Home / सोच की जमीन / वाम दलों की पीठ

वाम दलों की पीठ

dc-Cover-kaqcbb7btb7gb8c7i0o237nnl2-20160909152738.Medi

देश में प्रतिक्रियावादी ताकतों ने निर्णायक बढ़त बना ली है।

केंद्र में मोदी की कॉरपोरेट सरकार है, और राज्यों में भी भाजपा की सरकारें बनती जा रही हैं।

राजनीतिक रूप से भाजपा ऐसी स्थितियां बना रही है, कि आने वाले कल में उसके सामने दलगत चुनौतियां ही न हों। वह देश में एक मात्र राजनीतिक दल बनने की राह पर है।

आर्थिक रूप से निजी कम्पनियां देश की निर्णायक बन गयी हैं। अर्थव्यवस्था के निजीकरण की रफ्तार बढ़ती जा रही है। सरकारें सिर्फ इस लिये बच गयी हैं, कि वो निजी कम्पनियां के हितों को वैधानिक बनायें और देश की आम जनता के पैसे से, इन्हीं ताकतों के लिये, आधार भूत ढांचे का निर्माण करें। आर्थिक विकास और आर्थिक महाशक्ति बनने का छलावा चलता रहे। आम जनता धोखे में है, धोखे में रहे।

सामाजिक रूप से वर्गगत चेतना को बढ़ने से रोकने के लिये धर्म एवं जातिगत चेतना को बढ़ाया जा रहा है। यहां भी प्रतिक्रियावादी ताकतों ने वित्तीय ताकतों के साथ मिल कर बढ़त हासिल कर ली है।

पूंजीवादी लोकतंत्र भी खतरे में है।

हालांकि, आम जनता के लिये यह सवाल ही नहीं है, क्योंकि देश की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी को पूंजीवादी लोकतंत्र का लाभ कभी नहीं मिला। लेकिन प्रतिक्रियावादी फॉसिस्ट सरकारें उन अधिकारों को भी छीन लेती है। जिसका नकारात्मक प्रभाव देश की आम जनता पर पड़ता है। भूमि अधिग्रहण से लेकर श्रम कानूनों में हुए परिवर्तन और अब कृषि से लेकर औद्योगिक क्षेत्रों में निजी वित्तीय पूंजी को दी जा रही निवेश की सुविधा देश और आम जनता के हित में नहीं है।

हम यह मानते हैं, कि प्रतिक्रियावादी ताकतें आम जनता के हितों में काम करने वाली सरकारों का निर्माण नहीं कर सकतीं, चाहे वो आम जनता के पक्ष में जितनी भी बातें करें, विकास की जितनी भी योजनायें बनायें। किंतु हम उन ताकतों के बारे में क्या कहें जिन्हें जन विरोधी सरकारों के राह को रोकना था, और जन समर्थक सरकारों का निर्माण करना था। जो ऐसे लड़े कि बिना लड़े ही सब कुछ हार गये।

कम से कम राष्ट्रीय कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल के सामने यह उपलब्धियां तो हैं, कि उसने पूंजीवादी लोकतंत्र का निर्माण आजादी के बाद किया और घोर दक्षिणपंथी ताकतों को 6 दशक तक राजसत्ता से दूर रखा। वो हमारी जन अपेक्षाओं पर खरे उतरे, न उतरें किंतु उन्होंन लोकतंत्र को बचा कर रखा, किंतु हम उन तकतों के खड़ा न होने के तर्क पर कैसे यकीन करें, जिन्हें जनसमर्थक सरकारों के लिये जनसंघर्षों की शुरूआत करनी थी, और उन्होंने ऐसा नहीं किया।

तमाम तर्क के बाद, यदि आप मुझसे यह सवाल करें कि, ‘‘क्या भाजपा के आने की स्थितियां वामपंथियों ने तैयार की?‘‘

तो मेरा जवाब होगा- ‘‘हां!‘‘ यदि आपका मतलब कम्युनिस्ट नामधारी राजनीतिक दलों से है। जिन्होंने अपने ऐतिहासिक दायित्वों का निर्वाह नहीं किया। उन्होंने किसी न किसी ओट से अपनी बात कहने की भूल की। यह कहना उनके काम को नकारना नहीं है, कि भारत के बारे में उनकी सोच माक्सर्सवाद की मोटी-मोटी लकीरों में उलझ गयीं। उन्होंने सर्वहारा के साथ न तो अर्धसर्वहारा को जोड़ा ना ही उपनिवेशवाद से मुक्ति के बाद सामंती सोच और पूंजीवादी गठजोड़ को समझने की समझदारी दिखायी। यह आंकलन ही नहीं हुआ कि वर्ण विभाजित समाज को वर्ग विभाजित समाज में कैसे बदला जाये? वैचारिक विश्लेषण को समाज के कसौटी पर कसा ही नहीं गया।

‘अधूरी आजादी‘ और ‘संयुक्त मोर्चे‘ की बातें तो चलती रहीं, किंतु पूंजीवादी लोकतंत्र में मिली सुविधाओं का उपयोग सर्वहारा क्रांति के लिये नहीं किया गया। ‘मतपत्रों से क्रांति‘ की बातें तो होती रहीं, किंतु ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की जो अवधारणां लातिनी अमेरिकी देशों में विकसित हुई, तमाम कारकों के बाद भी, भारत में यह सोच, समझ या अवधारणां के रूप में विकसित नहीं हुई। लोकतांत्रिक ताकतों का संयुक्त मोर्चा भी तैयार नहीं हुआ।

‘‘क्रांति दरवाजे पर कब दस्तक दी, और कहां चली गयी?‘‘ का जवाब किसी के पास नहीं है। उस नेतृत्व के पास तो हर्गिज नही, जिनके आव्हान पर लाखों साथियों ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया।

ऐसे साथियों के लिये- जो आज भी हैं- हमारा सम्मान कभी कम नहीं हुआ, किंतु नेतृत्व के सामने यह सवाल है, जो आज भी गल्तियां कर रही हैं। जिनकी पीठ जनसमस्याओं के समाधान के लिये संघर्ष के लिये दिखती है। मजदूरों के हितों पर हमले हो रहे हैं, किसान सड़कों पर, बुद्धिजीवियों की जुबान बंद की जा रही है, भूख, गरीबी और बेरोजगारी की समस्याओं का समाधान नहीं, सामाजिक असहिष्णुता रोज बढ़ रही है, अर्थव्यवस्था का निजीकरण हो रहा है, देश की प्राकृतिक एवं जन एवं बौद्धिक सम्पदा की बिक्री खुले बाजार में हो रही है, भाजपा की मोदी सरकार एकाधिकार की राजनीतिक लड़ाई शुरू कर चुकी है, हथियारों की खरीदी, और उग्र राष्ट्रवाद को युद्ध की तैयारियों से जोड़ा जा रहा है, मगर वामदलों की पीठ का दिखना बंद नहीं हो रहा है।

कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष की एकजुटता और साझा राष्ट्रपति उम्मीदवार से आप बाजारवादी फॉसिस्ट ताकतों को रोक नहीं पायेंगे। अपनी वरियता और नीतियां बदलिये। राजपथ पर घूमने और संसद भवन में बैठने से कुछ नहीं होगा। जनवादी तरीके से लड़ाई सड़कों पर ही लड़ी जायेगी। मैं हथियार उठाने की बात नहीं कर रहा हूं, मेरी पेशकश आम जनता से जुड़ने और जन समस्याओं के समाधान के लिये निर्णायक संघर्षों की है। जनमोर्चा ही एकमात्र विकल्प है।

-आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top