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सरकारें वह नहीं जो दिखती हैं – 2

हम कश्मीर की बात करें।

उस खूबसूरत घाटी की बातें करें, जिसके जन्नत होने का यकीन टूट गया है। मानी हुई बात है, कि दो मुल्क की सियासत का खामियाजा कश्मीर भुगत रहा है। इतिहास की जानकारी है, जहां ब्रिटिश उपनिवेशवाद और अमेरिकी साम्राज्यवाद भी है। वारदातों की खबरें रोज आ रही हैं। खबरों में पाकिस्तान और आतंकवादियों की मौजूदगी भी है। सवाल भी है, कि ब्रिटिश उपनिवेश की चालबाजी को, देश के बंटवारा और बंटवारे की लकीरों में छुपे विवादों का जिक्र क्यों नहीं होता? पाकिस्तान को हथियारों से लैस करने वाले, और आतंकियों का पनाहगाह बनाने वाले अमरिकी साम्राज्य की बातें क्यों नहीं होतीं? पाक की सेना अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के सहयोग और देखरेख में जिन आतंकी संगठनों को पैदा किया, उनका जिक्र क्यों नहीं होता?

यह खुली सच्चाई है, कि भारत के विरूद्ध पाकिस्तान को खड़ा करने की नीति अमेरिका की रही है, उसने ही पाक-अफगान सीमा पर आतंकी प्रशिक्षण शिविर लगाये, आतंकियों को हथियारों से लैस किया, उनका निर्यात भातर अफगानिस्तान से लेकर लीबिया और सीरिया में किया। उसने ही इस्लामी आतंकवाद को अंतर्राष्ट्रीय बनाया। आज भी अमेरिकी सेना की अगुवाई आतंकवादी ही कर रहे हैं। मगर भारत की मोदी सरकार अमेरिका को साधने में लगी है। मोदी की विदेश यात्राओं की रिपोर्टिंग व्हाईट हाउस में होती है। रूस की यात्रा और शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य बनने के बाद अमेरिका ही जा रहे हैं। उन्होंने भारत को ऐसा बाजार बना दिया है, जो है अमेरिकी खेमे में मगर उसकी परछाई रूस और चीन पर पड़ती है।

सरकार के लिये पाकिस्तान और भारतीय मीड़िया के लिये पाकिस्तान के साथ चीन भी अब निशाने पर है। इस तर्क के साथ कि पाकिस्तान को दिया गया आर्थिक सहयोग भारत के खिलाफ है। क्या पाकिस्तान के आर्थिक विकास को हम भारत के विरूद्ध कह सकते हैं? यदि ‘हां‘, तो भारत का आर्थिक विकास भी पाकिस्तान के विरूद्ध होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। सच तो यह है, कि ‘भारत विरोध‘ पाकिस्तान की स्थायी नीति है, भारत की वर्तमान सरकार ‘पाकिस्तान विरोध‘ को उसी मुकाम पर खड़ करती जा रही है।

पाक अधिकृत कश्मीर हमारे लिये जितन बड़ा मुद्दा है, मौजूदा कश्मीर भी हमारे लिये उतना ही बड़ा मुद्दा बन गया है। यह कड़वी सच्चाई है, कि कश्मीर की आवाम के साथ सरकारों ने मनमानी की है। ‘जनमत संग्रह‘ के करार का उल्लंघन हुआ है। यदि पाक अधिकृत कश्मीर अशांत है, तो भारतीय संघ में विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त कश्मीर भी अशांत है। केंद्र और राज्य की मौजूदा सरकारें यदि इसके लिये पाकिस्तान और सीमा पार के आतंकवादियों को इसके लिये दोषी मानते हैं, तो यह सवाल भी पैदा होता हे, कि भारत की मोदी सरकार और राज्य की महबूबा सरकार और सेना क्या कर रही है? यह सवाल भी है, कि कश्मीर की आवाम के दिल आतंकवादियों के लिये इतने संवेदनशील क्यों हैं? क्यों वह भारतीय सेना के जवानों पर पत्थर फेंक रही है, और हमलावर आतंकवादियों के लिये मानव ढ़ाल का निर्माण कर रही है? आतंकवादियों के जनाजे में इतनी भीड़ क्यों है? कश्मीर और उसकी आवाम के लिये हमारे पास क्या है?

स्थितियां इतनी विस्फोटक क्यों हुईं?

यदि बंदूक और फौज और सरकारें समस्या का समाधान नहीं हैं, तो समाधान क्या है?

भारत की मोदी सरकार कश्मीर को सुलगता हुआ क्यों देखना चाहती है? या स्थितियों को वह संभाल नहीं पा रही है? जबकि कश्मीर में भाजपा समर्थित सरकार है, सेना को पूरी छूट मिली हुई है, और सरकार वार्ताओं की पेशकश कर चुकी है। कांग्रेस भी समस्या के समाधान के लिये सहयोग का प्रस्ताव रख चुकी है। जिसका कोई भी सकारात्मक जवाब सरकार नहीं दी है। मीडिया ‘मोदी का जादू चल गया‘ जैसे शीर्षक बना कर बैठी है। उसके दिमाग पर इतने ताले जड़े हैं, कि वह सोचती ही नहीं कि जिस सरकार को उसने अपना कंधा सौंप रखा है, वह सरकार सैनिक साज-ओ-सामान खरीदने, सेना को बढ़ाने और आम जनता के दिल-ओ-दिमाग में राष्ट्रवाद के जरिये युद्ध के उन्माद को भर रही है। जन समस्याओं का समाधान नारों के हवाले है, और देश उन बाजारवादी ताकतों को सौंपने में लगी है, जिनकी पकड़ में सरकार है।

सरकार कश्मीर की समस्या को पाकिस्तान से विवाद और आतंकवाद से जोड़ कर, सेना के महत्व को बढ़ा रही है, युद्ध की अनिवार्यता एवं तैयारी तय कर रही है, लगे हाथ उस राष्ट्रवाद को बढ़ा रही है, जिसमें दूसरे राष्ट्रीयता के लिये जगह नहीं है। जिसके मूल में देश को बाजार बनाने की नीतियां हैं। अर्थव्यवस्था के निजीकरण की रफ्तार इतनी तेज है, कि आने वाले कल में ही पता चलेगा कि देश और देश की आम जनता कहां है?

(जारी)

-आलोकवर्द्धन

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