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सरकारें वह नहीं जो दिखती हैं – 4

भारत में किसी भी आंदोलन और मांग का भविष्य अनिश्चित है, या यूं कह लीजिये की वो धोखा खा जायेंगी। उनकी ताकतें बंट जायेंगी। बांट दी जायेंगी। धोखा देने के लिये सिर्फ सरकारें ही नहीं हैं, वो वित्तीय ताकतें भी हैं, जिनके कब्जे में सरकार और बिकी हुई मीडिया है। जो खबरों का सन्नाटा खींच देती है और आम जनता तक -राष्ट्रीय स्तर पर- आंदोलनकारियों की बातें पहुंच ही नहीं पाती है। खबरें ऐसे बांटी जाती हैं, कि जनसमर्थन खड़ा ही नहीं हो पाता। सरकार के पक्ष में ही खबरें बंटती हैं।

यह मांग कहीं से गलत नहीं है, कि किसानों को उनके उत्पाद का सही मूल्य मिले और सरकार बनी भाजपा ने किसानों से कर्ज माफी का जो वायदा किया है, उसे पूरा किया जाये। जिसे वह धोखा देने में लगी है। केंद्र की मोदी सरकार कर्ज माफी की आर्थिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर लाद रही है, जबकि उत्तर प्रदेश चुनावी मंच से वायदा नरेंद्र मोदी ने किया था। जिनकी बोलती बंद है, और राज्य सरकारें अपने तरीके से इसे सुलझाने में लगी हैं, कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। जिसका मतलब है- धोखा।

केंद्र की सरकार कहने लगी है, कि ‘‘‘किसानों का कर्ज माफी‘ उनकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।‘‘ सरकार सही कह रही है। कर्ज देने वाली बैंकें और रिजर्व बैंक भी कर्ज माफी के पक्ष में नहीं है। और यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। सरकार और बाजार कर्ज माफी के खिलाफ है। विश्व बैंक भी चाहती है, कि 40 करोड़ भारतीय किसानों को गांवों से शहर की ओर खदेड़ा जाये, उन्हें उनके जमीन से बेदखल किया जाये, ऐसी स्थितियां बनायें कि गांवों से पलायन सुनिश्चित हो। इसलिये चुनाव जीतना है, तो ‘कर्ज माफी का वायदा‘ है, और सरकार समझदार है, और अपनी पूरी समझदारी दिखा रही है, कि हम बेवकूफ रहें।

किसानों के संघर्ष को मजदूरों के संघर्ष से जोड़ने की जरूरत है। वैसे भी एक ही स्थिति दूसरे से जुडी हुई है। आप खुद ही सोच लें, कि श्रम बाजार में यदि 40 करोड लोगों की तादाद बढ़ेगी तो हालत किसकी बिगड़ेगी और हालत किसकी सुधरेगी? मुनाफा कौन कमायेगा? जमीन पर उनका कब्जा होगा, बाजार पहले से जिनके कब्जे में है। कान्ट्रेक्ट फार्मिंग, कान्ट्रेक्ट लेबर और बाजार के भरोसे समाज का बहुसंख्यक वर्ग रोजी-रोटी की तलाश में भटकता हुआ। मुनाफे की कोई सीमा नहीं। सरकार किसानों की हित चिंतक है। मोदी जी की जय।

न चाहते हुए भी, लीबिया के कर्नल गद्दाफी की बात करनी होगी, जिसे यूरोपीय देश, अमेरिकी सरकार, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और वॉलस्ट्रीट की निजी कम्पनियां और बैंक ‘तानाशाह‘ कहते थे। आज भी कहते हैं। जिन्होंने गैर-पूंजीवादी ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया था, जहां देश की आम जनता को ब्याज मुक्त कर्ज आसानी से मिलता था, कि ‘‘बैंकों में जमा पैसा आम लोगों का है।‘‘ खेती करने वालों के लिये जमीन, खाद, बीज और मशीन-औजार और आवश्यक पूंजी सरकार देती थी। कृषि उत्पाद मूल्य बाजार पर निर्भर नहीं था।

इसलिये बाजार पर आधारित व्यवस्था में किसानों का हित सुरक्षित नहीं रह सकता, यही कारण है, कि बाजार के लिये सरकारें आम जनता, श्रमजीवि वर्ग एवं किसानों को ही नहीं, बल्कि अपने उस देश को भी धोखा देती है, जिसे वो मातृभूमि या ‘भारत माता‘ कहते हैं। देशभक्ति की ही तरह भारत माता भी लोगों को बरगलाने की चीज बन गयी है।

ऐसे लोग हैं, जो समझते हैं, कि सरकारें अपने देश और देशवासियों के सुख, समृद्धि, शांति और सुरक्षा के लिये काम करती है, लेकिन बाजारवादी ताकतों ने इस समझ में दरारें पैदा कर दी हैं। सरकारें आम जनता के पक्ष में कभी नहीं रहीं, वो शोषण और दमन का जरिया बनीं। जिसे मुक्त बाजारवादी ताकतों ने अपना बना लिया है। उन्होंने राजनीतिक एकाधिकार और पूंजी के वर्चस्व को स्थापित कर लिया है। अपने देश की सरकार चुनने और बनाने का अधिकार आम जनता के हाथों से छीन लिया गया है। हम उस सरकार की गिरफ्त में हैं, जो अपने देश और देशवासियों के हितों के विरूद्ध है।

क्या इससे बड़ा कोई अपराध हो सकता है, कि पीढ़ियों से, अपनी जमीन से जुड़े वर्ग को सिर्फ इसलिये बेदखल कर दिया जाये, कि श्रम बाजार में मजदूरों की भरमार हो, श्रम की कीमत गिर जाये, भारी मुनाफा के लिये उद्योग जगत में सस्ते में श्रम उपलब्ध हो और जमीन पर पूंजी का कब्जा हो।

किसानों के मांग को बरगलाया जा रहा है, और लाख, डेढ़ और दो लाख के कर्ज माफी की घोषणां सरकारें ऐसे कर रही हैं, जैसे उन्होंने अपने वायदों को पूरा कर दिया है। जबकि करोड़ों-करोड़ किसानों को अपनी जमीन से खदेड़ने का काम सुनियोजित तरीके से चल रहा है। किसानों को आत्महत्या करने की पूरी छूट है।

(जारी)

आलोकवर्द्धन

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