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मुक्त बाजार के दो राहे पर खड़े मनमोहन सिंह

M_Id_431531_Indo-russia_Talksभारत को देख कर तीसरी दुनिया के उन देशों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है, जो अपने विकास के लिये किसी और की अंगुलियां थामने के लिये विवश होते हैं। वो अपने प्राकृतिक संसाधन, श्रमशक्ति के जनस्त्रोत और अपने बाजार का समूचित उपयोग नहीं कर पाते। उनके प्राकृतिक सम्पदा का उपयोग दूसरी शक्तियां करती हैं। उनके श्रमशक्ति का समूचित उपयोग नहीं हो पाता। उनके बाजार दूसरों के लिये इस तरह खुल जाते हैं, कि बाजार पर उनका नियंत्रण कायम हो जाता है, राज्य की ताकत बाजार से घटती चली जाती है। मनमोहन सिंह का एक दशक भारत का ऐसा ही कार्यकाल है, जिस दौरान बाजारवादी वित्तीय शक्तियों को खुली छूट मिली और उदारीकरण के नाम पर निजीकरण होता चला गया। भारत अमेरिका और यूरोपीय संघ के काफी करीब हो गया।

पिछले महीने के अंतिम सप्ताह में मनमोहन सिंह जी-20 के मास्को सम्मेलन के बाद अमेरिका पहुंच गये। जहां उनका हासिल अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने के लिये, सीरिया पर अमेरिकी हमले के खिलाफ होने की मरहम-पटटी की तरह ही था। बराक ओबामा उन्हें पोर्टिको तक छोड़ने आये। भारतीय मीडिया धन्य हो गयी। यह प्रचार हुआ कि अमेरिका के लिये भारत महत्वपूर्ण देश है। मनमोहन सिंह ने वादा किया कि विदेशी पूंजी निवेश और उदारीकरण की राह में आयी बाधाओं को हटाने का काम वो फौरी तौर पर करेंगे। मगर भारत में न तो मनमोहन सिंह के पक्ष में हवायें चल रही हैं, ना ही विश्व परिदृश्य अमेरिका के पक्ष में है। अमेरिकी ‘शटडाउन’ ही नहीं, आशियान और एपेक्स देशों में चीन का होना भी अमेरिकी समस्या है। चीन यह कहने की स्थिति में आ गया है, कि ”अमेरिका अपनी समस्याओं (घरेलू) का समाधान करे। अमेरिका में चीन के निवेश और अमेरिकी बाण्ड में लगे पूंजी के सुरक्षा की गारण्टी दे। और एशिया में अमेरिकी मध्यस्तता की जरूरत नहीं है।” ओबामा सरकार बड़ी मुशिकल में है। मुसीबत में घिरे मित्र के पास व्यापारिक समझौते और आतंकवाद का ही सहारा है।

अमेरिका जहां है, वहां आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात न हो, यह तो हो नहीं सकता, इसलिये आपसी सहयोग बढ़ाते हुए, भारत और अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ जरूर लड़ेंगे। तो लड़ें। मनमोहन सिंह बराक ओबामा से यह तो पूछने से रहे, कि सीरिया में वो किसकी मदद कर रहे हैं? उन्होंने पूछा नहीं, या बराक ओबामा ने बताया नहीं? पता नहीं। मनमोहन सिंह जी के दिल बराक ओबामा जी से पहले से मिले हैं, दोनों ने हाथ मिलाया और विदा हो गये।

भारतीय मीडिया ने अच्छी जगह दी। हम तो सिर्फ इतना ही कह सकते हैं, कि अमेरिका भारता का स्वाभाविक मित्र नहीं बन सकता। दोनों के हित मेल नहीं खाते। अमेरिका के साथ होना दुनिया के खिलाफ होना है। अपने देश की जनता और विश्व जनमत के खिलाफ होना है।

