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हथियारों पर बढ़ती निर्भरता – 4

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कोलम्बिया के राष्ट्रपति का यह कहना कि ‘‘समाज को हथियारबद्ध करना खतरनाक है‘‘, यदि सही है, तो ‘‘सरकारों का हथियारबद्ध होना उससे कहीं बड़ा खतरा है।‘‘ क्योकि सरकारें ही हथियारों का उत्पादन करती हैं, हथियारों का कारोबार करती हैं, हथियारों के होड़ को बढ़ाती हैं, युद्ध और युद्ध की स्थितियां पैदा करती हैं, सेना का निर्माण करती हैं, और सबसे बड़ी बात समाज के स्वाभाविक विकास की दिशा को रोकती हैं।

सरकारें ही अपने देश को बाजार बनाती हैं, और अपने देश की प्राकृतिक सम्पदा, जन एवं बौद्धिक सम्पदा का सौदा करती हैं, उन वित्तीय ताकतों को बढ़ाती हैं, जो सरकारों को बौना बना रही हैं।

अपने देश की सरकार को बनाने के आम जनता के अधिकारों का अपहरण करती हैं।

सवाल हैं, कि ऐसी जनविरोधी और देश विरोधी सरकारों के विरूद्ध आम जनता के हाथों में क्या है? खास कर तब, जब वैधानिक संघर्षो की राह बंद है और सशस्त्र संघर्ष अवैधानिक है।

यदि आप देखें तो युद्ध और हथियारों को आम जनता के पक्ष में खड़ा नहीं किया जा सकता। इसलिये, हम यह कहने की स्थिति में हैं, कि हथियारों पर बढ़ती निर्भरता आम जनता के हितों के विरूद्ध है। साम्राज्यवादी देश और वैश्विक वित्तीय ताकतें अपने हितों के लिये यह खेल खेल रही हैं, उनके लिये यह कारोबार है।

‘स्टॉकहोम इण्टरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट‘ ने फरवरी 2017 में अपने एक अध्ययन को जारी किया था, उसके अनुसार 2012 से 2016 के बीच -5 सालों में- विश्वस्तर पर हथियारों का कारोबार, शीतयुद्ध के बाद, अब तक के सर्वोच्च बिंदू पर है। इन पांच सालों में पिछले पांच सालों -2007 से 2011 तक – की तुलना में 8.4 प्रतिशत बढ़ा है।

अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हथियार उत्पादक और हथियारों का निर्यात करने वाला देश है। क्रमशः रूस, चीन, फ्रांस और जर्मनी विश्व के पांच बड़े हथियार उत्पादक एवं निर्यातक देश हैं। इन पांच देशों के हाथों में भारी हथियारों के कारोबार का 75 प्रतिशत निर्यात है।

संयुक्त राज्य अमेरिका – 33 प्रतिशत

रूस – 23 प्रतिशत

चीन – 6.2 प्रतिशत

फ्रांस – 6 प्रतिशत

जर्मनी – 5.6 प्रतिशत हथियारों का निर्यात करते हैं।

इस अध्ययन के अनुसार -अमेरिका और फ्रांस मध्य-पूर्व के मुख्य हथियार आपूर्तिकर्ता देश हैं, और एशिया मे रूस और चीन दो प्रमुख देश हैं, जो बड़े हथियारों की आपूर्ति करते हैं।

यह वह क्षेत्र है, जहां युद्ध, गृहयुद्ध और राजनीतिक अस्थिरता है, जिसकी वजह से हथियारों की मांग लगातार बनी रहती है।

‘मांग बनी रहे‘ और ‘मांग बढ़ती रहे‘ यही हथियार उत्पादक देशों की नीति है। यही मांग और पूर्ति का सिद्धांत है। यही बाजार व्यवस्था का नियम है। राजनीतिक अर्थशास्त्र की बाजारवादी समझ है। सरकारें हथियारों की खरीदी-बिक्री का सौदा करती हैं। सरकारें युद्ध और युद्ध की आशंकाओं को जन्म देती हैं, और सरकारें ही अपने देश की सुरक्षा की फिक्र करती हैं। सरकारों के पीछे विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, निजी कम्पनियां और कॉरपोरेट होती हैं। इनमें हथियार उत्पादक निजी कम्पनियां भी होती हैं। आतंकवादी संगठन, निजी सेनायें और हथियारबद्ध मिलिसियायी गुट होते हैं, जो हथियारों की मांग को बनाये रखने की जिम्मेदारियां उठाते हैं।

जरा सोच कर देखिये हथियारों की सबसे ज्यादा खपत कहां है?

