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गाय एक पॉवरफुल प्राणी है

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पहले बड़े-बड़े लेखकों और कवियों की पंक्तियां दे दी जाती थीं, और कहा जाता था- संदर्भ के साथ व्याख्या कीजिये।

अब बड़े-बड़े बिकाऊ लेखक और कवि पैदा होते हैं, जिनकी पंक्तियां ऐसी होती है, कि संदर्भ के साथ व्याख्या की जरूरत ही नहीं पड़ती। इसलिये कहा गया – ‘‘खबर पढ़िये और गाय पर लेख लिखिये।‘‘

आप भी खबर पढ़िये-

‘‘संघ गो वध रोकने के लिये रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन करेगी। आयोजित कार्यक्रम में रोजादारों को दूध पिलाया जायेगा। कुरान और नबी के हवाले से समझाया जायेगा, कि गो वध इस्लाम के विरूद्ध है। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच बन गया है। इस्तकबाल रमजान की रूपरेखा बन रही है।‘‘

खबर पढ़ते ही दिमाग की खिड़की खुल गयी और खिड़की से कूद कर समझ आ गयी कि-

संघ हिंदुओं का संगठन है, जिसे गाय की बड़ी फिक्र है।

गाय संघ के लिये पवित्र जीव है।

मुसलमान गायों का वध करते हैं।

कुरान और नबी को नहीं समझते।

मुसलमान दूध नहीं पीते।

अब दूध पिला-पिला कर संघ उन्हें रोजा-रमजान, कुरान और नबी को समझायेगी। हिंदुस्तान में गायों के साथ रहने का तरीका भी समझायेगी।

यह भी समझ में आया कि यह राजनीति है।

बहुसंख्यक समुदाय की राजनीति करने वालों ने अल्पसंख्यकों को भी अपने निशाने पर ले लिया है। राम के साथ गाय की राजनीति हुई और अब गाय के साथ दूध की राजनीति होगी। यह राजनीति गो पालकों को प्रेरित करेगी, या गो रक्षकों का काम आसान करेगी? नहीं जानता। बस इतना जानता हूं कि पहले गाय कपिला, कामधेनु और सीधी लगती थी, अब डराती है। डर गो-रक्षकों से लगता है। जो इतना पीटते हैं, कि जान फुर्र से उड़ जाती है। उनकी मरजी। मरजी हुई तो पेड़ से टांग भी देते हैं।

समझ में नहीं आ रहा है, कि लेख कैसे लिखूं?

पहले लिखते थे- ‘‘गाय एक चौपाया जानवर है‘‘, और मुंह, आंख, नाक, कान, सिंग, पूंछ गिनाते हुए दूध-दही, मक्खन, घी, मलाई बनवा देते थे। बछड़ा-बछिया से लेकर गोबर तक का उपयोग बताते थे और अंत गाय के पालतू जानवर होने से होता था। मगर अब गाय को पालतू बनाने और जानवर बताने का साहस नहीं होता। लेह डंडा, लेह लाठी और पेड़ से झूलती लाश नजर आने लगती है। गो-रक्षक यमदूत बन जाते हैं।

मगर लेख न लिखने का मतलब होगा- गो द्रोही, राष्ट्रद्रोही, धर्मद्रोही।

इसलिये लेख लिखने की कोशिश मैं करता हूं-

गाय एक राजनीतिक प्राणी है।

गाय के दूध से राजनीतिक सम्बंध बनते हैं। वह एक समुदाय को दूसरे समुदाय से जोड़ने का काम करती है।

गाय के गोबर से खाद बनता है। खाद से राजनीतिक सद्भावना की फसल लहलहाती है। जिसका आदर्श रूप गोबर गणेश है।

गो मूत्र असाध व्याधियों की अचूक दवा है।

गाय के पीछे-पीछे भगवा टोली चलती है। ‘‘टोली का यह नारा है, गाय हमारी माता है।‘‘ सुनते हैं, माताओं के लिये ऐम्बुलेन्स की व्यवस्था हो गयी है।

गाय अब इस देश में आराम से रहती और विचरती है। उन्हें सांड़ों और हत्यारों का खौफ नहीं।

गाय को पीएम और सीएम चारा खिलाते हैं।

नयी सरकार के क्षेत्राधिकार में गाय एक पॉवरफुल प्राणी है।

मुझे खुशी हुई कि मैं मीडिया कर्मियों की तरह लिख सकता हूं। हर अच्छाई को सरकार से जोड़ देता हूं। यदि गाय नहीं होती तो दूध नहीं मिलता, दूध नहीं मिलता, तो चाय नहीं बनती, चाय नहीं बनती तो इस देश को चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री नहीं मिलता। गाय को सत्-सत् नमन।

-आलोकर्वद्धन

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