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सरकारें वह नहीं जो दिखती हैं – 3

आईये, गोरखालैण्ड की बातें करें।

अलग झारखण्ड राज्य के मांग की तरह ही अलग ‘गोरखा राज्य‘ की मांग सौ साल से पुरानी हैं आज झारखण्ड तो अलग राज्य है, किंतु 1907 में ‘मार्ले-मिंटो सुधार‘ के लिये ब्रिटिश आयोग के सामने दार्जिलिंग को अलग प्रशासनिक ढांचा की मांग को, अलग राज्य का दर्जा हासिल नहीं हुआ, जबकि आजादी के बाद 1949 में यह मांग उठी और 1985-1988 के दौरान अलग ‘गोरखालैण्ड‘ के लिये हिंसक संघर्ष हुआ और लगभग डेढ हजार लोग मारे गये। सुभाष धीसिंग ‘गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट‘ के तहत गोरखालैण्ड के लिये लम्बी लड़ाई लड़ी। आज ‘गोरखा जनमुक्ति मोर्चा‘ के विमल गुरूंग ने नये सिरे से इस लडाई की शुरूआत की है, जिसमें इस क्षेत्र के 6 अन्य राजनीतिक दलों का समर्थन एवं सहयोग हासिल है।

‘जेएनएलएफ‘- जो ममता बनर्जी के ‘तृणमूल कांग्रेस‘ की सहयोगी पार्टी थी, उसने भी तृणमूल से नाता तोड़ लिया है। 8 जून से शुरू हुए आंदोलन को ममता बनर्जी ने ‘गहरी साजिश‘ करार दिया है। उन्होंने कहा- ‘‘गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के सम्बंध पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों से हैं।‘‘ उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार से सहयोग की मांग की है।

वर्तमान आंदोलन की नींव ‘बांग्ला भाषा‘ को अनिवार्य बनाने के सरकारी फरमान से पड़ी। आंदोलनकारियों का स्पष्ट आरोप है, कि ‘‘राज्य सरकार नेपाली भाषी लोगों पर बांग्ला भाषा को थोप रही है।‘‘

ममता बनर्जी वाम मोर्चा के तीन दशक से भी लम्बे कार्यकाल की नीतियों से अलग हो कर ‘आमार बांग्ला, सोनार बांग्ला‘ जैसे क्षेत्रीय भावनाओं से बनी अपनी लोकप्रियता पर यकीन करके चल रही है। उनकी अंकड़ जब तक उदार बने गोरखा लैण्ड की मांग उससे पहले ही उग्र हो गयी। ममता बनर्जी इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक की बात कर रही हैं, मगर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की राज्य एवं केंद्र सरकार सहित त्रिपक्षीय वार्ता की पेशकश को खारिज कर चुकी है।

क्या ‘गोरखा लैण्ड‘ के आंदोलन में उग्रवादी संगठनों सहित वो ताकतें भी शामिल हैं, जो पश्चिम बंगाल की ममता सरकार को चुनावी मात देना चाहती है? जिनमें भाजपा भी शामिल है। जिसके हौसले बुलंद हैं, कि देश की आम जनता उसकी सुन रही है, उसकी ओर देख रही है, बहकावे में आ रही है। कांग्रेस तो इस बारे में सोच नहीं सकती। वाम मोर्चा सोच सकती है, मगर वह उस तीसरे मोर्चे के बारे में सोचती है, जिसके बारे में सोचना तराजू में जिंदा मेढ़क को तौलना है। आज कल उसकी सोच में विपक्ष की एकता और मोर्चा है। ऐसा विपक्ष जिसने भाजपा के आने की परिस्थितियां तय की, जिसके उदारीकरण को भाजपा ले उड़ी और अब उसकी औकात इतनी बड़ी हो गयी कि वह सीताराम येचुरी के कंधे पर हाथ भी रखती है।

बेचारे येचुरी साहब सज्जन पुरूष हैं, हाथ तो झटक नहीं सकते। पड़े रहने देते हैं। सोच नहीं पाते कि भाई, ऐसा इसलिये हो रहा है, कि उनके कंधे उन कंधों से जुड़े नहीं हैं, जिन कंधों से जुड़ कर जनसमस्याओं के समाधान की लड़ाईयां लड़ी जाती हैं।

इसलिये, वाम मोर्चा के राजनीतिक दलों की मौजूदगी गोरखा लैण्ड आंदोलन में वह नहीं होगी, कि ममता बनर्जी की सरकार को पलट सके। वो अपने असंदर्भित होने को रोक नहीं पा रही है।

सत्तारूढ़ राजनीतिक दल सरकार में बने रहने की नीतियों से संचालित हो रही है। भाजपा ‘एक देश एक राष्ट्र‘ की सोच से संचालित होने वाली ऐसी राजनीतिक पार्टी है, जो पूरे देश पर ‘एक दल एक नेता‘ की सरकार चाहती है। और इसके लिये वह किसी भी स्तर तक जाने में परहेज नहीं कर रही है। वह गैर भाजपायी राजनीतिक दलों के खिलाफ ऐसा अभियान चला रही है, जिसके लिये उसके पास सही तर्क नहीं है। वह सरकार और सरकार की योजनाओं का उपयोग संघ और भाजपा के लिये कर रही है।

ममता बनर्जी केंद्र से सहयोग तो चाहती है, किंतु वो केंद्र को मौका देना नहीं चाहती। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र के स्थिति की रिपोर्ट भेजना मंजूर नहीं किया, हालांकि अर्द्धसैनिक बल और सेना दार्जिलिंग पहुंच गयी है। सख्त कार्यवाहियां हो रही हैं। भाजपा तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ छोटे राज्य एवं राष्ट्रवाद के सैद्धांतिक तर्क के साथ गोरखा लैण्ड आंदोलन का लाभ उठा सकती है।

अलग गोरखा लैण्ड मांग का भविष्य अनिश्चित है।

(जारी)

आलोकवर्द्धन

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