जहां भी अमेरिका है, यूरोपीय देश हैं, उनके समर्थक यार-दोस्त हैं, वहां आतंकवाद है। युद्ध है। हथियारों की जर्बदश्त मांग है। जहां गहराता हुआ आर्थिक संकट और उभरती हुई अर्थव्यवस्था का बुलबुला है। जहां एक अर्थव्यवस्था दूसरी अर्थव्यवस्था को खा री है।

इराक में जब तक सद्दाम हुसैन थे,

लीबिया में जब तक कर्नल गद्दाफी थे

आतंकवादियों को पांव रखने की जगह नहीं मिली, किंतु जैसे ही इन देशों में अमेरिका और नाटो देशों के सहयोग से आतंकी-प्रतिक्रियावादी ताकतों ने तख्तापलट किया हथियारों की तादाद बढ़ गयी। आतंकवादियों के पास अमेरिकी और यूरोपीय देशों के हथियार हैं। सीरिया में भी ये देश खुलेआम हैं, जहां रूस उनके खिलाफ है। जो चीन के साथ मिल कर मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना कर रहा है।

बाजारवादी वैश्विक वित्त व्यवस्था में आर्थिक सहयोग और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बीच राजनीतिक रिश्ते और सामरिक सम्बंधों की दुनिया है। एक ऐसी दुनिया जो हथियारों पर टिकी हुई है। रूस और चीन तीसरी दुनिया के देशों के लिये आर्थिक सहयोग और सामरिक सुरक्षा के ऐसे विकल्प हैं, जो यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप को वार्ताओं की मेज पर सुलझाना चाहते हैं। लेकिन इससे हथियारों की होड़ घटती नहीं, बल्कि बढ़़ती जा रही है। शीतयुद्ध से बद्त्तर होती स्थितियां हैं क्योंकि सोवियत संघ और समाजवादी खेमा नहीं है। दो खेमों में बंटी दुनिया युद्ध की, महासमर की तैयारी कर रही है।

यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है, कि वैश्विक स्तर पर हथियारों की सबसे ज्यादा खरीदी एशिया और ओसियन क्षेत्र के देशों ने किया है, कुल आयात का 43 प्रतिशत। साल 2007 से 2011 की तुलना में साल 2012 से 2016 के बीच के पांच सालों में मध्य-पूर्व का हथियारों का आयात दो गुणा हो गया है, उसकी 29 प्रतिशत की हिस्सेदारी है।

एशिया और ओसियन ऐसे क्षेत्र हैं, जहां आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक संतुलन को अपने पक्ष में करने की लड़ाईयां चल रही हैं, दक्षिण एवं उत्तरी कोरिया की परेशानियां हैं, चीन सागर का विवाद, भारत पाक और चीन का सीमा विवाद है, एशिया प्रशांत क्षेत्र पर अमेरिकी वर्चस्व की दावेदारी है, चीन के विरूद्ध अमेरिकी घेराबदी है। बढ़ते हुए अमेरिकी हस्तक्षेप का गहराता हुआ संकट है जिसका एक ही मकसद है- चीन के बढ़ते आर्थिक वर्चस्व और रूस के साथ मिल कर उसके सामरिक क्षमता को रोका जा सके। जिसके लिये अमेरिका ने भारत को अपना सहयोगी बना लिया है, जहां कॉरपोरेट की मोदी सरकार है, जिसके लिये उग्र राष्ट्रवाद और आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना है। जिसके राष्ट्रवाद की परिभाषा पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाये बिना बनती ही नहीं।

मोदी सरकार की उग्र राष्ट्रवादी सोच ने भारतीय सेना को राजनीति के दायरे में खींच लिया है। सेना के महत्व और उसकी क्षमता में विस्तार के लिये सीमा पर से आतंकवाद और सीमा की सुरक्षा के लिये तर्क तय कर लिया है। सुरक्षा के क्षेत्र में उसने न सिर्फ निजी पूंजीनिवेश की सीमायें बढ़ा दी है, बल्कि भारत को दुनिया के सबसे बड़ा हथियार आयातक देशों में से एक भी बना दिया है। भारत विश्व हथियारों के कारोबार का 13 प्रतिशत बड़े हथियार खरीदता है। दूसरे नम्बर पर 8 प्रतिशत हथियारों की खरीदी करने वाला देश सउदी अरब है। चीन, संयुक्त अरब अमिरात और अल्जरिया अन्य हथियारों के बड़े खरीददार हैं।

बढ़ते हुए तनाव और बढ़ते हुए युद्ध के खतरों के विरूद्ध अपनी सुरक्षा का तर्क न सिर्फ हथियारों के होड़ को बढ़ा रहा है, बल्कि बाजार के लिये एक बड़े युद्ध को भी विस्फोटक मुहाने तक पहुंचा रहा है। यह सब आम जनता के विरूद्ध आम जनता के पैसों से किया जा रहा है। जिसका सीधा लाभ निजी कम्पनियों और दैत्याकार कॉरपोरेट को मिल रहा है।

– आलोकवर्द्धन

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