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हथियारों पर बढ़ती निर्भरता – 3

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यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है कि विश्व की अर्थव्यवस्था संकट ग्रस्त हैं, किंतु सरकारें हथियारों की खरीदी-बिक्री और हथियारों के उत्पादन को लगातार बढ़ा रही है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था को बनाये रखने की लड़ाईयां लड़ रही हैं, जिस पर उनका अपना नियंत्रण नहीं है। यदि सीधे तौर पर कहेंं तो सरकारें विश्व समुदाय और विश्व जनमत के हितों के विरूद्ध उन वैश्विक वित्तीय ताकतों के लिये लड़ रही है, जो विश्व की शांति और स्थिरता के लिये सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है, और वे ही ताकतें विश्व अर्थव्यवस्था की गिरावट का संकट है। जिनकी वजह से न तो शांति और स्थिरता बन सकती है, ना ही अर्थव्यवस्था संभल सकती है। देखा जाये तो इन सरकारों के पास अपना कुछ भी नहीं है, यहां तक कि वह देश भी अपना नहीं है, जिसकी सुरक्षा के लिये वो सैन्य बजट लगातार बढ़ा रही है।

‘स्टॉकहोम इण्टरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट‘ ने दुनिया के उन 15 देशों की सूची जारी की है, जिनका रक्षा बजट उनकी अर्थव्यवस्था पर भी भारी है। 15 में से 5 प्रमुख देश हैं-

संयुक्त राज्य अमेरिका – 611 बिलियन डॉलर

चीन – 215 बिलियन डॉलर

रूस – 69.2 बिलियन डॉलर

सउदी अरब – 63.7 बिलियन डॉलर

भारत – 55.9 बिलियन डॉलर

इन 5 देशों के अलावा – फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, इटली, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, संयुक्त अरब अमिरात और इस्त्राइल 10 प्रमुख देश है। पाकिस्तान इन 15 देशों की सूची में शामिल नहीं है। उसने 2016 में 9.93 बिलियन डॉलर अपनी सैन्य सुरक्षा पर खर्च किये हैं।

रिपोर्ट के अनुसार – ‘‘अमेरिका के 2016 का सैन्य बजट 2010 की अपेक्षा 20 प्रतिशत कम है, जिस समय अफगानिस्तान और इराक में उसकी सेना तैनात थी।‘‘

डॉलर पर टिका अमेरिकी साम्राज्य अब अमेरिकी सेना पर टिक कर रह गया है। अघोषित रूप से जिसमें निजी सेनायें और आतंकी गुट भी शामिल हैं। इन्हें आप चाहें तो अमेरिकी सेना का अग्रिम दस्ता कह सकते हैं, जिनके माध्यम से अमेरिका इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया जैसे देशों में गृहयुद्ध की स्थितियां पैदा करता है और सैन्य हस्तक्षेप सहित तख्तापलट की कार्यवाही करता है। जिसमें यूरोपीय देश भी शामिल रहे हैं।

कर्ज का संकट झेल रहे यूरोपीय देशों का सैन्य बजट भी बढ़ता जा रहा है। पश्चिमी यूरोप के सैन्य बजट में 2016 में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। मध्य यूरोप का सैन्य बजट 2.4 प्रतिशत बढा है।

एसआईपीआरटी के सीनियर रिसर्च कर्ता मारियस बेल्स ने कहा है, कि ‘‘मध्य यूरोप के ज्यादातर देशों के सैन्य खर्च में हुए वृद्धि का श्रेय कुछ हद तक रूस के खतरे के खिलाफ तैयारी को जाता है।‘‘ जबकि सच्चाई यह है, कि रूस का 2016 का बजट यूरोपीय नाटो सदस्य देशों के कुल खर्च का मात्र 27 प्रतिशत है।

एशिया और ओसियन क्षेत्र, मध्य एवं पूर्वी यूरोपीय क्षेत्र और उत्तरी अफ्रीका के देशों के सैन्य बजट में बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि मध्य अमेरिका एवं कैरेबियन देशों सहित मध्य पूर्व (जिनके आंकड़े उपलब्ध हैं), दक्षिण अमेरिकी और उप सहारा क्षेत्र के अफ्रीकी देशों के खर्च में गिरावट आयी है। मारियस बेल्स ने कहा है, कि ‘‘मध्य-पूर्व के सभी देश -ओमान को छोड़ कर- किसी न किसी हिंसक संघर्ष के शिकार हैं।‘‘ जिनके पीछे अमेरिकी एवं यूरोपीय ताकतें हैं। तेल की कीमतों में आयी गिरावट की वजह ऊपर से देखने में यह जरूर लग रहा है, कि इन देशों के सैन्य खर्च में गिरावट आयी है, किंतु सैन्य बजट में तेजी का दौर जारी है।