वैसे मनमोहन सिंह डिवाइडर तोड़ कर अमेरिका के खेमे में खड़े हो गये हैं, जहां उन्हें खास सुरक्षा अब तक नहीं मिली है। अब लगता है, वो डिवार्इडर की मरम्मत कर रहे हैं। इसी महीने उन्होंने रूस और चीन की यात्रा भी की। आशियान देशों के सम्मेलन में सीधा खड़ा होते नजर आये। जहां अमेरिकी विदेश मंत्री जान कैरी राष्ट्रपति बराक ओबामा के न पहुंचने की वजह से पहुंच सके, क्योंकि राष्ट्रपति अमेरिकी शटडाउन की घरेलू समस्या और कर्ज का संकट हल करने और अमेरिका के दिवालिया होने के बीच फंसे थे। जान कैरी दक्षिणी चीन सागर की ओर बहस को मोड़ते रहे। यह जताने में मशगूल रहे कि अमेरिकी वर्चस्व ही एशिया की शांति और स्थिरता का आधार है। जिसमें चीन की स्वीकृति उन्हें कभी नहीं मिलेगी। बहुत सीधी सी बात है, कि चीन एशिया में अमेरिकी मौजूदगी के खिलाफ उतना ही है, जितना अमेरिका उसके प्रभाव क्षेत्र के विस्तार के खिलाफ है।

‘एशिया अमेरिका और यूरोपीय देशों के लिये महत्वपूर्ण बन गया है।’ आज कल यह प्रमाणित करने में ओबामा सरकार लगी है।

एशिया में भारत और चीन का खास महत्व है, यह बताते हुए यह भी बताया जा रहा है, कि दोनों दुनिया की उभरती हुर्इ अर्थव्यवस्था है, जिनके बीच विवाद है।

और यह गलत भी नहीं है। भारतीय मीडिया और कर्इ राजनीतिक दल दोनों देशों के बीच स्थायी अच्छे सम्बंधों की उम्मीद नहीं रखते। उनके लिये चीन अविश्वसनिय पड़ोसी है।

मगर, विश्व परिदृश्य बदल गया है।

एशिया की शांति और स्थिरता के लिये चीन जरूरी है।

pact_copy1एशिया का शक्ति संतुलन बदल गया है, उसके केंद्र में चीन है। जिसके खिलाफ अमेरिकी सरकार सामरिक घेराबंदी, आर्थिक नाकेबंदी और कूटनीतिक चालें चल रही है। संधि और साझेदारी से मुक्त बाजारवाद के जाल को मजबूत किया जा रहा है।

एशिया में अमेरिकी वर्चस्व के लिये चीन का घिरना और चीन का ढ़हना अमेरिकी सरकार के लिये जरूरी है।

अमेरिकी सरकार की मुशिकल यह है कि चीन वास्तव में मजबूत है, और रूस से उसके सम्बंध भी मजबूत हैं। जिसकी वजह से मध्य-पूर्व एशिया में उसे कूटनीतिक पराजय का सामना करना पड़ा और दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन सबसे बड़ी चुनौती है।

भारत को यह समझने की जरूरत है कि इसी नजरिये से वह अमेरिका के लिये जरूरी है, उसे ऐसे भारत की जरूरत है, जो उसकी चुनौतियों के खिलाफ उसका सामरिक एवं वित्तीय ठिकाना बन सके।

इस नजरिये से भारत की स्थिति महत्वपूर्ण तो है, मगर खास अच्छी नहीं है। उसके सामने अपने लिये सही दिशा तय करने की जिम्मेदारी है, जिसका प्रभाव दूरगामी भी होगा।

मनमोहन सिंह और भारत का मौजूदा नेतृत्व इस नजरिये से अपने को देखती है या नहीं? कहना मुशिकल है। हां, मीडिया और प्रचारतंत्र इस नजरिये से देख नहीं पा रही है, यह तय है। उसके लिये रूस और चीन अमेरिका से कमतर हैं। इसलिये वो भारत की अनिवार्यता और वरियता भी तय नहीं कर पा रहे हैं। वो भारत और एशिया की शांति एवं स्थिरता के लिये अपनी भूमिका भी तय नहीं कर पा रहे हैं। भारत और चीन के वित्तीय, सामरिक और कूटनीतिक महत्व को एक ही धरातल पर खड़ा करके आंका नहीं जा सकता। यह समझने की सख्त जरूरत है कि दुनिया में मुक्त बाजारवाद के दो ध्रुवों की रचना हो चुकी है, जिसके एक ध्रुव के केंद्र में अमेरिकी साम्राज्यवाद और यूरोपीय संघ है, और दूसरे ध्रुव के केंद्र में रूस और चीन हैं। अमेरिका और यूरोपीय संघ संकटग्रस्त हैं, कर्ज और दिवालिया होने का खतरा पांव के नीचे और सिर पर मंडरा रहा है, जबकि रूस और चीन की स्थिति ऐसी नहीं है। सीरिया और र्इरान के मसले को यदि हम लें, तो वो युद्ध विरोधी है। चीन अपने पड़ोसी देशों से अपने विवादों को वार्ताओं की मेज पर हल करने में लगा है। 2013 में 1962 को जीने की कोर्इ वजह नहीं है। जिस देश से 4000 किलोमीटर लम्बी सीमायें जुड़ी हैं, और जिसके विकास को एक-दूसरे के विरूद्ध खड़ा करने की साजिशें रची जाती रही हैं, यदि वहां आर्थिक विकास के जरिये राजनीतिक समस्याओं का समाधान है, तो उसकी पहल होनी चाहिये, उसे सही मुकाम तक पहुंचाना ही चाहिये। न भारत 1962 का भारत है, ना ही चीन, यह मानने में कोर्इ हर्ज नहीं है।

