वित्तयी संकट को पैदा किया, उसी बाजारवादी व्यवस्था के विस्तार के लिये यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद अंतर्राष्ट्रीय करार करती है, तो रूस-चीन और उसके सहयोगी देश मुक्त बाजार के नये क्षेत्रों की रचना भी करते है, जिनमें तीसरी दुनिया के उन देशों की हिस्सेदारी भी होती है, जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ बहुध्रुवी विश्व के पक्षधर हैं।

इस बाजारवादी व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद हो, या रूस-चीन की मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना का कार्यभार और आपसी प्रतिस्पर्द्धा, मुनाफा वैश्विक वित्तीय ताकतों का ही बढ़ता है। यूरो-अमेरिकी बाजारवाद या रूसी-चीनी बाजारवाद में वित्तीय स्तर पर कोई खास फर्क नहीं है। भले ही रूस के साथ पूर्व सोवियत संघ की कुछ बातें जुड़ी हुई हैं, और चीन आज भी अपने को साम्यवादी देश ही मानता है, जहां राज्य की इजारेदारी भी नहीं है। निजी कम्पनियां राज्य की कम्पनियों की साझेदार बन गयी हैं। बाजारवादी वैश्वीकरण से निर्मित कूटनीतिक एवं सामरिक खेमे, वैसे तो अलग-अलग हैं, लेकिन यह पूंजीवादी साम्राज्यवाद और समाजवादी देशों का खेमा नहीं है। वैश्विक वित्तीय ताकतों की पकड़ इन खेमों पर मजबूत है। सच यह है, कि इन देशों की अर्थव्यवस्था वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। जिन पर विश्व वित्त व्यवस्था के उतार-चढ़ाव का प्रभाव पड़ता है। वित्तीय सम्बंधों ने बाजार को वहां खड़ा कर दिया है, जहां सरकारें दूसरे दर्जे पर खड़ी हो गयी हैं।

सरकारों को अपने देश की सरकार होने का दर्जा दिलाने की लड़ाई भी वामपंथी ताकतों को ही लड़नी पड़ रही है। जन समर्थक सरकार की दिशा ‘21वीं सदी का समाजवाद‘ या ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की -एक सीमा तक- मूल अवधारणा सी बन गयी है, जिसकी लोकतांत्रिक मान्यताओं में दक्षिणपंथी – प्रतिक्रियावादी ताकतें भी राजनीतिक रूप से सक्रिय रहती हैं, जो यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवादी हितों से संचालित हो रही है। जिनके पास अपार वित्तीय एवं सामरिक क्षमता है। यदि वेनेजुएला का उदाहरण लें तो शॉवेज के असामयिक निधन के बाद वेनेजुएला इसी चौराहे पर खडा है। लातिनी अमेरिकी देशों में समाजवाद संकटग्रस्त है। जहां समाजवादी जनक्रांति के बाद सर्वहारा वर्ग की तानशाही को नकारने की गल्तियां भी हुई हैं।

पूंजीवाद से समाजवादी संक्रमण की पद्धति, उसकी लोकतांत्रिक दिशा और राज्य की सरकारों का वित्तीय इकाईयों के माध्यम से निजी वित्तीय पूंजी का नियंत्रण -जिसका स्वरूप वैश्विक है- किसी एक देश में समाजवादी क्रांति की बड़ी मुश्किलें हैं। और सारी दुनिया में एकसाथ समाजवादी क्रांति संभव नहीं है। पूंजीवाद की चुनी हुई सरकारों ने वित्तीय ताकतों को वैधानिक शक्तियां सौंप कर अपने को बनाये रखने की, अब तक की सबसे बड़ी साजिशों को अंजाम तक पहुंचा दिया है। टेक्नोलॉजी -जिसमें वॉर टेक्नोलॉजी भी शामिल है- ने भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अपनी धुन में पागल सदियों का हत्यारा समाजवादी क्रांति, मार्क्सवादी सोच और समाजवादी समाज व्यवस्था को रोकने के लिये आत्मघाती हो चुका है। उसने मानव सभ्यता के विनाश को अपना अंतिम हथियार बना लिया है।

वैसे, इतिहास हत्यारों के खिलाफ लम्बी लड़ाई भी है।

-आलोकवर्द्धन

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