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सेना नहीं सरकारें तख्ता पलटती हैं

15100-940x670भारत की वित्तव्यवस्था और बाजार पर कब्जा जमाने और उसकी राजनीतिक संरचना को प्रभावित करने की जो कोशिशें हो रही हैं, वह नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवादी उदारीकरण की नीतियों का परिणाम है। केंद्र की यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के सुलगते मुददे और वैशिवक मंदी से बदलते वैशिवक परिदृश्य के दबाव में है। जहां अमेरिका के खिलाफ स्वाभाविक विरोध और यूरोपीय देशों की बिगड़ती सिथतियां हैं। जिसके सुधरने और संभलने की संभावनायें ना के बराबर हैं रूस और चीन की सक्रियता ने अमेरिका और पशिचमी देशों की एकाधिकारवादी नीतियों के सामने रूकावटें खड़ी की है। भारत और कर्इ विकासशील देश इसी रस्साकशी के बीच में है। दोनों ही शक्तियां इन देशों का अपने हितों में उपयोग करना चाहती हैं। इन देशों की विवशता यह है कि विश्व के मौजूदा ढांचे में, ये अपना विकास इन विकसित देशों के बिना नहीं कर सकती है। उन्हें हर हाल में इन देशों का सहयोग चाहिये।

पहले आर्थिक सहयोग पर राजनीति शर्तें लदी रहती थीं, किंतु मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था ने, इसे उलट दिया है, अब आर्थिक सहयोग के लिये राजनीतिक दबाव होता है। अमेरिका और यूरोपीय देशों की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जितने भी मामले सार्वजनिक हुए हैं, हर मामले में राजनीतिक और निजी कम्पनियों के बीच की साझेदारी का खुलासा हुआ है। दोनों के बीच के नाजायज संबंधों ने आज की सिथतियां को जन्म दिया है।

देश की मौजूदा सरकार और राजनीतिक व्यवस्था की, सबसे बड़ी कमी रही है कि वह इन सिथतियों को बदलने या समाप्त करने के स्थान पर, इन्हें सुरक्षित करने और बढ़ावा देने में लगी है। यही करण है कि वह अपने ही हाथों से अपनी व्यवस्था को तोड़ रही है और बाजारवादी ताकतों के सिकंजे में आ गयी। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने पहले उसे दुनिया की उभरती हुर्इ बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रचारित किया, फिर उसके विकास की दिशा को पूरी तरह बाजारवादी बनाया, और फिर राजनीतिक साझेदारी से, निजीकरण की प्रक्रिया के दबाव को बढ़ाया। आज भारत इन्हीं शक्तियों के दबाव में है। देश की आर्थिक एवं राजीतिक विकास की दिशा नवउदारवादी वैश्वीकरण के लिये उदारीकरण के गिरफ्त में है। देश की मौजूदा यूपीए सरकार के लिये अमेरिका, उसकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का महत्व बढ़ गया है, वह आर्थिक सहयोग और राजनीतिक समर्थन की तलबगार हो गयी है। वह उस दलदल में फंसी है, जिसे सिर्फ ‘भ्रष्टाचार’ कहा जा रहा है, जबकि भ्रष्टाचार मौजूदा व्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम है, जहां निजी राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं, जिन्होंने पूंजीवादी वैशिवक व्यवस्था पर अपनी पकड़ बढ़ा ली है, जो अमेरिकी एवं यूरोपीय वित्तव्यवस्था और उसकी राजनीतिक संरचना को संचालित कर रही है।

भारत उस दलदल में है, जिसे दलदल में तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों को फंसा दिया गया है। अब वह अमेरिकी लाबी में है। देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सोच है कि ‘उदारीकरण से ही भारत का विकास संभव है।” और वो यही कर रहे हैं। उन्होंने अमेरिकी विरोध, और यूरोपीय देशों के वित्तीय संकट को स्वाभाविक मान लिया है, और यह भी मान लिया है कि यह दौर गुजर जायेगा। जबकि समझने की जरूरत यह भी है कि इस दौर को गुजारने के लिये वो तीसरी दुनिया के देशों को अपना निवाला बना रहे हैं, और भारत तीसरी दुनिया का विकासशील ऐसा देश है, जिसके साथ आने वाले कल की संभावनायें तो जुड़ी हैं, मगर जिसके विकास की दिशा ही गलत है। निजीकरण और सत्ता का केंद्रीयकरण इस दौर से निकलने की ऐसी नीतियां हैं, जो जनविरोधी ही नहीं, राष्ट्र विरोधी भी हैं। जिसे सिर्फ भ्रष्टाचार के नाम से परिभाषित किया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार सिर्फ भारत या उसके जैसे विकासशील देशों की समस्या नहीं है, बलिक, वह पहली दुनिया के विकसित देश -यूरोप और अमेरिका- दूसरी के पूर्व समाजवादी देश -रूस और अब चीन भी उसी में शामिल है- और तीसरी दुनिया के देशों में भी भ्रष्टाचार है।

