Home / विश्व परिदृश्य / हथियारों पर बढ़ती निर्भरता – 1

हथियारों पर बढ़ती निर्भरता – 1

police-conduct-manhunt-after-mass-shooting-data

हथियारों की निगरानी में दुनिया को सुरक्षित रखने की कोशिश हो रही है। दावे किये जा रहे हैं, कि ‘दुनिया बची रहेगी।‘ इस दावे का कोई आधार नहीं है। किसी के पास इस सवाल का कोई जवाब नही है, कि ‘ऐसा कैसे होगा?‘ खास कर तब जब नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवादी वित्त व्यवस्था की पकड़ जबर्दस्त हो गयी है। हथियारों का उत्पादन निजी कम्पनियों के हाथों में है, और राज्य की सरकारों पर उनका कब्जा है। जिनके लिये हथियार उत्पादन, हथियारों की बिक्री और युद्ध और युद्ध का खतरा मुनाफे का धंधा है।

वो सरकारों के सहयोग से हथियार उत्पादन करती हैं।

सरकारों के सहयोग से हथियारों की खरीदी-बिक्री करती है।

और सरकारों के सहयोग से युद्ध का खतरा बढ़ाती हैं, और बाजार के लिये युद्ध करती हैं।

और इन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। सोवियत संघ के विघटन और समाजवादी शिविर के बिखरने के बाद वैश्विक वित्तीय ताकतें बे-लगाम हो गयी हैं। सभी देशों का सैनिक खर्च लगातार बढ़ रहा है।

‘स्टॉकहोम इण्टरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट के ‘वर्ल्ड मिलिट्री एक्ससपेन्डिचर रिपोर्ट‘ के अनुसार साल 2016 में हथियारों के लिये किया गया वैश्विक खर्च 1.68 ट्रिलियन डॉलर है। यह खर्च 2015 के खर्च से 0.4 प्रतिशत ज्यादा है।

2017 का खर्च इससे कहीं बढ़ा होगा। जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। दुनिया की पांच बड़ी अर्थव्यवस्था पर कर्ज का भारी बोझ है, उनकी कमर इतनी झुक गयी है, कि वो खड़ी नहीं हो सकती। वहीं दूसरी ओर दुनिया की आधी से अधिक सम्पत्ति पर आठ लोगों का अधिकार है। वे ही विश्व अर्थव्यवस्था और उसकी रणनीतिक संरचना को नियंत्रित कर रही है। जिसका सीधा सा मतलब है, कि हथियारों पर बढ़ती निर्भरता उन्हीं वित्तीय ताकतों की कारस्तानी है। समझना आसान नहीं कि कौन किसके विरूद्ध युद्ध की तैयारी कर रहा है? सेनायें किसके लिये लड़ रही है? किसके खिलाफ उन्हें खड़ा किया जा रहा है? शीतयुद्ध के बाद हथियारों के सबसे बड़े होड़ की शुरूआत हो गयी है। जिसकी अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी है, उस पर उतना ही बड़ा कर्ज है, और उसका सैन्य खर्च भी उतना ही बड़ा है।

बड़ी अर्थव्यवस्था,

बड़ा सैन्य बजट,

और बड़ा कर्ज।

और बड़े युद्ध की तैयारियां

इन सब की कड़ियां आपस में जुड़ी हुई हैं। यह नवउदारवादी वैश्विकरण और मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था के होने से भी जुड़ी हुई है, जिसने पूंजीवादी लोकतंत्र की जनविरोधी कॉरपोरेट सरकारों को भी जन्म दिया है। सवाल यह नहीं है, कि मुक्त बाजारवादी और जनविरोधी सरकारें दुनिया को कहां ले जायेंगी? हम जानते हैं। गड्ढ़़ा सामने है। ब्लैक होल है।

सवाल यह है, क्या हम बच सकते हैं? मानव सभ्यता और दुनिया को बचा सकते हैं? जिसका जवाब हमारे पास नहीं है। स्थितियां बद् से बद्तर हो चुकी है। मर्ज और दवा के बीच जो मुनाफा है, उसने हर मर्ज को ला-इलाज बना दिया है।

कह सकते हैं, कि घोषित पूंजीवादी तरीका या समाजवादी क्रांति का विकल्प हमारे सामने हैं। किंतु पूंजीवाद राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय पूंजी की तानाशाही के उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां राहें बंद हैं। उसके पास इतनी विध्वंसक ताकत है, कि वह समाजवादी समाज के निर्माण को रोकने के लिये, मानव समाज को उस गड्ढे में धकेल सकता है, जहां विकास की कोई अवस्था ही नहीं है। और वह ऐसा कर सकता है, क्योंकि खोने के लिये उसके पास सब कुछ है। शोषण और दमन से हासिल ऐसी दुनिया है, जो हथियारों के माल गोदाम पर बसी है। संयुक्त राज्य अमेरिका का जखीरा सबसे बड़ा है।

-आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top