भारत दो ध्रुवों के बीच खड़े एशियायी देशों में सबसे महत्वपूर्ण है।

हम यह मानते हैं, कि एशिया और एशिया प्रशांत क्षेत्र की शांति और स्थिरता के लिये भारत का रूस और चीन के साथ खड़ा होना जरूरी है। यूरोपीय और अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ बड़ी लड़ार्इ एशिया में ही लड़ी जानी है।

संभवत: मास्को जी-20 सम्मेलन में सीरिया के मसले ने मनमोहन सिंह को नयी समझ दी है, जहां वो सीरिया पर अमेरिकी हमले के विरूद्ध खड़े नजर आये और संभवत: किसी अंतर्राष्ट्रीय मंत्र पर उन्होंने अमेरिकी नीति का विरोध किया। अमेरिका की यात्रा के साथ रूस और चीन की यात्रा को राजनीतिक संतुलन के लिये उन्होंने जरूरी माना। और यह यात्रा कुछ इस तरह से की गयी, जैसे क्यूबा से वेनेजुएला की यात्रा की गयी हो। या फ्रैंकफर्ट से वाशिंगटन की यात्रा उन्होंने पिछले महीने की थी।

आज चीन से यदि भारत के रिश्ते वास्तव में मजबूत हो जाते हैं, तो भारत के लिये पाकिस्तान में बढ़ता खतरा स्वाभाविक रूप से घटता चला जायेगा। इस्लामी आतंकवाद के पीछे पाकिस्तान की सरकार से ज्यादा अमेरिकी सरकार है, जिसके लिये आतंकवादी एवं आतंकी संगठन काम कर रहे हैं। एशिया और अफ्रीका में सक्रिय आतंकी संगठन यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद के सहयोग से ही चलते हैं। लीबिया और सीरिया इसके उदाहरण हैं। इसलिये मास्को यदि आतंकवाद के विरूद्ध भारत के साथ है, तो वह अमेरिकी धोखा से कहीं ज्यादा कारगर है। अमेरिकी सरकार भारत के खिलाफ अघोषित रूप से पाकिस्तान के जरिये आतंकी गतिविधियों में शामिल रही है।

manmohan-singh-obamaभारत और चीन के बीच रूस की मौजूदगी का विशेष महत्व है। अमेरिकी घेराबंदी की जो समझ आज चीन में है और एक नये ध्रुवीकरण अनिवार्यता पूरी की जा रही है, उसकी निर्णायक वजह रूस है। जिससे भारत के रिश्ते दशकों पुराने और परखे हुए हैं। मनमोहन सिंह की अमेरिकी नजदीकी के धूल भी अब मनमोहन सिंह ही साफ कर रहे हैं। सीरिया के संकट का जो राजनीतिक समाधान नजर आ रहा है, उसमें रूस के राष्ट्रपति पुतिन की भूमिका सबसे बड़ी है। रूस विश्व स्तर पर युद्ध विरोधी देश के रूप में उभरा है, जिसकी वित्त व्यवस्था अमेरिकी वित्त व्यवस्था से कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ है, भले ही उसकी दिशा बाजारवादी है, मगर पूर्व समाजवादी देशों से उसके अच्छे सम्बंध हैं, और अमेरिकी वित्त व्यवस्था से थोड़ा हट कर भी। एक ही समय भारत, रूस और मंगोलिया के प्रधानमंत्री का चीन की यात्रा चौंकाने वाला है। तीनों देशों के प्रधानमंत्री संयुक्त वार्ता न होने के बाद भी विश्लेषक इसे महत्वपूर्ण घटना मान रहे हैं। यह चीन की क्षमता और आपसी सहयोग बढ़ाने की नीति के प्रति प्रतिबद्धता भी माना जा रहा है। यह भी माना जा रहा है कि चीन महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल कर चुका है।