वैसे तेल की कीमतों में आयी गिरावट की वजह से सउदी अरब के सैन्य बजट में काफी कमी आयी है। साल 2015 में यह देश अपनी सेना पर सबसे ज्यादा खर्च करने वालों की सूची में तीसरे स्थान पर था, मगर, साल 2016 में उसके खर्च में 30 प्रतिशत की कटौती की, उसका 2016 का बजट 63.7 बिलियन डॉलर है।

लातिनी अमेरिकी देश वेनेजुएला ने अपने सुरक्षा खर्च में 56 प्रतिशत की कटौती की। दक्षिणी सूडान (अफ्रीका) ने 54 प्रतिशत और अजरबैजान (यूरेसिया) में 36 प्रतिशत की कटौती की है। आर्एसआईएस से जारी संघर्ष के बाद भी इराक के सैन्य खर्च में भी 36 प्रतिशत की कटौती 2016 में की गयी।

हथियारों पर बढ़ती निर्भरता के बीच कुछ देशों के द्वारा सेना एवं हथियारों के खर्च में की गयी कटौतियां और लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों का संगठन ‘‘लैटिन अमेरिका एण्ड कैरेबियन इकोनॉमिक कम्यूनिटी‘‘ के द्वारा महाद्वीप को एक ‘‘जोन ऑफ पीस‘‘ की गयी 2014 की घोषणा ‘सामूहिक सुरक्षा‘ की नयी सोच है, जो शांति एवं स्थिरता के लिये हथियारों की होड़ के विरूद्ध है। किंतु एसआर्पीआरटी के रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘लातिनी अमेरिकी देशों में कोलम्बिया आौर अर्जेन्टीना ने क्रमशः 8.8 प्रतिशत और 12 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की है।

कोलम्बिया और अर्जेन्टीना अमेरिका समर्थित ऐसे देश हैं, जो महाद्वीपीय सुरक्षा आौर समाजवादी एकजुटता के खिलाफ हैं। सच तो यह है, कि अमेरिका इस क्षेत्र में राजनीतिक अस्थिरता, वैधानिक एवं सैनिक तख्तापलट करता रहा है, आज भी वह यही कर रहा है। वह जनसमर्थक सरकरों के खिलाफ है। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था और हथियारों की होड़ उसकी बाजारवादी सोच है। भले ही उसने क्यूबा से राजनीतिक सम्बंधों की बहाली कर ली है, लेकिन लातिनी अमेरिका और कैरेबियन देशों को अमेरिकी बैकयार्ड समझने की उसकी नीतियां नहीं बदली हैं।

चिली में अलेन्दे की समाजवादी सरकार के तख्तापलट के बाद से शुरू हुआ अभियान आज भी जारी है। शॉवेज के असामयिक निधन के बाद अब ‘‘विकास के जरिये समाजवाद‘‘ की सोच रखने वाला देश वेनेजुएला उसके निशाने पर है। जहां दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी ताकतों ने राष्ट्रीय असेम्बली पर कब्जा कर लिया है, और अब राष्ट्रपति मदुरो की सरकार संकटग्रस्त है। जहां अमेरिकी समर्थक प्रतिक्रियावादी ताकतों के खिलाफ जन एकजुटता बढ़ रही है।

कोलम्बिया के राष्ट्रपति जुआन मैनुअल सेन्टो ने कहा है, कि ‘‘उनकी सरकार वेनेजुएला में मिलिसिया को हथियारबद्ध करने की नीति के प्रति अपनी चिंता राष्ट्रसंघ में रखेगी।‘‘ उनका मानना है, कि ‘‘समाज को हथियारबद्ध करना खतरनाक है।‘‘ कोलम्बिलया में ड्रग माफिया से लड़ने के नाम पर ‘‘7 यूएस मिलिट्री बेस‘ हैं, जो वहां 19 सालों तक रहेगी। जिसका मकसद ‘समाजवादी जन एकजुटता‘ को रोकना भी है।

– आलोकवर्द्धन

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