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सेंटपीटर्सबर्ग में मोदी का खुला आमंत्रण

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‘सेंटपीटर्सबर्ग इण्टरनेशनल इकोनॉमिक फोरम‘ में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस देश को लूटने का खुला प्रस्ताव रखा। कृषि, उद्योग, सुरक्षा से लेकर सेवा क्षेत्रों में निवेश के लिये विश्व कारोबारियों को आमंत्रित किया। ‘‘भारत एक बड़ा बाजार है। आप आयें। वहां निवेश करें और मुनाफा कमायें।‘‘ उन्होंने निवेशकों के हितों में किये गये अपनी सरकार के कार्यों का उल्लेख किया कि ‘‘सरकार को अभी 1100 दिन भी नहीं हुए हैं, लेकिन मैंने देश के पुराने और बेकार हो चुके 1200 कानूनों को समाप्त कर दिया है।‘‘

मोदी अपने देशभक्त होने का दावा पेश कर रहे थे, या अपनी सरकार के कॉरपोरेट भक्त होने का प्रमाण पेश कर रहे थे? यह वो भी नहीं जानते। उन्हें बस, इतना पता है, कि सरकार बने रहने के लिये निजी कम्पनियों, कॉरपोरेट का समर्थन जरूरी है। पूंजीवादी लोकतंत्र में जनसमर्थन से ज्यादा जरूरी है, कि वित्तीय ताकतों का सहयोग मिलता रहे।

देश की जनता नहीं जानती कि बाजार होने का मतलब क्या है? और जो लोग इस बात को बता सकते हैं, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है। मीडिया पर सरकार की पकड़ जर्बदस्त है। आम जनता की राजनीतिक चेतना को राष्ट्रवाद की जड़ी-बूटी सुंघाई जा रही है, और उसे नहीं पता कि उसके पास आर्थिक अधिकार भी हैं कि सरकारें नहीं, देश की आम जनता अपने देश की सम्पत्ति की अधिकारी है। देश सरकारों की नहीं, आम जनता की है। मगर सरकारें देश का सौदा करती हैं, उसे बेचती हैं, और हमारे लिये यह समझ पैदा करती हैं कि यह वैधानिक है।

‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम‘ हो या ‘सेंट पीटर्सबर्ग इण्टरनेशनल इकोनॉमिक फोरम‘ हो या विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसे वित्तीय संगठन हों, उनमें आम जनता के प्रतिनिधि नहीं होते। आम जनता की हिस्सेदारी नहीं होती। आम जनता के हितों के विरूद्ध सरकारें आमंत्रण देती हैं, समझौते करती हैं और अपने देश अपने देशवासियों को संकट में डालती हैं। आर्थिक दासता वित्तीय तानाशाही को बढ़ावा दे रही है। देशभक्त मोदी की सरकार यही कर रही है। ‘मेक इन इण्डिया‘ का बाघ अब तक मरियल ही है, ‘स्टार्ट अप‘ पुराने मशीन सा घुरघुरा रहा है, अब ‘न्यू इण्डिया‘ गाय और मंदिर छाप राष्ट्रीयता के साथ वित्तीय ताकतों को सलाम कर रही है, कि मालिक आप शर्तें बतायें ‘भारत माता‘ की जय! हम माता को समर्पित कर रहे हैं।

समर्पित सरकार ने ‘‘भारत में राजनीतिक स्थिरता और देश की न्याय व्यवस्था के जरिये वित्तीय ताकतों को उनकी सुरक्षा की गारण्टी दी।‘‘ जिसका एक ही अर्थ निकलता है, कि अब देश की न्याय व्यवस्था के लिये नये लिबासों का बनना तय है। संसद से बाहर हुई आम जनता के हितों को न्यायालयों में भी दूसरा दर्जा मिलेगा। निजी कम्पनियों ने जैसे सरकारों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, जैसे सेण्ट्रल, रिजर्व और फेडरल बैंकों पर उनका कब्जा है, अब न्याय प्रणाली भी उनके हितों को साधने वाली इकाई होगी। मोदी की राजनीतिक स्थिरता लोकतंत्र के लिये स्थायी खतरा है।

देश की आम जनता को इस बात की समझ ही नहीं है, कि सरकार ही यदि देश, देश की सम्पदा और देश के लोगों को खुलेआम बाजार में बेचेंगी तो देश और देश की आम जनता के पास क्या बचेगा?

-आलोकवर्द्धन

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