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अवशेषों का खतरा

unnamed-4प्रतिक्रियावादी ताकतें किसी की नहीं होतीं, जिनका वो उपयोग करती हैं, उनकी भी नहीं। सत्तारूढ़ होने के बाद तोड़-फोड़ ही उनके काल की विशेषता होती है। इतिहास से लेकर आने वाले कल को वो ऐसे अवशेषों से भर देती हैं, कि उनकी सफाई में दशक बीत जाते हैं। संघ, भाजपा और केंद्र की मोदी सरकार यही कर रही है।

अर्थव्यवस्था में निजी कम्पनियों के दखल को बढ़ा कर वह वित्तीय अवशेष भर रही हैं।

राजनीति लोकतंत्र के अवशेषों से भर रहा है।

समाज में उन टुकड़ों की भरमार हो रही है, कि वह दाढी और चुटिया, काली टोपी और केसरिया के कबाड़ से उभ-चूभ होने लगे। दोस्ती धोखे में और विश्वास दिखावा में बदल जाये। डर और आशंकायें बढ़ती जा रही हैं। यह यकीन मर रहा है, कि हम अपने देश में सुरक्षित हैं। राष्ट्रवाद और देशभक्ति को तमाचा बनाया जा रहा है, जिसके पीछे तमंचा हैं सेना, संगठन और सरकार है।

संस्कृति खतर में होती है, और इतिहास संकरे गलियारे में।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ही कह सकते हैं, कि ‘‘गांधी चतुर बनिया था।‘‘ और यह प्रमाणित कर सकते हैं, कि आजादी के बाद कांग्रेस को भंग करने का प्रस्ताव ‘चतुर बनिया‘ की चतुरायी थी, जिसे आज भाजपा पूरा कर रही है। ऐसा हो पायेगा या नहीं? वो आज के सबसे चतुर गुजराती बनिया भी नही बता सकते, क्योंकि उनकी चतुरायी वैश्विक वित्तीय ताकतों की जालसाजी से जुड़ी हुई है।

संघ और भाजपा गांधी को हमेशा छोटा बनाने और उनके महत्व को घटा कर आंकने की स्थायी नीति पर चलती रही है। गोडसे हमेशा से उनके आदर्श रहे हैं। भाजपा गांधी जी को गोल चश्मा बना कर ‘स्वच्छ भारत अभियान‘ का प्रतीक बना चुकी है। जबकि गांधी महात्मा और राष्ट्रपिता का दर्जा आजादी के बाद रखते हैं, और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ते हुए उन्होंने अपने को ‘किसान और बुनकर‘ ही माना। उन्होंने देश को बाजार नहीं माना, देश की ब्रांडिंग नहीं की, ना ही उद्योगपतियों को देश को सौंपने की वकालत की। जबकि अपने को देशभक्त कहने वाली सरकार, संघ और भाजपा यही कर रही है। प्रतिक्रियावादी ताकतें आजादी की लड़ाई नहीं लड़तीं, उन्हें छीनने वालों के साथ होती हैं।

गांधी के वर्गगत राजनीतिक समझ पर हम सवाल खड़ा कर सकते हैं, उनके सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों से हम असहमत हो सकते हैं, लेकिन समाज के हर वर्ग का नेतृत्व करने की जो क्षमता गांधी में थी, उसकी अनदेखी हम नहीं कर सकते। इस देश में गांधी जी के विरूद्ध वैचारिक एवं सामाजिक स्वीकृति के साथ भगत सिंह के अलावा किसी में खड़े होने की वकत नहीं है। संघ, भाजपा और मोदी के समानांतर खड़े शाह साहब को समझना ही होगा कि इतिहास किसी को माफ नहीं करता। सल्तनत और सरकारें इतिहास को बदलने में नाकाम रही हैं।

क्या सरकार बनते ही किसी की औकात इतनी बड़ी हो जाती है, कि वह इतिहास को बदल सके?

-आलोकवर्द्धन

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