21 अक्टूबर को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच क्रेमलिन में डेढ़ घण्टे से लम्बी वार्ता के बाद संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया। इस बात की घोषणा की गयी कि दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग के कर्इ क्षेत्र हैं। रक्षा, ऊर्जा, उच्च तकनीकि उधोग, अंतरिक्ष, विज्ञान, शिक्षा, संस्कृति, पर्यटन और निवेश की बातें की गयीं। पांच महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये। आतंकवाद के खिलाफ आपसी सहयोग बढ़ाने की बात की गयी। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भारत के साथ परमाणु क्षेत्र में सहयोग की प्रतिबद्धता जताते हुए कुडनकुलम बिजली परियोजना की दो उच्च इकार्इयों के लिये जवाबदेही के सवाल को हल करने के निर्देश दिये। उन्होंने दोनों देशों के सहयोग से पांचवे जनरेशन के युद्धक विमान एवं मल्टीरोल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट निर्माण एवं विकास का जिक्र किया। रूस के तेल एवं प्राकृतिक गैस के प्रति भारत ने अपनी उत्सुकता जाहीर की। रूस के राष्ट्रपति ने दोनों देशों के अंतर्राष्ट्रीय नजरिये का जिक्र करते हुए भारत का उल्लेख किया। अफगानिस्तान, र्इरान और सीरिया के मुददे का राजनीतिक समाधान निकालने के लिये रूस की नीतियों का समर्थन भारत के द्वारा किया गया।

मनमोहन सिंह के रूस की दो दिवसीय यात्रा का महत्व इस बात पर निर्भर करता है, कि द्विपक्षीय सम्बंधों के विकास की दिशा क्या रहती है? मनमोहन सिंह अब तक एशिया में अमेरिकी हितों का समर्थन करते रहे हैं। उन्होंने भारत के पड़ोसी देशों और अमेरिकी हितों का समर्थन करते रहे हैं। उन्होंने भारत के पड़ोसी देशों और अमेरिकी याराना से पहले के मित्र देशों के साथ उदासीनता की नीति को ही वरियता दी है। अब अंतिम पड़ाव पर वो वापस हो रहे हैं। वो एशिया में बढ़ते तनाव और संघर्षों के बीच भारत को निर्पेक्ष बनाने में लगे हैं। यह भारत के हित में तो है, मगर अमेरिका के हित में कितना है? अभी तय होना बाकी है।

भारत के लिये चीन ने रेड़ कारपेट बिछा दिया है। मनमोहन सिंह मीडिया और कर्इ प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दलों की आशंकाओं की अनदेखी कर दोस्ताना ढंग से आगे भी बढ़े हैं। दोनों देशों के बीच आज जितनी सहमति नजर आ रही है, 1962 में बाद, कभी नहीं रही। जो कि वास्तव में अच्छी बात है। यह भारत की सुरक्षा और विकास के लिये ही नहीं, एशिया की शांति और स्थिरता के लिये जरूरी है। जिसकी शुरूआत चीन के नये प्रधानमंत्री लि कियांग ने भारत यात्रा से की। और इसी दौरान चीन के राष्ट्रपति शि जिन पिंग ने रूस की भी यात्रा की थी। 23 अक्टूबर को दोनों देशों के बीच सीमा रक्षा सहित नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये। दोनों देशों के वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाये रखने तथा सीमा विवाद को हल करने की अनिवार्यता आज भी दोनों देशों के बीच है। इसके बाद भी माना यही जा रहा है कि एशिया प्रशांत क्षेत्र की शांति एवं स्थिरता के लिये चीन भारत के साथ मजबूत राजनीतिक एवं आर्थिक रिश्तों की पहल कर चुका है। मुक्त बाजार के दो राहे पर खड़े भारत को अपनी राह चुननी है।

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