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हथियारों पर बढ़ती निर्भरता – 2

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संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे बड़ा हथियार उत्पादक देश और हथियारों पर सबसे बड़ा खर्च करने वाला देश है, जिस पर 20 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का बढ़ता हुआ कर्ज है। पिछले साल 2016 में 611 बिलियन डॉलर उसने इस मद में खर्च किये। यह बजट 2015 के बजट से 1.7 प्रतिशत ज्यादा है। वह विश्व का सबसे बड़ा उत्पाती देश भी है। जिसके बारे में आप यकीन के साथ कह सकते हैं कि अमेरिका विश्व शांति के लिये सबसे बड़ा खतरा है। जहां भी अमेरिका है वहां युद्ध और आतंक है, राजनीतिक अस्थिरता और वित्तीय संकट है, बिगड़ता हुआ पर्यावरण संतुलन और मानव निर्मित प्राकृतिक आपदायें हैं।

चीन का सैन्य बजट 2016 में 215 बिलियन डॉलर था, जो कि साल 2015 की तुलना में 5.4 प्रतिशत ज्यादा है। जिसकी अर्थव्यवस्था में मंदी का आलम है, किंतु वह अपने सैन्य बजट में कटौती करने की स्थिति में नहीं है। वह अफ्रीका और लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों का सबसे बड़ा निवेशक देश है। रूस के साथ मिल कर उसने विश्व की वित्तीय वैकल्पिक व्यवस्था की गंभीर पहल की है। सीधे तौर पर वह अमेरिका, यूरोपीय देश और उसके मित्र देशों के निशाने पर है। जिनसे सामरिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। वह अपने वित्तीय एवं व्यापारिक हितों को सुरक्षित करना चाहता है। चीन की सामरिक क्षमता का अंदाजा किसी को नहीं है।

2016 में रूस का सैन्य खर्च 69.2 बिलियन डॉलर था, जोकि साल 2015 के सैन्य बजट से 5.9 प्रतिशत ज्यादा है। अमेरिका उसके लिये यूक्रेन, अफगानिस्तान और पूर्वी यूरोप में स्थायी खतरा बना हुआ है। सीरिया का मुद्दा जटिल है। राष्ट्रपति पुतिन सामरिक रूप से रूस को पूर्व सोवियत संघ के मुकाम पर पहुंचाना चाहते हैं।

अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी इन देशों के सरकारों ने अपने ऊपर ले ली है। अंतर्राष्ट्रीय संगठन, संधि और समझौतों से निर्मित सुरक्षा के प्रति विश्वास ही खत्म हो गया है।

राजनीतिक विश्लेषक मैरियस बेल्स ने दॉच वेल से चर्चा के दौरान कहा -‘‘आज से एक दशक पहले के राजनेताओं की अपेक्षा आज के राजनेताओं का विश्वास कूटनीतिक सम्बंध और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रति काफी घट गया है। वे अपनी सुरक्षा की व्यवस्था बनाने के लिये हथियारां पर भारी खर्च कर रहे हैं।‘‘ उनका सैन्य बजट बढ़ता जा रहा है। ऐसा नहीं है, कि ऐसी परिस्थितियां एक दिन में बनीं, बल्कि सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके समर्थक नाटो देशों ने असुरक्षा की इस भावना को बढ़ाने का काम किया। शीत युद्ध की समाप्ति के साथ जिस शांति एवं सहयोग की अवधारणा विकसित की गयी थी, उसकी धज्जियां उड़ गयीं। अफगानिस्तान और इराक पर बहुराष्ट्रीय सैन्य हस्तक्षेप, लीबिया पर अमेरिका सहित नाटो देशों के हमले, सीरिया के गृहयुद्ध ने यह प्रमाणित कर दिया कि संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी अमेरिकी साम्राज्य और उनके मित्र देशों को रोकने में नाकाम हैं। परिणाम स्वरूप, अविश्वास और असुरक्षा की भावना विश्व समुदाय के देशों में बढती चली गयी।

मैरियस बेल्स ने आगे कहा कि ‘‘अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के तनावग्रस्त वातावरण ने हथियारों की खरीदी को बढ़ा दिया है।‘‘ हंथियारों के नये होड़ की शुरूआत हो गयी है। मध्य-पूर्व में जारी लड़ाईयां और दक्षिणी चीन सागर के तनाव और कई अन्य युद्धों के अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन पर से उठता भरोसा इस तेजी के महत्वपूर्ण करण हैं।

बेल्स का आंकलन है, कि इस क्षेत्र में काफी तनाव है, जैसे कोरियायी क्षेत्र का तनाव – उत्तर एवं दक्षिण कोरिया के बीच का तनाव है। चीन और जापान का तनाव – पूर्वी चीन सागर पर अपनी दावेदारी का तनाव है। चीन और दक्षिण-पूर्वी एशियायी देशों के बीच दक्षिण चीन सागर पर अपनी दावेदारी का तनाव है। भारत और पाकिस्तान के बीच और भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का रोज बढ़ता तनाव है।

इन तनावों को लेकर, सम्बद्ध देशों की सरकारें अपनी सैन्य क्षमता के विस्तार और उसके आधुनिकीकरण को जायज ठहरा रही हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस और सउदी अरब के बाद भारत वह पांचवां देश है जो अपनी सैन्य क्षमता बढ़ने के लिये साल 2016 में 8.5 प्रतिशत की वृद्धि किया है। 55.9 बिलियन डॉलर का सुरक्षा बजट है। भारत में जब से नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है, उसके सुरक्षा बजट में न सिर्फ वृद्धि हुई है, बल्कि राष्ट्रवाद को उग्र बनाया जा रहा है, और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश से रिश्ते विस्फोटक हो गये हैं। सरकार समर्थक मीडिया पाकिस्तान के बगल में चीन को खड़ा करने की नीतियों से संचालित हो रही है। उग्र होता राष्ट्रवाद और निकटतम पड़ोसी देशों से बढ़ते तनाव का ही परिणाम है, कि भारतीय राजनीति में पहली बार सेना के साथ सरकार खुले रूप में खड़ी हो रही है। सेना की वरियता के लिये समानांतर जगह बनायी जा रही है। ‘‘सेना का सम्मान देश का सम्मान‘‘ जैसे नारे लगाये जा रहे हैं। दुनिया भर में उभरता फासीवाद चुनी हुई मोदी सरकार के पीछे पांव फैलाता जा रहा है।

निजी वित्तीय पूंजी की तानाशाही और राजनीतिक एकाधिकारवाद का विस्तार हो रहा है। उसकी तटस्थता भंग हो चुकी है। वह साम्राज्यवादी देशों के खेमें में है। उसकी नीतियां तनाव और युद्ध को आमंत्रित कर रही हैं।

– आलोकवर्द्धन

 

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