भारत में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को बड़ी जगह मिल गयी है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा अपनी जगह बनाने और व्यापार के लिये प्रवेश करने की अनुमति के लिये लाबिंग को भी भ्रष्टाचार माना जा रहा है। जिसे ले कर संसद से सड़क तक चर्चायें हो रही हैं। दुनिया के अधिकांश देशों की आम जनता इसे पूंजीवादी व्यवस्था के परिणामों के रूप में ही देखती है, लेकिन भारत में यह व्यवस्था से अलग एक मुददा है। और इस मुददे से व्यवस्था को नहीं सरकार को घेरने की कोशिशें, हो रही हैं, ताकि व्यवस्था बची रहे। हम कह सकते हैं कि विरोध भी व्यवस्था को बचाने की कोशिश हैं।

9 दिसम्बर को ‘अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरेाधी दिवस’ मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के माहसचिव बान की मून ने सभी देशों की सरकारों और नागरिकों से कहा कि ”भ्रष्टाचार रूपी इस बुरार्इ का देशों की अर्थव्यवस्थाओं और समाज पर विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है।” उन्होंने इसे पर्यावरण के लिये खतरा बताया। उन्होंने जोर दे कर कहा- ”भ्रष्टाचार अपरिहार्य नहीं है।”

उन्होंने यह नहीं बताया कि ”फिर क्या है?”

भारत ही नहीं, दुनिया की कोर्इ भी सरकार यह बताने का साहस नहीं करती कि ”यह क्यों है?”

यदि आर्थिक भ्रष्टाचार दुनिया भर में हैं तो इसकी वजह क्या है?

क्या इसकी वजह यह नहीं होगी कि मौजूदा व्यवस्था ही इस व्यवस्था की वजह है, जहां राजनीतिक असिथरता, सामाजिक असुरक्षा और आर्थिक असमानतायें हैं?

राजनीतिक असिथरता, सामाजिक असुरक्षा और आर्थिक असमानता क्या इस व्यवस्था की देन नहीं है?

क्या कारण है कि आम आदमी से ज्यादा दुनिया की सरकारें, सत्तारूढ़ वर्ग, राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और निजी पूंजी के पक्षधर लोग हैं?

क्या भ्रष्टाचार मौजूदा विश्व व्यवस्था का वर्गचरित्र नहीं बन गया है? फिर आम जनता या दुनिया के नागरिक अपनी सरकारों का साथ कैसे दें?

भारत में भ्रष्टाचार के जितने भी मामले सामने आये हैं -और अब जिनकी गिनती देश का आम नागरिक कर नहीं पाता- और वालमार्ट के द्वारा की गयी लाबिंग का जो किस्सा सामने आया है, उसमें आम जनता नहीं, सरकारें और उस वर्ग की सम्बद्धता है, जिनका राजसत्ता एवं वित्तीय सत्ता पर वर्चस्व है। फिर आम जनता कहां है, और क्या कर सकती है? सरकारों को सहयोग कैसे दिया जा सकता है, जबकि सरकारें ही दोषी हैं। राज्य के नियंत्रण से पूंजी को पूरी तरह बाहर करने की नीति है। ऐसी नीतियां किसने बनार्इ? किसके लिये बनीं? जिस पूंजी की शकित से सरकारों को नियंत्रण में ले लिया गया है, उस पूंजी के नियंत्रण को समाप्त करने की जिम्मेदारी किसकी है? भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये जिसकी सख्त जरूरत है। जब तक निजी पूंजी है, जब तक मौजूदा सरकारें हैं, तब तक तो भ्रष्टाचार को मिटाया नहीं जा सकता, मगर राष्ट्रसंघ महासचिव ”अपने देश की सरकार को सहयोग देने” की बात कह कर, अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार (विरोधी) दिवस मना रहे हैं।

