Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / सरकारें वह नहीं जो दिखती हैं – 1

सरकारें वह नहीं जो दिखती हैं – 1

?????????????????????????????

आज किसी भी आंदोलन के पक्ष में या विपक्ष में खड़ा होना, आम आदमी की मुश्किलें हैं, क्योंकि जो दिख रहा है, या जो दिखाया जा रहा है, वह सही है या गलत? यह तय नहीं हो पाता। अजीब सी स्थिति है, सरकारें आम जनता की नहीं, और आंदोलनों का भी अपहरण हो जाता है। देश में ऐसी मीड़िया नहीं है, जो सच सामने रख सके। ज्यादातर मीड़िया सरकार के नजरिये का ही प्रचार करती रहती है।

आतंकी और आतंकवाद की शिनाख्त नहीं होती।

देशभक्त और देशद्रोही की परिभाषा बदल गयी है।

हर शिनाख्त, हर परिभाषा के पीछे उन वैश्विक वित्तीय ताकतों का हित होता है, जो दुनिया की सरकारों को अपने इशारे पर नचा रही है, और दुनिया के बाजार में आर्थिक अनिश्चयता की हलचलें पैदा करती रहती है। हर किस्म के आतंकवाद और देशभक्ति-देशद्रोह के पीछे जनविरोधी सरकारें हैं। जो अपने को अलग-अलग देश, अलग-अलग बाजार में लोकतंत्र समर्थक, देशभक्त और वैश्वीकरण की पक्षधर प्रमाणित करती रहती है।

भारत की मोदी सरकार देशभक्त है, और लगे हाथ बाजारवादी भी है। वह राष्ट्रवादी है, और दुनिया के बाजार में अपने को बेचने वाले देशों में शामिल भी है। और इस मामले में वह सबसे आगे निकलना चाहती है। प्रचार करती है- देश आगे बढ़ रहा है, समृद्धि बढ़ी है। हालात आईना दिखाता है, कि आदमी बेहाल है, किसान सड़कों पर हैं, आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों के आंदोलन का अपहरण शुरू हो गया है।

मोदी किसानों के कर्ज माफी के सपने बांटते हैं, राज्यों में सरकारें बनाते हैं, और कर्जमाफी के वित्तीय बोझ में राज्यों की सरकारों के सहयोगी होने से मुकर जाते हैं। यह मुकरने का काम खुद मोदी करें या जेटली, कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार यदि थैली है, तो सभी एक ही थैली के सिक्के हैं। हर सिक्के पर गांधी है और गांधी का अपहरण तो इस देश में कोई भी कर लेता है। दुनिया में जितने सिक्के और नोट हैं, उनके पीछे की ताकत एक है।

मुद्रा की मूरत वह नहीं है, जो दिखती है, बल्कि वह है, जिसे छुपा कर रखा गया है। जॉर्ज वाशिंगटन (डॉलर) पर कब्जा जमाने के लिये कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों की जाने ली गयी हैं, महात्मा गांधी (रूपया) तो मोदी जी को उपहार में मिल गये हैं, जान का जोखिम नहीं। फेडरल बैंक हो या रिजर्व बैंक आम जनता के लिये राष्ट्रीय मुद्रा होने का धोखा है। मुद्रा के बिना लेन-देन, उससे भी बड़ा धोखा है। सबसे बड़ा धोखा तो यह हे, कि चुनी हुई सरकारें ही आम जनता को धोखा देती हैं -यह कहते हुए कि ‘अपके पास रोजगार होगा। काम होगा। आय बढ़ेगी। हालत सुधरेगी।‘

किसी की हालत नहीं सुधर रही है।

सरकार अपने लिये राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय ताकतों के लिये वित्तीय तानाशाही की परिस्थितियां बना रही हैं।

राष्ट्रवाद को उग्र बनाने, और उग्र राष्ट्रवाद के धोखे को बढ़ाने के लिये कश्मीर वह जरिया बन गया है, जहां सीमा पार के आतंकवाद का जिक्र जोरों पर है। हर आंदोलनकारी आतंकवादी के श्रेणी में आ गया है, और सेना ही राष्ट्रीय और मुक्तिदाता है, की हवा बह रही है। कश्मीर की वास्तविक समस्याओं का दम घुटता जा रहा है और आतंकी वारदातों की वजह से थमा हुआ आर्थिक विकास(?) है, जनजीवन अस्त-व्यस्त है। नाराजगी चरम पर है, और नाराज होना जुर्म है। समझना मुश्किल है, कि नब्बे की दशक से बद्त्तर हुई स्थितियों को सरकार संभालने में लगी है, या बिगाड़ रही है? वार्ताओं की सरकारी पेशकश तो है, मगर जनसंवाद और सरकार पर विश्वास ही नहीं है। कश्मीर अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है।

यह अविश्वास अब पश्चिम बंगाल के पर्वतीय क्षेत्र दार्जलिंग में ‘गोरखा लैण्ड‘ की मांग में भी नजर आ रहा है। सीमांत प्रदेशों की हालत खास अच्छी नहीं है। लेकिन सकरार कहती है- ‘‘सब ठीक है।‘‘ किसके लिये ठीक है? क्या देश की सरकार के लिये ठीक है? उसे बनाने वाली निजी कम्पनियों के लिये ठीक है? कश्मीर का मसला किसके लिये ठीक है? यदि आप समझते हैं, कि यह पाकिस्तान, आतंकी या कश्मीर की आवाम के लिये ठीक है, तो मैं समझता हूं, आप गलत है। यह उन्हीं औपनिवेशिक एवं साम्राज्यवादी ताकतों के लिये ठीक है, जो आज वैश्विक वित्तीय ताकतों के लिये काम कर रही हैं। बात आगे होगी।

(जारी)

-आलोकवर्द्धन

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top