वालमार्ट ने रिटेल एफडीआर्इ के लिये लाबिंग की, जिसमें अमेरिकी सीनेट, प्रतिनिधि सभा, ट्रेड रिप्रजेन्टेटीव, डिपार्टमेण्ट आफ स्टेटस, शामिल था, जिसने भारत की मनमोहन सरकार पर दबाव बनाया। दबाव बनाने में व्हाइट हाउस में विराजमान राष्ट्रपति बराक ओबामा भी पीछे नहीं हैं। भारत में उनकी यात्रा का एक मकसद यह भी था। अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लींटन तो प0बंगाल की सरकार पर दबाव बनाने के लिये मुख्यमंत्री से भी मिलीं। भारत की यात्रा पर अमेरिका और यूरोप के जितने भी राष्ट्राध्यक्ष आये चाहे वो बि्रटेन के डेविड कैमरन हों, फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति सरकोजी हों, या जर्मनी चांसलर एंजेला मार्केल हों, उन्होंने वैश्वीकरण, मुक्त बाजारवाद और भारत में विदेशी पूंजी निवेश की सिथतियां बनाने का काम किया। मनमोहन सिंह अमेरिकी स्कूल के ही अर्थशास्त्री हैं, वो खुद भी इस अभियान के देशी किरदार हैं।

दूसरी दुनिया के रूस और चीन के प्रतिनिधियों की यात्रा का मकसद भी भारत के साथ व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाना और बाजार में अपनी मौजूदगी की मजबूती में इजाफा करना ही है। दूसरी दुनिया के ये देश भले ही पहली दुनिया के देशों के विरूद्ध खड़े हो रहे हैं, मगर राजनीतिक हितों पर आर्थिक हित ही भारी है। यह बात ही भारी है कि सरकारें अपने लिये दुनिया और भारत के बाजार में बड़ी जगह बनाना चाहती है। राजनीतिक संरचना का महत्व घट गया है। अमेरिकी सरकार जनतंत्र की बहाली के नाम से, अपनी राजनीतिक संरचना को भले ही थोपती हुर्इ चल रही है, और दूसरी दुनिया के देशों का ऐसा कोर्इ दबाव नहीं है, मगर राजनीतिक दखल बढ़ाने की अनिवार्यता भी कम नहीं है। रूस और चीन के बीच की नजदीकियों का आर्थिक एवं राजनीतिक महत्व बढ़ गया है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में प्रचलित अमेरिकी डालर के स्थान पर चीनी युआन की समानांतर मुद्रा प्रणाली में रूस प्रभावशाली साझेदार है। कारोबारी रिश्तों को बढ़ाने का सीधा लाभ भी समानांतर मुद्राप्रणाली को मिलेगा। अपने देश की मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देने के लिये भारत चीन और रूस के बीच भी समझौते हैं। ‘बि्रक्स देशों’ ने आपसी मुद्रा में व्यापार बढ़ाने और सदस्य देशों के बीच नयी बैंकिंग सुविधा उपलब्द्ध कराने का निर्णय, नर्इ दिल्ली घोषणा पत्र के द्वारा लिया है। इसके बाद भी, भारतीय व्यापार पर अभी डालर का आधिपत्य है। और भारत की मनमोहन सरकार का झुकाव अमेरिका की ओर है। दिसम्बर में भारत की यात्रा पर आये रूस के राष्ट्रपति ने ढेरों समझौते किये। भारत के 70 प्रतिशत हथियारों की आपूर्ति रूस ही करता है। रूसी काउन्सिल के विदेश एवं रक्षा नीति के अध्यक्ष फ्योदोर लुक्यानोव ने कहा कि ”भारत के साथ हमारे सम्बंधों का दायरा काफी बड़ा है। मगर वह अच्छी तरह से विकास नहीं कर रहा है।”

चीन का दुनिया का सबसे बड़ा निवेशक देश बन जाना, और रूस की सैन्य क्षमता में तेजी से होता विस्तार, अमेरिका के लिये बड़ी चुनौती है। वह भारत को अपने हितों में उपयोग करने की सिथतियां बना चुका है। बाजार में जरिये राजनीतिक वर्चस्व की लड़ार्इयां शुरू हो गयी हैं, मनमोहन सरकार इन्हीं अनिवार्यताओं से संचालित हो रही है। बाजार के लाबिंग को रेाक पाना सरकार के बस के बाहर है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार राष्ट्रहित के विपरीत राजनीतिक पतन और राजनीतिक हस्तक्षेप में बदलता जा रहा है। देश के मौजूदा संसद के द्वारा लिये गये निर्णयों से, उस हस्तक्षेप के नये स्वरूप का अंदाजा लगाया जा सकता है, जो यूरोपीय देश और यूरोपीय संघ के देशों की संसद एवं सरकार की हो गयी है। जहां सेना नहीं, उसके सरताज तख्ता पलटते हैं, और वित्तीय शक्तियां सत्ता पर काबिज हो जाती हैं। आज सरकारें ही अपने देश में निजी कम्पनियों -बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पक्ष में जगह बनाने और उन्हें बढ़ाने का काम कर रही हैं। यही कारण है कि भारत जैसे देशों की स्थिति, एकाधिकारवादी ताकतों के लिये, चरागाह की होती जा रही है।

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